वियना की यात्रा: हर शहर में कुछ न कुछ छोड़ आना चाहिए

डॉ रेखा उप्रेती
डॉ रेखा उप्रेती

यात्राएं बहुत कीं, पर लिखने की उमंग ने कभी ज़ोर नहीं मारा। पिछले वर्ष जब लिस्बन सम्मेलन के बहाने यूरोप के कुछ नगरों में जाने का अवसर मिला, तब भी यह ख़्याल नहीं था कि इन अनुभवों को लेखनीबद्ध करूंगी। वापस लौट आने पर लगा कि मन तो वहीं कहीं छूट गया है। अपनी सहयात्री, रेखा सेठी दी को, मैं कहती ज़रूर थी कि ‘हर शहर में कुछ न कुछ छोड़ आना चाहिए’, पर यह नहीं जानती थी कि अपना मन ही छोड़ आऊंगी। कहने को ये यूरोप-यात्रा के संस्मरण हैं, पर वहां के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, समाज की छवियां यहां भूले-भटके ही मिलेंगी।  यहां अगर मिलेगी,  तो घुमक्कड़ के मन की उन्मुक्त भटकन। उस भटकन से कोई मन मिला सके तो यात्रा का आनंद ज़रूर मिलेगा। रेखा उप्रेती


मई 31, 2019

मैं और रेखा दी अभी-अभी वियना पहुंचे हैं| सुबह दिल्ली एयरपोर्ट से उड़ान भरते ही हम दुनियादारी को पीछे छोड़ आए हैं और ख्वाहिशों के पंछियों को खुले आसमान में। लिस्बन में होने वाली अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कॉन्फ्रेंस में भागीदारी के लिए निकले हैं और बीच राह में से, ये दो-तीन दिन चुराकर हमने अपने बटुए में डाल लिए हैं, वियना और प्राग के नाम।

तनया ने यहां एक अपार्टमेंट में हमारे लिए कमरा बुक किया है। कमरा काफ़ी बड़ा है, कुछ वीरान-सा भी। कमरा क्या, पूरा अपार्टमेंट ही वीरान है। टैक्सी से उतरते ही एक बड़ी-सी इमारत के बंद दरवाज़े के बाहर हम अपने को खड़ा पाते हैं।  तनया ने बताया था कि चाभी दरवाज़े पर ही मिलेगी, कोई कोड डालकर… पर हम असमंजस में हैं। सुबह के घर से निकले शाम को अनजाने शहर पहुंचे हैं और अब यह बंद दरवाज़ा हमें मुंह चिढ़ा रहा है। कहां कोड डालें और कहां से चाभी मिलेगी?

काश! खुल जा सिमसिम कहते ही हर दरवाज़ा खुल जाता।

रेखा दी अपार्टमेंट की मालकिन को फोन कर रहीं हैं। कुछ सुराग हाथ लगा है। सिमसिम आखिर खुल ही गया है। अब एक लंबा-सा गलियारा है। लगभग अंधेरा सा… आगे सीढ़ियां हैं। किसी भुतहा हवेली सा सन्नाटा है। हमें तीसरी मंज़िल पर जाना है। साथ में सामान भी लादा हुआ है। किसी तरह सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते सब कुछ ऊपर चढ़ा दिया है। अब…!!

एक और दरवाज़ा, पर इस बार सिमसिम की चाभी हमारे हाथ में है। अंदर धुंधला – सा प्रकाश है, जो वियना के आकाश में ढलती सांझ के झुटपुटे रंग से बना है। बड़े से घर की अजनबीयत डरा रही है, बिजली का स्विच नहीं मिल रहा। मोबाइल की टार्च के सहारे हम अपना कमरा नंबर 5 ढूंढ रहे हैं… किचन से होकर एक गैलरी दूसरी तरफ़ जाती है। उस पर पैर रखते ही झक से बिजली जल उठी है। हमारे आगे बढ़ने के साथ-साथ रास्ता उजियारा होता जा रहा है और आखिर हम इस कमरे में पहुंच गए हैं।

सुबह जल्दी नींद खुल जाती है। अभी शायद पांच भी नहीं बजे पर सूरज की रोशनी भीतर पसर गयी है। मैं खिड़की से बाहर झांकती हूं। अजनबी शहर की सूनसान सड़कें बाहर बुला रही हैं। हमारे पास विएना घूमने के लिए यही एक दिन है। कल सुबह प्राग के लिए निकल जाना है। दिल्ली हवाई अड्डे से हल्दीराम के लड्डू खरीद लिए थे, साथ में मसाला चाय और खाखरा …यही हमारा नाश्ता है, एयर-इंडिया में मिले भोजन से बचा कर लाई हुई अचार की डिबिया के साथ…।

अभी सुबह के सात बजे हैं| सड़क पर निकल हम अपनी राह ढूंढ रहे हैं। सामने ट्राम स्टेशन है पर अभी कोई आवाजाही नहीं दिख रही। एक कर्मचारी से, जो अभी-अभी अपने कार्यालय की खिड़की खोल रहा है, हम जानकारी लेना चाह रहे हैं पर वह अंग्रेज़ी में कुछ समझने-समझाने को तैयार नहीं है| कुछ शब्दों, कुछ इशारों से वह हमें सड़क के दूसरे छोर पर चले जाने की सलाह दे रहा है…..
चलते-चलते काफी दूर आ गए हैं। अब सामने एक कॉफ़ी हाउस दिख रहा है। वाह! विएना के साथ मुलाकात की इससे बढ़िया शुरुआत क्या होगी… बाहर खुले अहाते में मेज-कुर्सियां सजाता एक भला-मानुस बता रहा है कि कॉफ़ी 8 बजे से पहले नहीं मिलेगी। वियना में हमें कहां-कहां जाना चाहिए और कैसे? इस सवाल पर उसने कुछ सुझाव ज़रूर दे डाले हैं।

स्क्रॉनब्रन पैलेस
स्क्रॉनब्रन पैलेस

सड़क किनारे कुर्सियां डालकर कॉफ़ी पीते हुए, तस्वीर खींच कर प्रोफाइल पिक्चर में लगा दी है। मित्रों, संबंधियों के सन्देश आ रहे हैं। ‘लाइफ़ हो तो ऐसी’ …

चौबीस घंटे के लिए विएना भर की सवारी कराने वाला टिकिट खरीद लिया है। अब ट्राम, मैट्रो, बस में आवाजाही कर सकते हैं। कहाँ, कैसे पहुंचा जाए, यह जिम्मेदारी रेखा दी ने ले रखी है। गूगल मैप खोल-खोल कर वे गंतव्य की दिशाएं खोज रही हैं। वैसे भी दिशा ढूंढने में वे माहिर हैं। अपना लक्ष्य साधने के साथ-साथ दूसरों को राह दिखाने में भी समर्थ। मैं सिर्फ तस्वीरें ले रही हूं, और सबको भेज भी रही हूं। उन सबको जो मेरी यात्रा की खुशी को साझा कर रहे हैं। कनाडा से मोना उत्साहित होकर पल-पल की ख़बर ले रही है, स्वीडन में भारती है जो हिदायतें दिए जा रही है ताकि सफ़र में परेशानी न हो, रेखा दी की बिटिया तनया हर शहर में हमारे रहने का इंतजाम कर रही है…

अब हम ट्राम में बैठे हैं… वियना के चौक-चौबारों के बीच से गुजरते हुए। यह शनिवार की सुबह है| अलसाया शहर धीरे धीरे जाग रहा है। ट्राम लगभग खाली है और सड़कें भी। लगता है वियना ने कुछ फ़ुरसत के पल हमारे लिए रख छोड़े हैं। हमें भी कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि हमें कहीं नहीं पहुंचना है। हम विएना में हैं, हम एक सपने को जी रहे हैं। दौड़-दौड़कर सब कुछ छू लेने की आकांक्षा नहीं है। एक खूबसूरत शहर में बेवजह भटक रहे हैं, वहां की हवा में सांस ले रहे हैं….।

तस्वीरें देखकर शैलजा दी लिख रहीं हैं – “क्या बात है यार! हर चौक और चौराहे पर मर जाने को जी चाहता है|” तस्वीरों में मोज़ार्ट की गली भी है जिसे मैंने उनके म्यूज़ियम बन गए अपार्टमेंट की खिड़की से लिया है। कितनी स्वर-लहरियां इन झरोखों से पंख पसारे गुज़री होंगी… तीन मंजिले इस संग्रहालय में प्रवेश करते ही बीती शताब्दियों के फ़ासलों को पार कर हम एक संगीतमय काल-खंड को अपने से रू-ब-रू पाते है, जो बीत कर भी बीता नहीं है, समय के आरोह-अवरोह को साधता, बदलते युगों की लय से ताल मिलाता अब तक तरंगित है।

करीने से संजो कर रखी गयी मोज़ार्ट की एक-एक वस्तु स्वयं में एक कलाकृति प्रतीत होती है| समय का अंतराल वायलिन की धुनों में विलीन हो रहा है। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना का इतिहास वस्तुत: योरप के सांस्कृतिक इतिहास का साक्षी रहा है। एक तरह से इसे योरप की सांस्कृतिक राजधानी कह सकते हैं। संगीत की दुनिया में अपना परचम लहराने वाले मोज़ार्ट और बीथोवन जैसे कलाकारों की कर्मस्थली ही नहीं बल्कि साहित्य, रंगमंच, ऑपेरा तथा ललितकलाओं का केंद्र भी रहा है वियना।

सेंट स्टीफन कैथेड्रल (आरेख- अयन उप्रेती)

सेंट स्टीफन कैथेड्रल के अन्दर बाहर खूब रौनक है। बारहवीं शताब्दी में निर्मित इसकी अलंकृत संरचना जितनी भव्य है उतनी ही जीवंत भी। भीतर जाकर देख रहे हैं, विभिन्न देशों से आए पर्यटकों का हुज़ूम…. संगीत की लहरों में डूबता-उतरता खुशनुमा माहौल। वहां पहुंचकर हम सचमुच खो जाते हैं| रंग, रोशनी, रौनक के बावज़ूद सुकून भरी राहत भीतर उतर रही है। … “और मैं एकांत होता हूं समर्पित…” अज्ञेय की पंक्तियां अनायास ज़हन में जाग रही हैं। बाहर चौक में चहल-पहल है। भारतीय पर्यटकों की एक टोली को चर्च के इतिहास का किस्सा सुनाता गाइड, शाम को होने वाले किसी संगीत समारोह का न्योता देता एक नवयुवक, हृष्ट-पुष्ट घोड़ों पर बंधी बग्घी की टक-टक करती चाल और उसकी सवारी करते यात्री, सुहाना मौसम और गुनगुनी धूप… पता नहीं कितनी देर हम वहां बैठे रहते हैं।

दोपहर बाद हम स्कॉनब्रन पैलस पहुंच गए हैं। उसका बड़ा-सा अहाता बहुत सुंदर है। करीने से सजे उद्यानों के किनारे-किनारे बेंच लगी हैं| बैठने की चाहत कुलबुला रही है पर हर बेंच पर कोई न कोई लदा हुआ है| थोड़ा आगे जाने पर एक रेस्तरां है| महल के पार्श्व को गुलज़ार करता हुआ| तश्तरियों से उठता महकता धुंआ, प्यालियों की खनखनाहट, छुरी-कांटों की खटपट, मेज-कुर्सियों के इर्द-गिर्द मंडराती धीमीं आवाजें….. पास ही ढलान पर उतरती सड़क के किनारे-किनारे नीची मुंडेर दिख रही है। मैं वहीं बैठ गयी हूं। आते-जाते अनजान लोगों को निरुद्देश्य निहारते रहने का भी अपना सुख है।
रेखा दी अभी फ़ोन पर व्यस्त हैं।

ओपेरा हाउस

प्राग जाने के लिए बस बुक करवाई जा रही है। वास्तव में इस यात्रा की सारी रूप-रेखा इन्हीं की बनाई हुई है| मुझे उकसाने से लेकर यहां पहुंचाने तक| आगे का इंतजाम भी उन्हीं के जिम्मे है, जिसे वे सहज भाव से निभा रही हैं| कुछ ही रिश्ते होते हैं जहां हिसाब-किताब नहीं रखना पड़ता, भूल-चूक, लेनी-देनी की रसीद नहीं सम्हालनी होती…..

इधर धीमी-धीमी हवाओं में पेड़ों की पत्तियां झूम रही हैं, दो गोल-मटोल से कबूतर मेरे इर्द-गिर्द ठुमक रहे हैं| मैं वाट्सऐप पर तस्वीरें डाल रही हूं| कई तरफ से सन्देश मिल रहे हैं, यहां ज़रूर जाना, ये ज़रूर देखना, ये खाना, वो ज़रूर ट्राई करना…अच्छा लग रहा है| कितने लोग हमारी यात्रा में शामिल हैं, जहान भर को कारवाँ में साथ लिए चल रहे हैं| सबकी सुन रहे हैं, मन की कर रहे हैं|

“मैं वहीं हूं| बहुत मज़ा आ रहा है। ” मेरी भेजी तस्वीरों के नीचे वाधवा मैम लिखती हैं|
“खूब मस्ती कीजिए, दोबारा जाने कब मौका मिले.. जा सिमरन!! जी ले अपनी ज़िंदगी..” यह मोना है…|

कहते हैं बांट लेने से दुःख हल्का हो जाता है पर कोई ख़ुशी बांट ले तो हम खुद हवा में तैरने लगते हैं| … मैं देख रही हूँ, बहुत से और लोग मुंडेर पर आकर बैठ गए हैं| हम थोड़ा सुस्ता लेने के लिए वापस अपार्टमेंट जा रहे हैं| ‘..गुर्तल’ ये हमारे इलाके का नाम है। मुझे यह नाम कुछ परिचित सा जान पड़ता है, जैसे पंजाब के किसी कस्बे का नाम हो।  कल प्राग के लिए निकलना है| तनया ने बस बुक कर दी है| सड़क किनारे खड़ी एक टैक्सी की ड्राइवर से रेखा दी पूछ रही हैं, क्या वह सुबह 6 बजे हमें बस के अड्डे पर पहुँचा सकेगी? भाषा के अवरोध को अंग्रेज़ी से पाटना यहाँ संभव नहीं… बहुत मुश्किल से वह हमारी बात समझ पा रही है| फोन नंबर ले-देकर बात पक्की हो रही है, वह सुबह 5 बजे हमें पिक कर लेगी।….

शहर से थोड़ा परिचय हो गया है, रास्ते पहचान में आ रहे हैं, अपार्टमेंट भी अब अपना लगने लगा है| वहां एक-दो कमरों में और लोग भी रह रहे हैं| किचन में कभी-कभी टकरा जाते हैं| अभिवादनों का आदान-प्रदान हो रहा है| शाम को हम डेन्यूब किनारे जाने वाले हैं, फिर ओपेरा हॉउस के आस-पास भटकेंगे| चाय पीकर नई जान आ गयी है| हम फिर से तैयार हो रहे हैं| नीचे जाकर ट्राम और फिर डेन्यूब के किनारे…

ऊपर पुल से झांककर तृप्ति नहीं होती| हम सीढ़ियों से नीचे उतर आए हैं| नदी के दोनों किनारों पर पैर नीचे लटकाए युवाओं की भीड़ है| कुछ देर किनारे बैठकर हम बहती नदी संग बह रहे हैं| डेन्यूब के किनारों से उठती हुई दीवारों पर रंग-बिरंगे चित्र बने हैं| ग्राफिटी!!

वियना की यह शाम हमें किसी स्क्वेयर के आस-पास बितानी है, जहां ओपेरा चल रहा है। ओपेरा हॉउस के बाहर एक बड़ी स्क्रीन पर भीतर चल रहे नाटक का सीधा प्रसारण दिखाया जा रहा है| हम कुछ देर भीड़ का हिस्सा बन उसे देख रहे हैं और फिर कुछ दूरी पर बने फव्वारे की गोलाकार मुंडेर पर बैठकर, नाटक देख रहे लोगों के उत्साहित चेहरों को| लगता है यह बड़ा सा चौराहा ही अब एक रंगमंच में तब्दील हो रहा है, जहां हम दर्शक भी हैं और दृश्य का हिस्सा भी.. पीछे चल रहा फब्वारा अनवरत थाप सी दे रहा है, जिसमें मन की विश्रांति घुल रही है| …. यह रंगमंच है या कोई फ्रेम, जिसमें हम चित्रवत जड़े जा चुके हैं!!

कॉफी हाउस वियना

रोशनी से जगमगाती एक लम्बी सड़क पर हम चलते जा रहे हैं| लोगों के हुजूम की आवाजाही दोनों तरफ चल रही है| रेखा दी आगे निकल गयी हैं, मैं तस्वीरें लेने के चक्कर में पिछड़ गयी हूं। अलग-अलग चलते हुए भी हम साथ हैं, ठीक वैसे ही जैसे साथ-साथ चलते हुए भी हम अपनी-अपनी डगर नापते रहते हैं| हम दोनों की मित्रता ऐसी ही है| दो रेखाएँ समानांतर..जो एक दूसरे को कभी नहीं काटतीं।

“हवाओं ने बता ही दिया होगा, हम वियना पहुंच गए हैं|”
मैं वाट्सऐप ग्रुप में लिख रही हूँ| लिस्बन में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन में भाग लेने वाले कुछ प्रतिभागियों को अनूप दा ने जोड़ लिया है ग्रुप में| कुछ लिस्बन पहुँच गए हैं, कुछ राह में हैं| सब अपने अपने अपडेट्स डाल रहे हैं… “हाँ, अब समझ में आया सुबह-सुबह विएना की ओर से आने वाली हलकी-हलकी खुशनुमा बयार का मतलब”

एक स्माइली के साथ अनूप दा का उत्तर आता है| मैं और रेखा दी मुस्कुरा देते हैं| अनूप दा से हमारा परिचय बहुत पुराना नहीं है, मेरी मुलाकात तो उनसे दो ही बार हुई है, एक बार भोपाल के विश्व हिंदी सम्मलेन में और एक बार दिल्ली में| लेकिन हिंदी के प्रति उनके अनुराग ने विश्व-भर के हिंदी जनों को उनका आत्मीय बना रखा है। मोबाइल की घंटी ने स्वप्निल तन्द्रा से जगा दिया है| जिस टैक्सी को सुबह आना था, वह भाषा के गड़बड़ झाले में फँस गयी है| रेखा दी उसे समझाने की नाकाम कोशिश में लगीं हैं| मैसेज कर रही हैं| पर बात कुछ बनती नहीं दिख रही| हमने भी हथियार डाल दिए हैं| अब ‘ऊबर’ ही हमें उबार सकती है।

…सुबह बस के ठिकाने में पहुँच कर हम चैन की साँस लेते हैं| प्राग जाने वाली बस, बस आने ही वाली है| रेखा दी का हेयर-ब्रश कहीं छूट गया है| “हर शहर में कुछ न कुछ छोड़ आना चाहिए” मैं कह रही हूँ| मुझे गीत याद आ रहा है- ‘.. कौन कहे इस ओर..तू फिर आए न आए…’


रेखा उप्रेती दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज में हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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