उज्ज्वल शुक्ला की कविता: प्रेम के मेनिफेस्टो का खाली कागज़

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मैं प्रेम का मेनिफेस्टो लिखने बैठता हूँ
एक पतंग की डोर हाथों में आती है
मांझा मेरे सीने को काटता हाथ से छूट जाता है
मैं सबसे पहले दर्द की मरम्मत में लग जाता हूँ
इस तरह मेनिफेस्टो नहीं लिखा गया
उज्जवल शुक्ला

उधार लिए एक ज़मीन पर

मैं पेड़ लगा रहा हूँ
ज़मीन मेरी नहीं है
पेड़ मेरे हैं
पेड़ की जो छाया जमीन पर पड़ेगी
वह हमारी होगी
और फल आने वाले वक्त के
एक रजिस्ट्री है इस छाया की
बिना किसी नाम के
समूची दुनिया के लिए।
थोड़े से आकाश के नीचे
एक पेड़ खड़ा है
पेड़ के नीचे एक प्रेमी है
प्रेमी के ऊपर प्रेयसी का डुपट्टा
आकाश पेड़ के ऊपर से नीचे उतरकर
प्रेमी के ऊपर आ जाता है
थोड़ा सा आकाश पिघल जाता है
थोड़ा सा प्रेम आकाश बन जाता है
इस थोड़ेपन में एक बूंद गिरती है
यह थोड़ापन गल जाता है
पेड़ से दीमक की मिट्टी धुल जाती है
थोड़ी मिट्टी को डुपट्टा छान देती है
थोड़े पानी को आकाश रोक लेता है
अब कुछ थोड़ा भी नहीं बचता
पूरा खालीपन है दो व्यक्तियों के बीच
दो व्यक्ति कोई भी हो सकते थे
डुपट्टे का होना ज़रूरी नहीं था
जब-जब डुपट्टा हटेगा
आकाश धड़ाम से गिरेगा
पानी सन्न से वाष्प बनेगा
प्रेम धम्म से गिर जाएगा
अतः डुपट्टे का ढकना
अनचाही हत्या के निमंत्रण से बचाता है
जंगले की सलाखों पर जमी काली परत
जंगले के उस पार रास्ता है
जंगले के इस पार
खड़कते बर्तन हैं, खटिए पर पड़ी किताब है
इनके बीच नाक, कान और नज़रे हैं
जो खुद को जंगले पर टांगे हुए हैं
मैं उस रास्ते से गुजरने वाला पहला नहीं हूँ
वह उस पार बैठी पहली नहीं है
ये मेरी नितांत कल्पना नहीं है
ये कल्पना से थोड़े पीछे की बात है
ये शहर बनने के पहले की बात है
एक उदास सड़क पर
पीली रोशनी तले
सिगरेट का धुंआ है
तुम्हारे चेहरे को ढके हुए
मैं इस पार से
तुमसे सिगरेट छीनकर
तुमसे लड़ना चाहता हूँ
पर बैग के पट्टे को रगड़ता आगे बढ़ जाता हूँ
आगे बढ़ना पहली बार दुर्भाग्य इस तरह बनता है
इस तरह शुरुआत होती है गांव की शहर से दूरी
इसी तरह खेत बिल्डिंग को देख चुप रह जाते हैं
इसी तरह हवा सिगरेट के धुएं को गांव तक लाते-लाते
खेतों में जल उठती है
और इसी तरह पैदा होता है
गांव में शहर से लौटे शख्स का अकेलापन
नदी में पत्थर मारकर मैं
यादों को तिलांजलि देता हूँ
एक प्रेत वहाँ से पीछा करता आता है
मेरे तकिए तले छुप जाता है
अपने करवटों के निशान पर
तुम्हें ढूंढ़ता हूँ
प्रेत मुस्कुराता हुआ दिखाई देता है
थोड़ी सी ज़मीन में
थोड़े आकाश की परछाईं होती है
डुपट्टे के कुछ रेशे एक घड़े में होते हैं
किताब का एक पन्ना
पन्ने पर बार-बार काटा गया
एक जमा एक बराबर एक ही नाम
और धुंए की राख
मेनिफेस्टो का खाली कागज
प्रेत का वस्त्र है
उज्ज्वल शुक्ला,  स्नातकोत्तर दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क – shuklaujjwal6@gmail.com

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