मैं कोई धर्म बनाता तो ईश्वर को ‘पापा’ बनाता और खुद ‘बेटी’ होता

डॉक्टर प्रभात उप्रेती
डॉक्टर प्रभात उप्रेती 

अंदर तक वादेसवा की तरह कोई सकूनी लफ़्ज मुझे लगता है तो वह है ‘पापा’। ऐसा कि जैसे अनहद नाद सुन लिया हो। अंकंडिशंड लव के संबंधों का बेहतरीन भाव। बब्बा, बौज्यू, बाबू ,डैडी आदि शब्द …और अंजान प्रदेश से आया यह स्वर, ओह…!  ‘फिक्र’ जो प्यार के संबंधों की जान है, वह इस शब्द में लहरी पड़ी है। इस काल में भी जब संबंधों की वाट लगी है तो एक पुत्री का अपने पिता को सैकड़ों मील से साइकिल में लाना, एक पुत्री का अपने कोरोना ग्रसित पिता के लिए हजारों मील खतरे भरी यात्रा करना, एक पुत्री का पूरे बीस साल तक अपने खोये पिता को तलाशना… ऐसी कितने ही किस्से दर्ज हैं बेटियों के खाते में।

मीलों पैदल यात्रा करके जब मैं घर के दरवाजे पर लस्तपस्त हो कर आता था तो दरवाजा खोलते ही मेरी बेटी का ‘ पापा’ कहना ऐसा लगता था जैसे किसी संत ने सर से पांव तक हाथ फिरा कर थकान हर ली हो या हजारों गर्म पानी के समबाथ से नहा लिये हों। एक आठ साला बच्ची के पिता शराबी थे। स्कूल में जब अध्यापिका ने कहा, “तुम्हारे पिता तो पीते हैं ना !” वह शर्मा गयी पर उसने कहा, “हां पीते हैं पर हकाहाक नहीं करते।”

एक पुत्री ही अपने पिता को ऐसे बचा सकती है। एक पिता ने पी-पी के परिवार की जिंदगी अजाब की हुई थी। बेटी की शादी हुई तो उसने पिता से कहा, “पापा ! विदा होते समय पिता अपनी बेटी को गिफ्ट देते हैं आप भी मुझे दो”। पिता ने कहा “क्या बोल क्या चाहिए तुझे!” वह बोली , ”आज से ये पीना छोड़ देना। यही गिफ्ट चाहिएं”

पहाड़ की चढ़ाई वायरस कम चढ़ पाया पर यहां की घटनाओं में बेटियों ने अव्वल कहानियां रचीं।

मैं धर्म बनाता तो ईश्वर को महबूब नहीं, पापा बनाता…
जब मैं बिमार था तो मेरी बेटी एम्स के धक्के खाते घंटों लाइन में खड़ी मेरा नम्बर लगाती। भीड़ में सीट न मिलने पर वह बेचैन रहती कि पापा किसी तरह बैठ जायें। ऐसी फिक्र दुनिया में बेटी की सिवा किसी को नहीं हो सकती। मैं सूफी मत की तरह अगर कोई धर्म बनाता तो उसमें ईश्वर को महबूब नहीं, पापा बनाता और मैं खुद बेटी होता।

ऐसे दृश्य तकनीकी विकास में दुलर्भ हो सकते हैं पर यह मानवीय मूल्यों के विकास का अदभुत जीनोम है, परिवार के विकास का कीर्ति स्तम्भ है जो बेटियों में ज्यादा समाया है। इस विकास ने सर्वाइवल की क्रूरता को मलास दी होगी। पारवारिक मूल्यों की परवरिश से ही व्यक्ति की समाज में एक्टिविटी निर्धारित होती है। बहुत से टेररिस्ट, तानाशाह नुमा व्यक्तियों को इस संवेदना के स्कूल से प्यार न मिलता होगा। इस विकास में ‘मां’ शब्द ने तो भावुकता के झंडे गाड़े, आंसुओं के दरिया बहा दिये पर ‘पिता’ शब्द अकड़ा, उपेक्षित रहा। कारण आदि काल तक बाप आइडेंटीफाइड ही नहीं हुआ होगा, सभी बच्चे सत्यकाम होते होंगे। बाद में यह शब्द इस्टैबिलिस्ड तो हुआ पर सत्ताधारी होने से बाप शोले का गब्बर सिंह हो गया। हालांकि आज के प्रोगैसिव समाज में वह यार! डियर! भी हो गया।

पिता को इतनी रेकग्निशन न मिलने का कारण ‘मर्द को दर्द नहीं होता’वाली बात भी है। जब कभी ऐसे संवेदना के मौके आते हैं, यथा बच्चों का घर आना, जाना उसमें पापा अक्सर बस इतना ही कहता है ‘आ गये’ फिर गायब हो जाता है पर छुपके- छुपके वह अपने बच्चों की हर एक्टीविटी देख रहा होता है। आंखों के आसुओं को वह मर्द होने के चक्कर में निकाल नहीं पाता।

मेरे पिता, सरल पिता, एक बेहतर इंसान, अध्यापक थे। पर पिता पुत्र के बीच जो एक अंतराल स्वाभाविक सत्ता के रहते आ जाता है, वह बना रहा। ऐसी स्थिति ही नहीं आयी कि हमारे बीच कोई इंटरैक्शन हो बस वो मेरे पिता थे, मैं उनका पुत्र। कथन, जब ‘पिता का जूता पुत्र के पांव में आ जाये तो दोनों दोस्त हो जाते हैं’ यह कम दिखता है । अक्सर वह दोस्त कम, ‘जेनरेशन गैप’ ज्यादा हो जाते हैं। आज तो बच्चे, माता- पिता पर भारी हैं, उनका शोषण भी करते हैं पर माता पिता भी इस कैरियैरिस्ट की आंधी में उन्हें पैकेजेज बनाने पर तुले हैं। बेटी पिता के संबंध तो अथाह समंदर होते हैं पर बेटे पुत्र के संबंध कुछ जटिल देखे गये हैं। अधिक प्रोगेसिव बच्चे अपने याद दोस्तों के बीच मेरा बाप तेरा बाप का संबोधन करते भी दिखते है।

बेटियों पर नंदकिशोर हटवाल की कविता ‘बेटियां’ और पिता पुत्र के संबंधों को लेकर रूसी उपन्यासकार तुर्गनेव के उपन्यास ‘पिता पुत्र’, शंभु राणा की किताब ‘माफ़ करना हे पिता’ मुझे विश्व की अमर कृतियां लगती हैं। इन में पिता पुत्र दोनों के बीच आर्थिक, सामाजिक, मनोविज्ञान के चलते संबंधों को लेकर रचित कश्मकश फन्ने खां है । मेरे अपने पुत्र के संबंध प्राकृतिक हैं। मेरी बिमारी में रात -रात जाग कर उसने खूब मेरी टहल की, नींद न आने पर कई राग मालकोस, बंसी की धुन की डोज दी। एक बार बेहाल दर्द से तन्हा होने पर उसके एक ही संत जैसे अंदर से निकले वाक्य, “सब क्षणिक है पापा!” आप्त वचन से मेरे सारे दर्द, प्यार में बदल गये।

बच्चों के घर आने के इंतजार की बेसब्री, उनके जाने का दर्द, माता पिता गहरे से जीते हैं तो जब बच्चे उन्हें अपनी जिंदगी में शामिल किये बिना विवाह या अन्य फैसला लेते हैं तो यह छाले उनके हदय में जिंदगी भर रह जाते हैं। बढ़ते एकाकी समाज में यह संबंध डम्प हो सकते हैं पर आदमी का अकेले में कोई वजूद है ही नहीं। वह जो है उसके पीछे संबंध ही हैं। पत्नी, बच्चों ने मुझे बीमारी में हथेली पर रक्खा। मेरे बच्चे, महत्वाकाक्षी, कैरियैरिस्ट तो नहीं रहे, पर संसार के जीवों, वनस्पतियों के प्रति उनकी गहरी संवेदना, हर किसी को सम्मान देने का भाव मुझे एक सफल बुलंद, धनवान पापा बनाता है। जीवन के इस षडयंत्रकारी, दुरूह दुर्गम बीहड़ रास्तों में दुलर्भ ऐसे पड़ाव हैं जहां दो जून सकून के बिताये जायें। ’पापा’ का यह नाद स्वर भी एक दुलर्भ पड़ाव है।आप सब के जीवन में बच्चों के साथ यह सकूनी पड़ाव बना रहे, यह दुआ है।


डॉ प्रभात उप्रेती सेवा निवृत प्राध्यापक कुमाऊं विश्व विद्यालय राजनीति विज्ञान. संप्रति- स्वतन्त्र लेखन, सामाजिक कार्यकर्ता।

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