लघु कहानी- हिलमणी का रेडियो

ललित फुलारा
ललित फुलारा

वॉइस कमांड के इस युग में हिलमणी होते तो बेटे का लाया रेडियो कभी नहीं तोड़ते। ‘चुप जा रे’ कहते ही रेडियो बंद हो जाता है और हिलमणी का गुस्सा शांत। मोहरी पर रखा हुआ रेडियो बड़ी देर से बज रहा था और गोठ में हुक्का फूंक रहे हिलमणी के कान देसी गानों से फटे जा रहे थे। घर ही नहीं, गांव में यह पहला नया रेडियो आया था।

सुबह- शाम खोई में लौंडों के साथ ही सैणियों की भी भीड़ जुट जाने वाली हुई। सबको गीत सुनने ठहरे। कई दिनों तक पहाड़ी गीत और भजन चले फिर देसी गानों की धुन बजने लगी। एक दिन बेटा बाली रेडियो बजाकर ऊपर गांव की तरफ चल दिया। घंटा हो गया रेडियो ने चुप होने का नाम ही नहीं लिया तो गोठ से तमतमाते हुए हिलमणी हुक्का उठाकर बाहर आए और पांच-छह बार ‘चुप जा रे’ बोला। हर दिन तो एक घंटे बाद बंद हो ही जाता था आज नहीं हो रहा क्या बात? यह सोचते हुए वह रेडियो के बगल में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाने लगे।

हिलमणी ने फिर बोला ‘या तो चुप हो जा या फिर पहाड़ी गाने सुना।’ रेडियो ने उनकी एक नहीं सुनी और देसी गाने बजते रहे। बुड्ढे ने रेडियो की दो-तीन बार पीठ भी थपथपाई ‘अरे चुप हो जा! मेरे कान फट गए हैं। अपनी बोली न भाषा…बजे जा रहा है।’ जब रेडियो नहीं माना तो उन्होंने गुस्से से उसे मोहरी से उठाकर फेंक दिया और रेडियो शांत हो गया। हिलमणी के कानों को बड़ा सुकूं मिला और चौथर से रेडियो उठाकर उन्होंने फिर मोहरी पर रख दिया और हुक्का गड़गड़ाते हुए गोठ चले गए। बाखली से बाली लौटा तो शांती छाई हुई थी। उसने बाज्यू से पूछा ‘रेडियो बंद कर दिया क्या बाज्यू? मैं तो खुला ही छोड़ गया।’ हिलमणी ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा, ‘अरे यह रेडियो तो तेरा ही कहना मानता है। मेरी बात ही नहीं सुन रहा था। चौथर में पटका तब शांत हुआ है।’


साभार- ललित फुलारा फेसबुक

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