दिल्ली में नहीं, तेरे दिल में रहती हूं… रे पहाड़

ओ पहाड़! कैसा है रे!! तू सोचेगा वर्षों बाद याद कैसे आई। नहीं रे, भूली कहां…

डॉ कुसुम जोशी की लघुकथा: ठुल कुड़ी

फिर उसने आमा से चिरौरी की “ठुल कुड़ी” दिखा दो आमा.. परसों कॉलेज खुल जायेगा और…

लघुकथा- अजनबी आंगन

नवल ददा अपनी नवेली ब्योली को लेकर अभी अभी घर पहुंचे थे। बाबा, बाबू ,ताऊजी चाचा,…

कविता: पिता के लिए टीस बन जाती है तीस की बेटी

ओमप्रकाश वाल्मीकि : न्याय की घोषणा के कवि

दुनिया में ऐसे बहुत-कम लोग जन्म लेते हैं जिन्हें तारीख़ उनके द्वारा किए गए सामाजिक, सांस्कृतिक…

हाला तुम्हारे प्याले में जीवन का गीत गा रही होगी, नदी किनारे भूतों का तांडव चल रहा होगा

प्यारे बदले-बदले महेश दा :आशा है, तुम जंगलों में सुस्ता रहे होगे. घुप्प अंधेरी रात में…