ड्रीम गर्ल: आर्टिफिशियल इमोशन का बाजार

भीड़ में हर आदमी अकेला है। उसका अकेला होना उसे अलग नहीं करता बल्कि उसके संबंधों में पसरा खालीपन है। अपनी इच्छाओं और अकांक्षाओं को पूरा करते-करते व्यक्ति मौजूदा समय में नितांत अकेला हो गया है। उससे न कोई बात करने वाला है न कोई अपने भावों को समझने वाला। वह हर ओर भीड़ में भी अकेले होने के अहसास से जूझ रहा है।

बाजार ने समझा व्यक्ति का अकेलापन और अवसाद
उसका अकेलापन उसे अवसाद से ग्रस्त करता है। इस बीच अगर व्यक्ति के अवसाद और अकेलेपन को किसी ने समझा तो वह बाजार है। व्यक्ति की भावनात्मक कमज़ोरी और अकेलेपन को दूर करने के लिए उसे अदृश्य माध्यम से एक साथी उपलब्ध करवाया। आयुष्मान खुराना की ‘ड्रीम गर्ल’ फिल्म भी भीड़ से अकेले परिवार समाज में रहकर भी अकेलेपन से व्यथित व्यक्तियों की जीवन यात्रा है। इस यात्रा का कोई जेंडर नहीं है।

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यहां युवा से लेकर बुजुर्ग तक जीवन में अकेले होने के अहसास से जूझ रहा है और इसी में स्त्री भी पुरुष से प्यार में अविश्वास के धोखे से जीवन में विश्ववास का दामन छोड़ चुकी है। उसका टूटा विश्वास हर कोई नहीं समझ सकता इसी वजह से हर किसी की नज़र में वो पुरुष विरोधी है।

मनुष्य के मनुष्य पर से अविश्वास ने ‘आर्टिफिशियल’ विश्वास का बाज़ार बनाया है। जहां कोई किसी को नहीं जानता मगर विश्वास के साथ अपनी हर अंतरंग बात को कहने से नहीं डरता। इसी विश्वास ने उसके जीवन को सहज भी बनाया है। मगर यह सभी क्षणिक स्थितियाँ है।

वस्तु ही नहीं मनुष्य के इमोशन भी बाजार में गिरवी
बाजार जिसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करता है और उससे पूंजी का निर्माण कर रहा है। बाज़ार का चरित्र ही पूंजी से निर्धारित होता है वर्तमान समय में बाजार ने वस्तु से लेकर मनुष्य के ‘इमोशन’ तक के खरीदार तैयार कर दिए हैं।

क्योंकि हम ही ने बाजार को व्यक्ति के इमोशन का मूल्य तय करने का अधिकार दिया है। भारत में भी ‘आर्टिफिशियल इमोशन’ का बहुत बड़ा बाजार है। चलिए बाजार से फिल्म की ओर रुख़ करते हैं। ‘ड्रीम गर्ल’ फिल्म ऐसे ही विषय के कथानक के साथ आती है।

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कॉल सेंटर में सभी के इमोशन को सुनने और समझने वाली ‘पूजा’ फिल्म की अदृश्य पात्र है। पूजा का कोई जेंडर नहीं है। उसकी आवाज लड़की की है और व्यक्तित्व पुरुष का। बचपन से स्त्री आवाज की कला एक ओर उसे सांस्कृतिक मंचों, रामायण, महाभारत और राधा-कृष्ण की लीलाओं में स्त्री अभिनय का दबाव बनाती हैं तो दूसरी ओर परिवार की जिम्मेदारी में अभिनय से प्राप्त मूल्य उसे स्त्री भूमिकाओं के लिए अधिक प्रोत्साहित करता है।

यह ‘अर्थ’ पूंजी ही उसे सीता के पात्र से पूजा के अत्याधुनिक पात्र में तब्दील भी करता है। फिल्म की पात्र ‘पूजा’ सबकी ‘ड्रीम गर्ल’ है जिसके पास सभी की समस्याओं का समाधान है| आज के इस दौर में प्रत्येक व्यक्ति अपनी पारिवारिक,सामाजिक, आर्थिक समस्याओं व जिम्मेदारियों में इतना उलझा हुआ है कि उसके पास बात करने वाला एक साथी भी नहीं है वो उम्र के अंतिम पायदान में भी एक ‘साथी’ को खोज रहा है।

इसी में ऐसे युवा भी शामिल है जिनके लिए पारिवारिक संबंध का कोई महत्व नहीं है। वह अपनी ही बनावटी दुनिया की भीड़ और शोर-शराबे में जीते हैं। जिनकी जिंदगी शराब, सोशल मीडिया है और इसी अदृश्य मीडिया में गोता खाते हुए वो जिंदगी के सच से कोसो दूर आत्मकेंद्रित होकर जीने लगता है। फिल्म ऐसे ही भावनात्मक रूप से कमज़ोर लोगों की कहानी है।

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नए विषय के साथ फिल्म दर्शकों को लुभाती है
जिनकी भावनाओं का इस्तेमाल बाजार पैसा बनाने में कर रहा है और व्यक्ति अपने परिवार और संबंधों से दूर इसी आर्टिफिशियल भावनात्मक लगाव पर जिंदगी गुजार रहा है। फिल्म अपने नए विषय के साथ दर्शकों को लुभाती है वहीं भावनात्मक स्तर पर अकेलेपन के शिकार व्यक्तियों के भावों से खेलते बाजार की भूमिका को भी उजागर करती है। बाजार जिसके लिए अकेलेपन से जूझता आदमी पैसा है। वह जिसका प्रयोग अपने बाजार को मजबूत करने के लिए करता है। बाजार के लिए व्यक्ति का भाव ‘इमोशन’ का मूल्य नहीं होता है। वह सिर्फ खरीदार है।

वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर ‘आर्टिफिशियल इमोशन’ बाजार का सबसे बड़ा उत्पाद बनकर उभर रहा है। ड्रीम गर्ल फिल्म अपने अभिनय, संवाद और ब्रज बोली के साथ एक उम्दा कथानक के साथ बेहतरीन फिल्म है|


भावना मासीवाल जेंडर और स्त्री मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइट्स के लिए लगातार लिखती हैं। हिंदी साहित्य में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से पीएचडी हैं।

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