शुबि दाधीच की कहानी- ‘क्रिसमस की वो रात’

उस दिन मुझे याद हैं – एक प्यारा- सा तोहफा जो मुझे क्रिसमस पर मिला था .  सुनसान सड़क पर आतिशबाजियों की गडगडाहट और बड़े -बड़े घरों की सजावट और रोशनियों को देखकर मेरा मन और खुश हो जाता .

लोग एक – दूसरे के घरों में जाकर ‘मैरी क्रिसमस’ बोलकर बधाईयां दे रहे थे, तोहफे दे रहे थे और बच्चे बड़े ही प्यार से क्रिसमस ट्री को निहार रहे थे . उन्हें देखकर मुझे भी ख़ुशी होती पर एक बात का भी दुःख होता कि मुझे न ही कोई गले लगाने वाला था और न ही कोई उपहार देने वाला .

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अपनी झोपडी में एक दिए की रौशनी के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं थे फिर भी इन अंधेरों के बीच में मन में किसी की आशा की लोह जला रखी थी पता हैं वो क्या चीज थी – “भगवान”. मैं अपने विचारों में ऐसे खोया हुआ था कि मुझे किसी ओर का ध्यान ही नहीं था .बच्चों के शोर सुनके में अपने ख्यालों से बहार आया और मैंने देखा कि एक आदमी जिसने लाल रंग के कपडे पहने हुए थे और चेहरे पर सफ़ेद दाढ़ी-मूंछे थी और उसके पास एक थैला था जिसमें बहुत सारे तोहफे थे .

वो तोहफे बच्चों को देकर काफी खुश होता, खेल-तमाशा दिखाता,ये देखकर बच्चे भी काफी खुश हो जाते और मैं भी खुश हो जाता . अचानक से उस लाल रंग के लिबाज वाला व्यक्ति मेरी तरफ आने लगा … जैसे ही वो मेरी तरफ बढ़ रहा था वैसे मेरा मन भी घबरा रहा था . तभी मुझे मेरी अम्मा की एक बात याद आ गयी थी .

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वो हमेशा कहती थी कि जिनकी बड़े बड़े ढाढ़ी-मूंछे होती हैं वो चोर –लुटेरे होते हैं जो बच्चों को एक थेले में बंद करके ले जाते हैं . मैं अपनी मां के ख्यालों में इस कदर डूब गया कि मुझे ध्यान ही नहीं था कि कब वो मेरे पास आया ? वो मेरे पास आया और मुस्कुराते हुए कहा –“बेटा, इतने डरे हुए क्यों हो ? आपको मुझसे डर लग रहा हैं क्या ?”

ये सुनके मुझे और डर लगने लग गया और कहा कि आप कहीं मुझे पकड़ कर तो नहीं ले जाओगे न ! ये सुनकर वो काफी हंस पड़ा और कहा – तुमको , मुझसे डरने की जरुरत नहीं हैं . मैं संता हूँ,मुझे भगवान ने भेजा हैं तुम्हारी मदद के लिए .

ये सुनकर मेरा मन भावुक हो गया और उसके गले लग कर खूब फूट –फूट कर रोया .उसने मेरे प्यार से आंसू पोंछे और कहा –“बेटा, क्या हुआ ? आप इतना क्यों रो रहे हो . मैंने बड़े ही मासूमियत से कहा –“सबके मम्मी –पापा है ,सबके दोस्त हैं , एक मैं ही हूँ जिसका कोई नहीं हैं ! बाते करते – करते मेरे आंसू फिर से छलक पड़े .मेरे आंसू पोंछते हुए कहा – “कौन ,कहता हैं कि तुम्हारा कोई नहीं हैं ,मैं हूं ना !

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जो मुझे भगवान ने भेजा हैं तुम्हारी मदद के लिए और कौन कहता हैं कि तुम्हारे माता-पिता नहीं हैं ,वो हैं …मैंने कहा –कहाँ ,हैं वो ? संता ने मुझे आसमान में तारों की तरफ इशारा करते हुए कहा – “वो रहे, जो तारे सबसे ज्यादा चमक रहे हैं वहीँ हैं तुम्हारे मम्मी-पापा .मैंने कहा –“ क्या वो मुझे देख रहे हैं ?” संता ने मुस्कुराते हुए कहा – हाँ,पर अगर तुम रोते रहोगे तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा .”

ये सुनकर मैंने अपने आंसू झट से पोंछ डाले और कहा –“मैं अब कभी नहीं रोऊँगा “.ये देखकर संता ने मुस्कुराते हुए अपने झोले में से निकालते हुए कहा –“बताओ, तुम्हें गिफ्ट क्या चाहिए ?”  मैंने कहा – “क्या , मुझे एक किताब मिल सकती हैं ? मुझे पढ़ने का भी काफी शोक हैं .संता ने कहा – “फिर तो, तुम स्कूल भी जाते होंगे .” 

मैंने कहा – नहीं, मैं स्कूल नहीं जाता ,पास ही मैं काफी बच्चों को स्कूल जाते हुए देखता हूँ, मेरा भी मन करता हैं कि नयी यूनिफार्म, नया लंच बॉक्स हो, नया बस्ता हो … इतना  कहकर मैंने आंह भरते हुए कहा –काश !!! मैं भी स्कूल जा पाता . संता ने मेरे सिर पर हाथ फैरते हुए कहा- तुम देखना बेटा, जल्द ही तुम्हारी ये तमन्ना पूरी होगी .” यह सुनकर मेरे मन में एक ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी .” संता ने फिर आगे कहा –“बेटा , तुम मेरे साथ घर चलना चाहोगे .”मैंने काफी सहजता से मुस्कुराते हुए कहा – हाँ, बिल्कुल !

संता और मैं थोड़ी दूर एक सड़क पर पहुंचे. कुछ ही दूरी में एक बड़ी सी चमचमाती कार हमारी तरफ बढ़ रही थी और उसमें से ड्राइवर बाहर आया और संता की तरफ नम्रतापूर्वक गाडी का दरवाजा खोला – मालिक, चलिए !!! यह देखकर मैं दंग रह रहा और संता की तरफ देखकर कहा –“ आपके पास कार भी हैं .”

संता ने कुछ नहीं कहा बल्कि बड़े ही प्यार से मुझे अपनी गाडी में बिठाया पर मुझे अभी भी अपनी आखों पर भरोसा नहीं था . जब कार कुछ रास्ते से होकर गुजरी तो फिर से मैंने उनसे वहीँ प्रश्न पूछा .संता ने मेरी तरफ शालीनता से मुस्कुराते हुए  कहा – “हाँ ,ये मेरी ही कार हैं ,और मैं कोई संता नहीं हूँ .मैं मल्होत्रा इंडस्ट्री का चेयरमैन विक्रम मल्होत्रा हूँ .तुम्हारी तरह मैं भी एक साधारण व्यक्ति हूँ जिसे आम जिंदगी पसंद हैं .

मैं हर क्रिसमस पर संता बनकर बच्चों को उपहार देता हूँ .तुम्हारी तरह मेरा बचपन भी काफी संघर्ष भरा रहा हैं और तुमसे मिलने के बाद मुझे मेरा बचपन याद आ गया .

चंद मिनटों में ही गाडी एक जगह रुकी .जब मैं उस गाडी से निकला तब मैंने देखा कि एक बड़ा सा घर जो मैं फिल्मों और टीवी में देखता था वो ही सब आज मेरी आँखों के सामने हैं .यह सब मेरे लिए सपने जैसा ही था .

संता ने कहा – “बेटा, ये मेरा घर हैं और ये आज से तुम्हारा भी घर यहीं हैं , मेरी कोई औलाद नहीं हैं .क्या तुम मुझे अपना पिता मानोगे ?” “पिता” शब्द सुनकर मैं खुद को नहीं संभाल पाया और संता को गले लगाकर कहा –“हाँ,पापा !!! मैं आप ही का बेटा हूँ .

उस क्रिसमस वाली रात भगवान ने मेरी किस्मत ही बदल दी थी- “मुझे, मेरे पापा मिल गए ,रहने के लिए घर ,जीवन सुधारने के लिए शिक्षा .आज मैं अपने संता के बदौलत एक बड़ा डॉक्टर हूँ ..

थैंक यू पापा मेरी जिंदगी बदलने के लिए ..उर्फ़ संता …


यह कहानी शुबि दाधीच ने लिखी है। वह एक निजी विश्वविद्यालय में फिल्म पढ़ाती हैं। पीएचडी शोधकर्ता हैं। कहानी और कविता लेखन में विशेष रुचि है।

2 thoughts on “शुबि दाधीच की कहानी- ‘क्रिसमस की वो रात’

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