100 टका शुद्ध न्यूज खुद झूठ-मक्कारी का कफन होती है दोस्त

प्रिय न्यूज एंकरों/प्रेजेंटेटरों

आज फिर मैं एक चिट्ट्‌ठी लिखने की कोशिश कर रहा हूं। जो कि चिट्‌ठी जैसी बिल्कुल नहीं है। दरअसल, जब भी मैं यू ट्यूब या सोशल मीडिया पर न्यूज बांचते हुए देखता हूं तो बहुत जल्द ही खीझ जाता हूं। टीवी मैं नहीं देखता। न तो वह पसंद है और है भी नहीं। बचपन से आज तक कुछ घंटे कुल देखी होगी। खीझने की वजह यह है कि ज्यादातर न्यूज एंकर का वैचारिक झुकाव, समर्थन, पक्ष-विपक्ष साफ साफ पता चलता है।

मुझे ऐसा लगता है कि न्यूज लिखते, बोलते समय भाव शून्य हो जाना चाहिए। यह चिट्‌ठी लिखने का ख्याल अभिसार शर्मा का एक वीडियो देखकर आया। अभिसार शर्मा हों या विनोद दुआ और कई बार रवीश कुमार तक को खबरें पढ़ते हुए देखकर साफ पता चल जाता है कि ये लोग अपनी बात थोप रहे हैं। न्यूज कम व्यूज का डोज ज्यादा दे रहे हैं। हालांकि इस मामले में रवीश कुमार अच्छे से बैलेंस करते हैं।

दोस्त, आलोचना कीजिए, कठोर रुख रखिए लेकिन भाव शून्य रहिए। यही प्रोफेशन का तकाजा है। देखिए मैं न तो एंकर हूं और न ही प्रेजेंटेटर। बल्कि मंच तक से फोबिया है। लेकिन एक दर्शक के तौर पर यह सब बातें महसूस करता हूं। हालांकि मैं भी अपनी पसंद के एंकर वाले कार्यक्रम देख लेता हूं। उस पर कम खीझ आती है। भक्त, चिरकुट न जाने किस किस कैटेगरी में बांट देता हूं।

अखबार में काम करते हुए एक बात अक्सर एक बात सोचता हूं कि इस माध्यम की विश्वसनीयता अब तक सबसे अधिक क्यों बनी हुई है। इसके एक जवाब पर पहुंच पाया हूं। दरअसल छपी हुई न्यूज में कोई भी भाव नहीं के बराबर होता है। कौन लिखा है, लिखने वाला किस विचारधारा का है, यह सामान्य खबर में कभी पता नहीं चलता। लेकिन वीडियो विजुअल माध्यम में ऐसा नहीं है। दर्शक न सिर्फ आपकी कही गई बातों को सुनता है बल्कि चेहरे के हाव-भाव से एक संदेश ग्रहण करता है। ऐसे में जब आप खबर के अनुसार अपने चेहरे का रंग बदलते हैं तो वह पॉजटिव-निगेटिव मैसेज अपने अनुसार ले लेता है।

अभिसार शर्मा और दुआ साहब जब चौकीदार और प्रधानसेवक जैसे उप नामों का इस्तेमाल करते हैं तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। उलटे खीझ पैदा करता है। दरअसल इसमें खुन्नस झलकती है। मुझे नहीं पता कि वे कितना खुन्नस रखते हैं, रखते हैं भी या नहीं। पर ऐसा लगता जरूर है।

किस तरह मुलायम लहजे के साथ अपने विरोधी को कोसा जाता है, कम से कम यह बात तो क्रांतिकारी शायर हबीब जालिब से जरूर सीखनी चाहिए। दोस्तों आप सब हबीब जालिब को तो जानते ही होंगे। वही हबीब जालिब, पाकिस्तान वाले। जनरल जिया और अयूब को उन्होंने क्या कुछ नहीं कह डाला। जिया को जुल्मत को जिया तो अयूब को सुबह-ए-बेनूर तक कह डाला।

आप हबीब जालिब साहब को शायरी करते हुए गौर से उनके चेहरे को देखें तो समझ पाएंगे कि उनके चेहरे पर उस वक्त कोई भाव नहीं होता। वे करीब-करीब भाव शून्य होते हैं और लहजा बेहद नरम होता है। लेकिन जो कह रहे होते हैं वह आग होता है। स्याह सच्चाई होती है। दोस्तों, अगर किसी न्यूज को एकदम साफ, सफेद कफन की तरह रख दी जाए तो यकीन मानिए कि वह सच में झूठ, मक्कारी का कफन बन जाएगी। यकीन मानिए कि एकदम 100 टका शुद्ध न्यूज में इतनी ताकत होती है कि वह सही जगह हिट कर सके। दर्शक, पाठक बहुत अच्छी तरह समझता है आपका मकसद।

आपका न्यूज दर्शक
(यह खत प्रवीण ने लिखा है। प्रवीण पेशे से पत्रकार हैं. स्वभाव से क्रांतिकारी कवि. भूख-गरीबी और शोषण देखते ही कलम आग उगलने लगती है. थोड़ा जिद्दी, थोड़ा-हठी. बेहद भावुक और संवेदनशील )

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