‘पहाड़ के हाड़’: गिर्दा की स्मृति को सलाम!

आज हिमालै तुमुकै धत्यूं छौ
जागो – जागो ओ मेरा लाल

बरसों पहले पौड़ी के जिला परिषद हॉल में गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ को पहली बार सुना था। खद्दर का कुर्ता पहने घने-लटदार बालों वाले इस शख़्स की बात ही कुछ और थी। उन्होंने माहौल से हटकर फ़ैज साहब का मशहूर कौमी तराना ‘दरबार-ए-वतन में जब इक दिन… सुनाया। ओजस्वी स्वर फूटे तो साज की दरकार ही कहां रही ! यह काम तो उनके पावों और बाहों की जुंबिशों ने संभाल लिया था।

तराने की हर बहर से आवाज के अंगार दहक रहे थे। मानो कोई कौमी हरकारा किसी सामंती सत्ता को खुली चुनौती दे रहा हो। यदि स्वयं फ़ैज भी वहां होते तो अपनी रचना के इस इंकलाबी रूप को देखकर हैरत में पड़ जाते। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद गिर्दा से मिलने का मौका मिला। कितने हंसमुख, कितने सहज और कितने मृदुभाषी थे गिर्दा ! लग ही नहीं रहा था कि सौम्यता की इस मूरत के भीतर आग का कोई दरिया भी बहता है। बाद के बरसों में उनकी सोहबत के अनेक मौके मिले और उन्हें खूब सुना।

सत्तर-अस्सी के दशक के मध्य में ‘नैनीताल समाचार’ और ‘पहाड़’ की कोख से उभरी जनचेतना व जनसंस्कृति की एक धारा पौड़ी में भी बही। यहां इसके संवाहकों में राजू भाई, ओंकार बहुगुणा मामू और उमेश डोभाल इत्यादि रहे। उमेश की शहादत ने इस धारा को एक नया विस्तार दिया और फिर इसी के ऊपर वह पुल तामीर हुआ जिसकी एक-एक शिला पर गिर्दा और नरेंद्रसिंह नेगी जैसे महान लोकगायकों ने पहाड़ की रग में रची संवेदनाओं के नए आखर और स्वर उकेरे। यह कालजयी रचना संसार हैरतअंगेज है।

यहां दोहराना जरूरी नहीं है कि गिर्दा के इस अकेले गीत- ‘जैंता एकदिन त आलो उदिन दुनि में… ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन को कैसी धार दी। इस तराने ने एक छोटे से कालखंड के लिए ही सही, सत्ताओं को हिलाने वाले गीतों के इतिहास को नए सिरे से जिंदा किया।

पौड़ी के प्रेक्षागृह में नर्रुभाई और गिर्दा की वह जुगलबंदी भी इतिहास बन गई। जुगलबंदी का यह विचार राजूभाई का था। शास्त्रीय संगीत की जुगलबंदियां तो सुनी थी, लेकिन लोकगायकों की जुगलबंदी? यह अभिनव प्रयोग इतना सफल रहा कि इसकी गूंज सात समुंदर पार भी पहुंची। लेकिन यह सिर्फ गीत और गायिकी का आनंद भर नहीं था, बल्कि एक ऐसा प्रयोग था जिसने गढ़वाल और कुमाऊं से जुड़ी पहाड़ की सांस्कृतिक एकता के बचे-खुचे सूराख भी पाट दिए।

खत के साथ ही किस्से, कहानी और कविता।

यूं तो गिर्दा अधिकांश लोगों की नजर में जनाधिकारों के लिए संघर्षरत एक लोककवि थे लेकिन एक रचनाकार के रूप में उन्हें सिर्फ इसी खांचे में रखकर देखना उनके साथ अन्याय होगा। वह एक बेहतरीन गायक और रंगकर्मी भी थे। अपने समग्र रूप में वह उत्तराखंड की एक खरी और तपी हुई बौद्धिक संपदा थे। हिमालय के शिखरों, गिरिवरों, नदियों, घाटियों, नौले-पंधेरों और लोकजीवन की झांकियों से कभी प्रेरणा और कभी पीड़ा लेकर गिर्दा ने ऐसा बहुत कुछ रचा जो उन्हें एक ऊंचे पायदान पर खड़ा कर देता है।

गिर्दा को जब हम पहाड़ में जन अभियानों के एक सक्रिय कार्यकर्ता की भूमिका में देखते हैं तो उनका यही रूप उन्हें अग्रिम पंक्ति की ललकार बना देता है। तब उनके हाथ में जो हुड़का होता है, वह महज एक बाजा नहीं होता, बल्कि मशाल बन जाता है। हुड़के की थाप पर प्रकट होते इस इंकलाब ने न जाने कितने अभियानों में जनचेतना की कौंध पैदा की और पहाड़ के चप्पे-चप्पे को झकझोरा।

अफसोस कि गिर्दा ने जाने में जल्दी कर दी। ऐसे समय जब उत्तराखंड राज्य के सियासी सरमाएदार पहाड़ की थाती कूटकर पूंजी उगाहने पर आमादा हों, गिर्दा का न रहना बड़ा झटका है। पहाड़ ने आर्थिक आंदोलनों की बजाय देशहित से जुड़े सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आंदोलन छेड़े और फटेहाल होकर भी पहाड़ की छाती पर चलने वाले कुदालों और धनाक्रमणों की जमकर मुखालफत की। यह सब किसके बूते? गिर्दा जैसों के ही तो, जिन्होंने अलख जगाई थी- ‘आज हिमालै तुमुकै धत्यूं छौ, जागो-जागो ओ मेरा लाल…।’
गिर्दा की स्मृति को सलाम!
मेरी आनेवाली पुस्तक ‘पहाड़ के हाड़’ से…


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