तुम्हारा व मानव-सभ्यता का शुभेच्छु “हॄदय”

प्रिय मन,
‌अभी तुम्हें आकर लेते बहुत अधिक सहस्त्राब्दियाँ नहीं बीतीं और न ही अधिक देर ही हुई है,परन्तु तुम्हारी स्वयं के स्वयम्भू होने की दंभ के परिणाम की कल्पना करके मैं सिहर उठता हूँ,।यद्यपि ये अनुभव क्षणिक है और जीवन की व्यर्थता को तुम्हें भी अनुभव करना ही होगा,और ये प्राणि-जगत का एकमात्र ऐसा सत्य है जो मानता सब कोई है पर जानता कोई नहीं।
‌ पत्र के आरंभ में तुम्हारा कुशल-क्षेम और अन्य औपचारिकतायें किये बगैर मैं उबाऊ बातें करके क्या सिद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ यही सोच रहे हो न?
‌ मुझमें और तुममें एक-सा क्या है इस पर फिर कभी विचार करेंगे परंतु एक सामान्य सी बात है कि हम दोनों की जोड़ी ही है जिसके कारण मानव-सभ्यता आज अर्श पर अपना विजय-ध्वज लहराते हुए दीख पड़ती है। लोग तुम्हें बुद्धि कहकर तुम्हारी महिमा के गुण गाते हैं और मुझे हृदय कहकर अलंकृत करते हैं,यही हमारी सामान्य पहचान है। हमारी विपरीतता के बारे में कहने को तो बहुत कुछ कहा जाता रहता है लेकिन ठीक- ठीक कोई नहीं जानता कि हम दोनों कितने भिन्न हैं,सिवाय मेरे! हमारे और तुम्हारे बीच में उतना ही भेद है जितना अनियंत्रित महत्वाकांक्षा में और ज्ञानपूरित संतोष में होता रहा है। विश्व में घटित अनेक पाशविक कृत्यों के बस तुम पे ही आरोप लगाया जाना पूर्णतः अनुचित है,क्योंकि तुम्हारे प्रत्येक मानवीय और राक्षसी कार्यों के लिए तुम्हें जीवटता का उपहार मुझसे ही प्राप्त होता है पर मैं हर बार निकल जाता हूँ और तुम अभ्यासवश फंस जाते हो,परंतु मेरी निरीहता ये है कि मैं जो तुम्हें साहस देता हूँ उसे तुम्हारे द्वारा दुस्साहस में परिवर्तित होता देखकर कुछ भी नहीं कर पाता।

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विनाश-यज्ञ की सर्वोत्तम समिधा भी महत्वाकांक्षा ही है‌

जब प्रकृति का अत्यंत आरम्भ हुआ तब प्रकृति के प्रत्येक प्रदर्शन को भौचक्की आंखों से देखने वाला मानव आज इतने दीर्घकालीन यात्रा के बाद अधिकांश आनंदवर्धक और उचित सुविधा को प्राप्त कर चुका है इसके पीछे तुम्हारा ही शौर्य है लेकिन इसके बाद अब वो बिना उचित-अनुचित का भेद करते हुए प्रकृति के दोहन का जो दुस्साहसी कार्य करके विनाश-पथ पर निर्द्वंद विचरण कर रहा है ,उसके पीछे तुम कितने उत्तरदायी हो,ये सर्वविदित है। विकास का प्रमुख तत्व महत्वाकांक्षा होती  है इस बात को स्वीकारने से मुझे कोई गुरेज नहीं,लेकिन तुम्हें ये सोचने का प्रयास तो करना ही चाहिए कि विनाश-यज्ञ की सर्वोत्तम समिधा भी महत्वाकांक्षा ही है।मानव-सभ्यता हम दोनों की जुगलबंदी से निरंतर अनेकानेक कीर्तिमान स्थापित करती गयी,और साथ ही साथ अगला लक्ष्य भी निर्धारित करती रही और उसकी प्राप्ति के प्रयत्न भी।
‌ये ठीक बात है कि प्रत्येक अभिभावक पुत्र का विवाह कर दुनियादारी से मुक्त होने के लिए सर्वप्रथम अपना घर ही देखता है,पर क्या तुम पर्याप्त सुखदायी आनंदवर्धक घर बनाकर मानव-सभ्यता को न दे चुके? क्या अब तुम्हारा लक्ष्य स्वयं को विवेचित करते हुए अपने जीवन की सार्थकता के पैमाने तय करना नहीं होना चाहिए?
‌ ये मेरी असुरक्षा की भावना कहो या अतिचिन्तन या मूढ़ता परन्तु ये दुनिया बारूद के जिस ढेर पर बैठे नज़र आती है मुझे वो तुम्हारी अपनी गोद दिखाई पड़ती है।क्योंकि बारूद के स्वरूप का परिमार्जन और परिवर्तन दोनों में तथा मानव-जगत को इसकी लत लगाने का कौशल भी तुम्हारा ही है।
‌ तुम्हारी असीम महत्वाकांक्षा की उत्पत्ति का सीधा उत्तर प्रकृति नहीं हो सकता,क्योंकि प्रकृति तो स्त्री-स्वरुपा है, उसका काम सृजन है,वो बस दे ही सकती है,लेना जानती ही नहीं।और देती भी क्षमा,दया,त्याग,सेवा,संयम,भक्ति जैसे गुण ही है तो एकबारगी ये कहा ही नहीं जा सकता कि प्रकृति ने तुम्हें ये गुण दिये लेकिन ये भी है कि महान अच्छाई के केंद्र में ही महान बुराई होती है,तो शायद प्रकृति ने ही तुम्हें ये वरदान देते समय इसकी कल्पना न की हो कि तुम इसे अभिशाप की प्रेरणा समझोगे। ये कैसे भी आरम्भ क्यों न हुआ हो ,लेकिन महत्वाकांक्षाओं की इतनी दीर्घकालिक यात्रा करके आये हो,कृपा करके अब तो थक जाओ।अब तो तुम ये कह पड़ो की हे मानव-जगत! ये थकान तो मानवता को विकसित करके ही थकेगी,अब जीवन का सटीक सार-विवेचना ही इस क्लांति को मिटा सकती है।

जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्य तय है…

और तुम्हारी ये धारणा तो सरासर गलत है कि जो जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्य तय है तो मानव-सभ्यता के विनाश महत्वाकांक्षा से ही हो तो क्या बुरा है! ये ठीक है पर विनाश के अवश्यम्भावी परिणाम के कारण जब अगली मानव-सभ्यता जन्मेगी और वो जब हमारी मानव सभ्यता की विवेचना करेगी तो जिस हेय दृष्टि से हमारी आलोचना करेगी,वो असहनीय है। ये सभ्यता एक सम्मानजनक विनाश के योग्य तो है ही, और तुम्हें इसका ये अधिकार तो नहीं ही छीनना चाहिए।  जितने भाले तुम्हारी इस पाशविक मनोवृत्ति ने मानवता को मारे हैं वही बहुत हैं, अब तो अपने स्कन्धों को विश्राम करने दो।
‌ इसी के साथ तुम्हारी कुशलता की और इस राक्षसी प्रवृत्ति के नाश की कामना करता हूँ।
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तुम्हारा व मानव-सभ्यता का शुभेच्छु
“हॄदय

(मानव के मन की यात्रा का लघु आख्यान लिए यह ख़त आदर्श बाजपेई ने लिखा है।)

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