सहजीवन में प्रकृति या प्रकृति में सह जीवन:  हिमालय से कुछ अनुभव

 डॉ पूरन जोशी

मैं ग्लोब के जिस हिस्से में रहता हूं वो हिमालय में स्थित है। यह भूभाग हिमालय का वह हिस्सा है जहां सबसे ज्यादा जनसंख्या निवास करती है और यह मध्य हिमालय के नाम से जाना जाता है। प्रकृति तो इस ब्रह्माण्ड में सर्व काल से सर्वव्याप्त है, लेकिन मानव के वजूद के साक्ष्य ज्यादा  पुराने नहीं हैं। अगर हम धरती के इतिहास पर एक नज़र डालें और मानव विकास के क्रम में जाकर देखें तो इस मध्य हिमालय में मानव के पैरों और उसके कामों की छाप प्राग-ऐतिहासिक काल से ही नज़र आती है।

यहां कई जगहों पर उसके रॉक शेल्टर मिले हैं। मेरे घर से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर ही लखु-उडियार नामक आश्रय स्थल हैं जहां आदि मानव के निशान मिले हैं। इसके बाद का इतिहास तो सब जानते हैं। राजाओं के काल आये, फिर ब्रिटिश हुकूमत रही जिसने सबसे ज्यादा प्रकृति को प्रभावित किया। यहां उन्होंने कई शहर बसाए। मध्य हिमालयी समशीतोष्ण जलवायु, जो उनको यूरोप का आभास देती होगी, ने ही यहां पर इतने बड़े पैमाने पर काम-काज करने को उनके कान में चुपचाप कहा होगा।

अब मैं अपने शहर रानीखेत की बात करता हूं, वैसे किसी चीज़ को अपना कहना मुझे बड़ा अजीब लगता है लेकिन फिर भी वो ये वो शहर है जिसने मुझे बहुत कुछ दिया। ख़ासकर क़ुदरत को देखने का एक अलग नज़रिया मुझे यहीं से मिला। यहां के घने जंगल, बहुत पास लगने वाली महान हिमालय की चोटियाँ, हर साल जाड़ों में गिरने वाली बर्फ, प्योली और अकेशिया के पीले फूल, लाल सुर्ख बुरांश और बांज- पांगर के विशाल पेड़, ये कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिन्होंने मेरी शख्सियत को बनाने-संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका रची।

हिमांसू (उत्तराखंड का एक फल)
हिसालू (उत्तराखंड का एक फल)

मेरा मानना है क़ुदरत ही हमको बनाती है, बढ़ाती है। क़ुदरत के दो सबसे अहम संकेतक हैं, वो हैं किसी जगह की हवा-पानी और वनस्पति। ये ऐसे दो घटक हैं जो किसी जगह को, जानवर हो या इन्सान हम सबके लिए रहने के काबिल बनाते हैं और सब संसार इसके बाद ही बनता है। मैं यहां रानीखेत में पांगर (Aesculus indica) और बांज (Quercus leucotrichophora) के पेड़ों को देख- देख कर बड़ा हुआ हूं। साल में दो बार इनके रंग को देख कर मैं बौरा जाता हूँ। एक जाड़ों में, जब पतझड़ आने को होता है और पांगर की पत्तियां पीली हो जाती हैं और दूसरा वसंत में जब इसमें नयीं कोपलें आती हैं और पत्तियां ललछौंईं आभा से भर जाती हैं। इसी तरह बांज भी साल में पत्तियों के कई रंग बदलता है। इसकी तो पत्तियां दोनों तरफ़ से भी अलग-अलग रंग की होती हैं। रंगों की बातें कई सारी हैं।

मैं जिस ज़िक्र को यहाँ लाना चाह रहा हूँ वह है पिछले दो सालों से जंगलों में लगने वाली आग। ये पेड़ भी उस आग के शिकार हुए। इतनी बुरी तरह हुए कि सब झुलस गया। मुझे लगा अब ये पेड़ मरने वाले हैं। हमेशा इनको देखा करता और सोचता कि क्यों ऐसा हुआ? फिक्रमंद भी हुआ। लेकिन ये चिंता शायद उन पेड़ों से ज्यादा खुद की थी, कि ये स्थापित तन्त्र अगर बिगड़ेगा तो मुझे भी उसका नुकसान होगा ही, को लेकर। फिर इस बीच लॉक डाउन के वक्त अचानक कई दिन बाद इन पेड़ों की तरफ जाना हुआ तो देखा इन पेड़ों पर नईं पत्तियां आयीं हैं। नीचे के हिस्से अब भी सूखे से हैं लेकिन सिरों पर फिर शाखें निकली हैं। कुछ झुलसी हुई शाखें अब भी पेड़ पर लगी हैं।

 

बुरांश का फूल
बुरांश का फूल

प्रकृति अपना उपचार खुद करती है अगर उसे वक्त दिया जाये। वक्त न मिले वो खुद वक्त लेगी। प्रकृति चुपचाप अपना काम करती रहती है। जहाँ दबाव ज्यादा हुआ फिर सीधे चीख़ती है। वो चीख़ होती है एक भूस्खलन के रूप में, बाढ़ के रूप में या फिर किसी महामारी के रूप में। यहाँ पर भूगोल का छात्र होने के नाते एक बात जो मुझे याद आती है वो है भूगोल का निश्चयवादी सिद्धांत, जो कहता है कि मानव प्रकृति का दास है। वह उसके आगे नहीं जा सकता है और यदि जाता भी है तो उसको पीछे लौटना ही होता है।

प्रकृति ने माँ की तरह उसको बनाया- संवारा है। कुछ गलत करने पर माँ जैसे हमको रोकती है वैसे ही प्रकृति भी रोकती है, लेकिन जैसे ही आद्योगिक क्रांति ने ज़ोर पकड़ा मानव खुद को स्वामी समझने लगा। जिन इलाकों को प्रकृति ने बिलकुल उसकी पहुँच से बाहर रखा था वो इलाके उसके मनोरंजन और पैसे कमाने के साधन बन गये। उच्च हिमालय, रूस व कैनडा के परमाफ्रॉस्ट क्षेत्र, मंग्रोव के जंगल, प्रवाल भित्तियां जो भी प्रकृति के स्वास्थ्य के संकेतक थे वो बिगड़ने लगे और बिगड़ते ही चले जा रहे हैं। उसी का खामियाज़ा वर्तमान सभ्यता भुगत रही है और भुगतेगी भी क्योंकि प्रकृति को भी सांस लेने का पूरा अधिकार है। आइये फिर से निश्चयवाद को देखते – समझते हैं।

जब हम प्रकृति के बीच होते हैं तो हमारा का नाम, चेहरा, पहचान सब उसमें बिला जाते हैं। बस एक ही पहचान सबकी पहचान बनती है माँ प्रकृति। धरती पर हर जगह की प्रकृति कितनी निराली होती है। जैसे सुबह कितनी खूबसूरत होती है पहाड़ों पर! सामने की चोटियों पर जब सूरज की सुनहरी किरणें पड़ती हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरी पहाड़ी ही मानो सोने में रंग गई है। सब संगत का असर होता है, हम खुद को भी सोने में पगा हा समझने लगते हैं। शामें, शामें तो यहाँ कुछ यूँ गुज़रती हैं जैसे प्रकृति ने टनों सुनहरा रंग बिखेर दिया हो। पहाड़ों पर शामें अक्सर ही सुनहरी होती जाती हैं। तभी अचानक से पहाड़ी पेड़ों पर अँधेरा घिर -घिर आता है और चिड़ियों का शोर रच देता है एक सुंदर धुन।

 कुदरत कितनी दयालु है! थोड़ा सा में भी भरपूर कर देती है। कभी-कभी मुझे मेरे नकली होने, इस्तेमाल करके भूल जाने और प्रकृति से बस लेते रहने उसके लिए कुछ भी न कर पाने पर गुस्सा आने लगता है। खीज होने लगती है पूरी आदमज़ात पर। कितना ले लिया प्रकृति से। अब भी नहीं चेते तो प्रकृति चीत्कार करेगी। वो दिन बहुत भयानक होगा। ऐसा भी लगता है वो दिन दूर नहीं। ये प्रकृति ही है जो दबे शब्दों में निरंतर कुछ कुछ कहती रहती है। रुको दो पल देखो फिर सोचो। हवाओं की सरसराहट, नदियों की छलछलाहट, पहाड़ों की चमक, ये चिड़ियों की चहचहाट और रंगों की बनावट। ये सब कुछ कहते हैं हमसे कि मत खराब करो प्रकृति को वरना आने वाले समय में धरती रहने के काबिल भी नहीं होगी। फिर कहाँ जायेंगे हम सब? माँ से कोई बच्चा जुदा हो पाया है आज तक भला! प्रकृति भी तो माँ ही है मत दूर हो उससे बुलाती है वो पास सुनो उसकी बात।

   इस तरह देखें तो कुदरत सहजीवन मांगती है। इसमें एकल कुछ नही है,सब समग्र में है। वर्तमान भूगोल के संस्थापक और महान घुमक्कड़ हम्बोल्ट के शब्दों को दोहरायें तो पूरी पृथ्वी/ प्रकृति में एक ही आत्मा के दर्शन होते हैं। मनुष्य भी इसका ही एक छोटा सा हिस्सा है लेकिन ख़ुद को प्रकृति का संचालक समझ बैठा है जबकि कुदरत का एक छोटा सा इशारा उसके पूरे वजूद को ख़त्म करने के लिए काफ़ी है। प्रकृति ने कभी ऐसा किया नहीं क्योंकि वो पालनहार है। कुदरत के हर ज़र्रे में जीवन है पर उसके रूप अलग हैं। कितनी हैरानी होती है न जब किसी रेगिस्तान में रेत पर मीलों चलने के बाद अचानक से खजूर के पेड़ और कुछ पानी दिख जाता है, हिमालय के किसी जंगल में चढ़ाई चढ़ने के बाद किसी गाँव से अचानक गाय के रंभाने की आवाज़ आ ही जाती है, दूर तक फैले ग्रीनलैंड के बर्फीले इलाकों में काई और सुंदर फूल खिल ही जाते हैं। मध्य-दक्षिण भारत और अफ्रीका के घनघोर जंगलों में भी मानव जीवन के दर्शन हो जाते हैं।

प्रकृति ने सबके लिए धरती पर मौके दिए। सबको कुछ न कुछ दिया उसके वजूद को बनाये रखने के लिए। इंसान को तो कुछ ज्यादा ही मिला। फिर भी उसने प्रकृति को बेतरतीब दूहना बंद नहीं किया। परिणाम सामने हैं। शोषक बनते चला गया वो। नीला आकाश,नीला सागर, हरे जंगल, नदियों का पानी सबके रंग बदल दिये। मौसमों के चक्र को बदल दिया। खुद के वजूद को ही तवज्जो दी औरों को नकारते गया। सहजीवन को भूल गया। इस धरती को बचाने के लिए इस सजीवन को समझना होगा। जब सब हैं तब मैं भी हूँ वाला दर्शन समझना होगा हमको अब क्योंकि एक चिड़िया का चहचहाना भी एक पूरा जीवन रचता है, एक तितली का उड़ना अपने आप में एक पूरा तन्त्र बनाता है, एक फूल जब खिलता है तो वो हज़ार उम्मीदें लिए हुए आता है और घास का एक तिनका पूरी कायनात अपने में समाये होता है।

अमेजन के इन घने जंगलों को जब
हम्बोल्ट अपने कदमों से नाप रहा था
एंडीज़ पर जब वो तेज़ी से चढ़ा
अमेजन नदी के पानी को उसने छुआ
और मैं इस घटना के सदियों  बाद
हिमालय पर बैठा हुआ आज
महसूस कर पा रहा हूँ
उन कदमों की आहट
उसकी चढ़ी हुई साँसों की धुन
कि किस क़दर पूरी धरती में समाई हुई है
वो एक ही आत्मा जो करती है
ज़ोर से क्रंदन और बताती है
दोनों अमरीकी महाद्वीपों
और दक्षिणी महाद्वीप ऑस्ट्रेलिया के
मूल निवासियों की करुण गाथा को!


डॉक्टर पूरन जोशी

3 thoughts on “सहजीवन में प्रकृति या प्रकृति में सह जीवन:  हिमालय से कुछ अनुभव

  1. सुंदर आलेख
    प्रकृति के सुंदरतम रुप का साक्षात्कार
    प्रकृति के दुख का अंकन

    विशिष्ट है, महत्त्वपूर्ण है
    विचारणीय प्रश्न उठाता आलेख !

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