‘समय की नाक’ से लेकर ‘कहानियों के पैर नहीं होते’ तक डॉ. हरेंद्र असवाल की कुछ चुनिंदा कविताएं

 

 

हरेंद्र असवाल

 

 

 (1 )

समय की नाक
नाक छोटी और विजन बड़ा
रखने का समय है ,
नाक पर ही सबसे बड़ा
हमला कर रहा है काल ।
मुँह बंद रखना समय की है मांग
घुटने मोड़ कर बैठे रहो चुपचाप ।
ज़िन्दगी चलते रहने का नाम थी कभी
अभी तो योग निद्रा में रहने का काल है ।
थक रहे हैं लोग चुप बैठकर
लेकिन इसी का नाम योग है ।
नाक छोटी और विजन बड़ा
रखने का समय है ।
इस बुरे समय की नाक लंबी है
तुनक जाती है जरा सी बात पर
मिलना ,जुलना नहीं उसे पसंद
तुम्हारा , तुम्हारे दोस्तों से ।
समय ये इस कदर है नाज़ुक
नस्लभेदी मौत पर तो विश्व
में है उथल पुथल ,लेकिन लाखों
की मौत पर कोई नहीं बोला चीन पर ।
इस समय की नाक लंबी है
निकलना घरों से जरा सँभलकर ।
बचा के रखना नाक ,मुँह न जाने
किस राह से निकल जाये ये हमलावर ।
इस समय की नाक लंबी है
निकलना घरों से जरा सँभलकर ।

 

(2)

आओ शरण
आओ शरण यदि तुम हमारी
विचार तुमको शुद्ध देंगे
युद्ध नहीं फिर बुद्ध देंगे ।

आओ शरण यदि तुम हमारी
प्रेम का वह मन्त्र देंगे
जन भावना का तन्त्र देंगे ।

करुणा भरा संसार देंगे
ज्ञान का उद्गार देंगे
आओ शरण यदि तुम हमारी ।

छोड़ दो यदि होड़ अपनी
नया सा संसार देंगे
आओ शरण यदि तुम हमारी।

हम नहीं चाहते दिशाओं को बाँधना
हम नहीं चाहते इस जमी को काटना
हम नहीं जानते मानवों को बाँधना

आओ शरण यदि तुम हमारी
हम तुम्हें विस्तार देंगे
नया जीवन आधार देंगे ।

(3)

कहानियों के पैर नहीं होते
कहानियों के पैर नहीं होते
पंख होते हैं ,
सच की ज़मीन होती है
झूठ के पंख होते हैं ,
अंधेरों से ही होती हैं
रौनकें गुलज़ार ,
बहारों का समय
लंबा नहीं होता ,
पतझड़ों में छिपा है
बसन्त का उद्गार ।
हवाएँ जिस तरफ चलें
उधर चले जाना
उलटी दिशा में
होती है पलटवार ।
सब कुछ जो सही कर दे
झूठ को भी सच साबित कर दे
गढ़ दें कहानी हजार
उसे ही कहते हैं सरकार ।
सरकार के भी पैर नहीं होते
होते हैं तो आदेश और फ़रमान ।
वे ठीक चलें तो ठीक
वरना कर देते हैं लहुलुहान ।
कहानियों के पैर नहीं होते
पंख होते हैं ,
पंखों का क्या भरोसा
कितनी ऊँची भर ले उड़ान ?
ज़मीन जब छूट जाती है
फिर कुछ भी कहो ,कुछ भी करो
आकाश में नहीं मिलते निशान ।

(4)

वे निकल गये 
जो महीनों सालों के
अन्तराल में
शहर पहुँचे थे ,
वे जब एक साथ
लौटने लगे हैं अपने गाँव
तो सब कुछ कम पड़ गया
यहाँ तक कि भावनाएँ भी ।
वे असंख्य हैं
संख्या होती तो
सरकार बता भी देती
और व्यवस्था का स्वाँग
भी कर देती ,
लेकिन वे असंख्य हैं ।
अब उन्हें कुछ नहीं चाहिए
अपने गाँव के सिवाय
हालाँकि गाँव से ही वे
शहरों में आये थे
भविष्य की तलाश में ।
मरते तो लोग रोज ही थे
रोज ही मरते हैं
और मरते रहेंगे
आख़िर ऐसा क्या कर दिया कोरोना ने
जो ये भगदड़ मच गई ?
एक ने कहा
मैने सुना है टी वी पर
करोना छूत की बीमारी है
दूसरे ने कहा सरकार ने कहा है
बच के रहना दूसरों से
तीसरे ने कहा सब कुछ लॉक डाउन है
चौथे ने कहा मर गये तो
कोई उठानेवाला भी नहीं मिलेगा
इसलिए मरेंगे तो कम से कम
अपनो के पास मरेंगे ।
जो जा रहा था , मैने पूछा
कहाँ जा रह…

(5)

गीत नहीं लिखता
गीत नहीं लिखता मैं दर्द लिखता हूँ
रचता नहीं कुछ भी रचा हुआ ही लिखता हूँ ,
सागर की तरंगों सा मचलता रहता हूँ ।
छट पटाता हूँ ,तड़पता रहता हूँ ,
जब देखता हूँ भूख से बेहाल बच्चों को
अन्दर हि अन्दर बिलखता रहता हूँ ।
शब्द जब कमज़ोर पड़ते हैं गला सूख जाता है
तब आँख में आँसू कोरों पर टपकते हैं ।
मेरी नींद में उनके पैरों के छालें हैं
नहीं पता मुझको मैने क्यों ऐसे रोग पाले हैं ।
आनन्द से सोकर जो सपने संजोते हैं
प्रणाम है उनको जो खोये से रहते हैं
मुझे तो स्वप्न में ,बिवाइयों की टीस सुनती है ।
मैं दर्द सहकर भी दर्द लिखता हूँ ।


डॉ हरेंद्र सिंह असवाल दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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