‘स्वर्ग का अंतिम उतार’: देवप्रयाग, जहां कौवे बिल्कुल नहीं दिखाई देते, पर सभी पितरों को मुक्ति मिल जाती है

 

 

 

 राजीव तनेजा

अमूमन सनातन धर्म को मानने वाले हर छोटे बड़े प्राणी के मन में कहीं ना कहीं यह इच्छा दबी रहती है कि कम से कम एक बार तो वह चार धाम की तीर्थ यात्रा पर जा कर अपना जन्म ज़रूर सफ़ल कर ले। भले ही इसके लिए वो कोई गांव देहात का पाई पाई जोड़ता ठेठ गरीब.. गंवार हो अथवा फैशनेबल शहर का हर कदम पर रईसी झाड़ता कोई जाना माना सेठ हो।

ऐसी हो एक यात्रा पर दोस्तों..आज मैं आपको ले चल रहा हूँ प्रसिद्ध लेखिका लक्ष्मी शर्मा जी के उपन्यास ‘स्वर्ग का अंतिम उतार’ के साथ। इस उपन्यास में कहानी है इन्दौर शहर के जाने माने रईस और उसके परिवार के धार्मिक पर्यटन के नाम पर चार धाम यात्रा पर जाने की। इसमें कहानी है उसी बंगले में चौकीदारी कर रहे छिगन की। उस छिगन की जो गांव की गरीबी और तंगहाली से तंग आ कर शहर में नौकरी करने के मकसद से आया है। हुक्म की तामील के रूप में उसे भी सेठ के परिवार के साथ, उनके पालतू कुत्ते की देखभाल के लिए, चार धाम की यात्रा पर जाना पड़ता है। उस चार धाम यात्रा पर, जिसका सपना उसकी दादी और माँ से ले कर वह खुद बचपन से देखता आया है।

 

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इस उपन्यास में एक तरफ कहानी है गांव देहात में पैसे पैसे को तरसते मजबूर लोगों की। तो दूसरी तरफ़ इसमें बातें हैं शहरी चोंचलों और उनकी दिन प्रतिदिन बढ़ती फ़िज़ूलखर्ची की। एक तरफ़ इसमें बातें हैं साफ़ चेहरे वाले सहज..सरल..सच्चरित्र इनसानों की तो दूसरी तरफ़ इसमें बातें हैं खोखली सहानुभूति लिए दोगले चेहरों से उतरते उनके नकाबों की। इस उपन्यास में गंगा के बढ़ते प्रदूषण की चिंता के साथ साथ भांग की चटनी और अफ़ीम की भाजी जैसी कई अन्य रोचक जानकारियां भी है।

राजीव तनेजा

कहीं इसमें, जंगल काट कर उसके किनारे बसे, उन गांवों की बात है जिनमें गुलदार(तेंदुआ) शिकार की कमी के चलते घर में अकेले रह रहे इनसानों को उठा ले जाता है। इस उपन्यास में कहीं बात है पहाड़ों पर हर जगह आसानी से उपलब्ध मैग्गी की तो कहीं इसमें बात है पहाड़ों पर जगह जगह नज़र आ रहे झरनों के बावजूद नलकों और हैंडपंपों के होने की। इसी उपन्यास के माध्यम से पता चलता है कि झरनों का पानी कच्चा होने के कारण पीने लायक नहीं होता।

इसमें बातें हैं उस देवप्रयाग की जहाँ कौवे बिल्कुल नहीं दिखाई देते कि वहाँ पर सभी पितरों को मुक्ति मिल जाती है। इसमें बात है सास बहू के रिश्ते वाली उन दो नदियों, भागीरथी और अलकनंदा, की जिनका भागीरथ में संगम होता है। जिनमें भागीरथी को सास इसलिए कहा जाता है कि बहते हुए वह सास की ही भांति बहुत शोर करती है और अलकनंदा, जो कि बहु है, एकदम शांति से बहती है। इस यात्रा कथा से गुज़रते हुए हम महसूस करते हैं कि एक स्मृति यात्रा भीतर ही भीतर छिगन के मन में भी चल रही है। जिसके जरिए वो अपने अतीत में झांकते हुए कुछ अन्य कथाओं के साथ चंदरी भाभी की मार्मिक कथा को भी उसके त्रासद रूप में पाठकों से रूबरू करवाता है।

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उपन्यास के मुख्य पात्र छिगन और उसके साथ हरदम रहते गूगल(कुत्ता) को केंद्र में रख कर इस पूरी कहानी का ताना बाना इस प्रकार कसावट के साथ बुना गया है कि कहानी का छोटे से छोटा पात्र भी कभी किसी जानकारी के माध्यम से तो कभी पहाड़ की बेटी जुहो जैसी किसी रोचक कथा के माध्यम से अपनी भूमिका को अहम बनाता हुआ नज़र आता है। इस बात के लिए लेखिका की तारीफ़ करनी होगी कि शब्दों के ज़रिए वह एक ऐसा चित्र पाठकों के समक्ष पेश करती हैं कि पढ़ने वालों को लगता है कि वे सब भी यात्रा में छिगन के साथ ही सफर कर रहे हैं। निर्बाध रूप से चलती कहानी कहीं भी बोझिल नहीं होती और पाठक इसके अंत तक आसानी से पहुँच जाता है।

सीधी साधी आम कहानी की तरह चल रही यह कहानी क्या एक आम यात्रा वृतांत भर रह जाएगी या अंत से पहले कुछ अप्रत्याशित या अकल्पनीय घटने को आपका इंतज़ार कर रहा है? यह सब तो आपको इस रोचक उपन्यास को पढ़ कर ही पता चलेगा। 104 पृष्ठों के इस बढ़िया उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है शिवना पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए है।

 

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