पिथौरागढ़ में चल रहे ‘पुस्तक-शिक्षक आंदोलन’ के समर्थन में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज में चल रहे पुस्तक-शिक्षक आंदोलन के समर्थन में रविवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन किया गया। सांकेतिक तौर पर मुंह पर काटी पट्टी बांधकर दिल्ली में पढ़ने वाले उत्तराखंड के छात्रों, शिक्षकों और पत्रकारों ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया। पिथौरागढ़ से पढ़े छात्र भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बनें। उत्तराखंड के विभिन्न मुद्दों पर आवाज बुलंद करने वाले सुधी जन भी प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रदर्शन पर प्रकाश उप्रेती की टीप पढ़ें। मॉडरेटर


उत्तराखंड के बुनियादी सवालों में शिक्षक- पुस्तक भी एक बड़ा सवाल है। आज स्थिति यह है कि पिथौरागढ़ कॉलेज, जिसमें लगभग 7000 बच्चों पर 120 शिक्षकों के स्वीकृत पद हैं उसमें से 25% पद तो खाली पड़े हैं।

दरअसल, यही स्थिति कमोबेश उत्तराखंड के सभी कॉलेजों की है । अगर उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री के बयान को सच मान लें कि ‘सबसे ज्यादा शिक्षक पिथौरागढ़ के कॉलेज में हैं’ तो राज्य के अन्य कॉलेजों की स्थिति तो और भी सोचनीय/ दयनीय व खस्ताहाल है। ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में यह स्थिति सिर्फ उच्च शिक्षा में ही है। अगर आप उत्तराखंड की पूरी शिक्षा व्यवस्था को देखेंगे तो उसमें एक अराजक स्थिति है।

2014 में आयी इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के तक़रीबन 1689 प्राइमरी स्कूलों में केवल 1 टीचर है। इन स्कूलों में 39000 बच्चे पढ़ते हैं। इसमें से 1 टीचर वाले 222 स्कूल तो पिथौरागढ़ जिले में ही हैं। वहीं पिछले कुछ वर्षों से सरकार लगातार स्कूलों को बंद करने में लगी है।

जब बेसिक शिक्षा में शिक्षकों की ये बदहाली होगी तो उच्च शिक्षा के बर्बाद होने पर अचरज कैसा ? क्या कभी इस समस्या को किसी ने मुद्दा बनाया ? क्या नेता जी ने कभी इस पर कोई बयान दिया ? याद रखिए, नेता जी को पढ़ी-लिखी ज़मात नहीं चाहिए । इसलिए उत्तराखंड की ये बदहाली है। इस बदहाली के ख़िलाफ़ अगर पिथौरागढ़ के छात्रों ने आवाज उठाई तो मंत्री जी को वह आवाज बाहरी लग रही है। मंत्री जी कहते हैं कि यह बाहरी लोग कर रहे हैं। मंत्री जी क्या कर रहे हैं, यही न कि किताबें और टीचर दे दीजिए, कोई ठेका या विधायक थोड़े मांग रहे हैं।

आंदोलन करने की स्थिति भी तब आई जब पानी सर से ऊपर चला गया। पहाड़ के दूर- दराज़ के माता – पिताभविष्य बनाने के लिए अपने बच्चों को डिग्री कॉलेज भेजते हैं। वो खुद नहीं पढ़ पाए तो क्या हुआ कम से कम बच्चों का भविष्य तो सुधार सकते हैं। माता- पिता का भरोसा मासाब पर होता है कि वो उनके बच्चों का भविष्य संवार देंगे। परन्तु, उनकी इस आशा को सरकार कैसे पैरों तले रौंद देती है इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण पिथौरागढ़ का डिग्री कॉलेज है। लगभग 7000 बच्चे उनपर केवल 120 शिक्षक जिनमें से कई पद खाली ।

90 के दशक से पुस्तकालय में किताबें नहीं लेकिन मंत्री जी कहते हैं ‘किताबों की क्या जरूरत, किताबें पुरानी थोड़ा न होती हैं’ । मंत्री जी किताबें पुरानी नहीं होती लेकिन ज्ञान- विज्ञान का तो विकास होता है न ! आपके पास और वहाँ कार्यरत शिक्षकों के पास ऐसी कोई दैवीय शक्ति है जो नए ज्ञान- विज्ञान को पुरानी किताबों में समाहित कर दे? अगर ऐसा कुछ है तो अलग बात है, नहीं तो विद्यार्थियों को नए ज्ञान- विज्ञान और घटनाओं से परिचित होने के लिए नई- नई किताबें भी चाहिए।  अब आप ही बताओ, बिना किताब और मासाब के पहाड़ का युवा कैसे भविष्य बनाएगा बल ?

प्रकाश उप्रेती

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