छटंकी दीदी- पता नहीं, तुम जिंदा भी हो या नहीं! जहां भी हो, अभी भी विद्रोही होगी

प्रभात उप्रेती

अनुराधा बेनीवाल की किताब ’आजादी मेरा ब्रांड’ पढ़ते साठ साल पहले की छटंकी दीदी याद आ गयीं। दुबली पतली, धान-पान, विद्रोही, गुड़वान गुड़ खानी, आनंद में भीगी, मुस्कुराती, गुनगुनाती, बिंदास, खुला दिल-दिमाग, बेवक्त वर्जनाओं के खिलाफ, नो कंडीशंनिग। एक बार उनकी बैठक में एक दबदबे वाले बुजुर्ग आये। उन्होंने किसी धनी प्रतिष्ठित विधुर से उनकी शादी के लिए वही पुराना लालच दिया राज करेगी’वाला।

छटंकी, धड़धड़ाते बैठक में घुसीं, बुजुर्ग से कहा,बाहर। अपनी लड़की को बनाना महारानी। आलम हुआ हकबक!
बुजुर्ग तमतमाये, बोले, इस बित्ते भर की बालिश्त भर की छटंकी जुबान गज भर की, इतनी हिम्मत! सम्भाल लो इसे वरना खानदान का नाक कटवाऐगी।

आज से साठ साल के जमाने में वह अलग ही एक दास्तां थी।
दीदी कविता की तरह शतरंज खेलतीं। घोड़े की चाल उनकी प्रिय चाल थी। कहतीं लो जी आयी घोड़े की चाल। नहीं गलेगी अब हाथी की दाल। बड़ों बड़ों को दो मिनट में मात। हाॅस्टल के लड़के मुझ किशोर से उन्हें अपने प्रेम निवेदन भेजते। वह हंसते हंसते मजे लेती। कभी कहती, छितरवे लोग!

कभी वह कहतीं, प्रभात ! कभी मन करता है झोला चिमटा लेकर निकल पड़ूं कहीं दूर।
दुःख में, सुख में सब कुछ खतम कर झोला चिमटा लेकर कहीं निकल जाने की परम्परा भारत में बहुत पहले की है। पता नहीं उन्हें दुःख था कहीं का या सुख अपने में डूबा। एक दिन मैं उनके घर गया। वह थी नहीं। मेरी ही तरह किशोरी उनकी छोटी बहन ने एकाएक मेरा हाथ पकड़ा, अंदर ले जाते कहा, बैठो, दीदी आने वाली है। ऐसा करते उसका लाल चेहरा तो लाल हुआ कि मैं शरमा के भागने लगा कि दीदी आ गयी। हाथ पकड़ कर कहा, अरे भाग कहां रहा है प्रभात! गुड़िया तुझे अच्छा मानती है, उससे बात किया कर।

उसके बाद पता नहीं सब अकस्मात सब विस्मित हुआ वह संसार ही जादू की तरह गायब हो गया।
वह अंदर से डैमोके्रटिक थीं, अनडैमोक्रेटिक समाज में। एक लेख में लिखा था, उनके दिखाए मार्ग पर चलें। उसे पढ़ के बोलीं, ये कौन होते हैं जी कहने वाले, उनके मार्ग पर चलो! तुमम चलो, गर तुम्हें अच्छा लगता है। धर्म उपदेशक, ईजा बौज्यू सब लगे हैं, अरे यार हम क्या हैं! दिमाग तो हमारा भी ठैरा वल।

यह वर्जनाऐं!
जब मैं बीए में पढ़ता था तो एक युवती घर आयी। वह मेरे साथ कैरम खेलने लगी। अपनी उम्र, अपने चंचल स्वभाव से वह, वह हरकतें करने लगी जिसे अदाऐं कहते हैं। बेइमानी करने लगी तो मैंने खेल छोड़ दिया। तब इजा ने कहा, खेल ले! क्या हुआ!तुम्हारी बहन हुई! दिमाग भन्ना गया। जब मेरी बहनें हैं तो क्यों किसी को जबरदस्ती बना लूं बहन!
हमारे वहाँ किसी लड़की से बहन या पत्नी के अलावा क्या कोई रिश्ता नहीं हो सकता!

एक बार अपने ही स्टाॅफ में एक प्राध्यापिका से सबके सामने कह बैठा कि आप इस साड़ी में बहुत सुंदर लग रही हैं । सब अवाक! मैंने क्या गुनाह कर दिया! कि मिर्ची लग ली। उन्होंने मेरे घर आ कर कहा , उप्रेती जी भोले कितने हैं यह कह दिया। मुझे लगा उसे अच्छा लगा। किसी लड़की से योंही सुंदर कहना जुल्म हुआ। बुढ़ापे में तो यह एक सठियाने का मामला है। गुलामी की हीन भावना से ग्रस्त हम लोग।

छात्र जीवन मैं, मेरे मित्र दुखानंद और साथी एक अंग्रेजी फिल्म देखने नैनीताल कैपीटल में गये। कुछ साथियों ने तो टाई ही लगा ली थी। अंग्रेजी हमें तो आती थी नहीं। सारी पिक्चर में यही समझ आ रहा था, आई लव यू, आई हेट यू। अचानक हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और जोर से हंस पड़े। हम क्या हंसे, सारा हाॅल हंसने लगा और एक अट्टाहस सारे हाल में गूंज गया। शायद किसी को समझ में नहीं आ रहा था पर ये कौन स्वीकार करे!

एक बार कालेज में एक प्राध्यापक पढ़ा क्या रहे थे, सर झुकाये किताब बांच रहे थे। न आवाज, न अभिव्यक्ति, न ज्ञान। बैक बेंचर हम हुएइस पाठ पर अचानक मैंने अपने बगल के साथी को देखा और अचानक हम दोनों हंस पड़े। सारी क्लास चाौंक कर हमे देखने लगी। प्रध्यापक ने मुझे गैट-आउट कहा और हम ढीटों की तरह निकल लिए।
सेमीनार में एक प्रतिष्ठिति,धनी मानी नेता को चमचागिरी के लिए पेपर पढ़ने के लिए बुलाया था। वह लोकल अखबार से लिया, कट एण्ड पेस्ट सा मैटर बोल रहे थे। अझेल हो रहा था।

अचानक मुझे चिल्लाने की इच्छा हुई और एक चीख मेरे मुंह से निकल गयी। मैं बाहर निकल गया।
बाद में एक्सप्लनेशन! क्यों चिल्लाये! बोला, बिच्छू ने काट दिया।
बौद्धिकता का मर्डर खुले आम बर्दाश्त न हुआ। उस भाषण पर चिल्लाने की इच्छा तो सबको रही ही होगी।
समाज की अवधारणों से जूझना मजाक नहीं। मैंने सरे आम घोषणा की थी कि कन्या दान तो करूंगा नहीं पर दो दो कन्या दान करने पडे़।

अपने बौद्धिक मित्र से मोदी जी की आलोचना कर बैठा। वह उछल गये। लोगों के अंदर ऐसा जो भरा है, उससे दीगर टोलरेट ही नहीं। इसीलिए सारे विश्व में लोकतंत्र खतरे में है, पूंजीवाद का कहर छा रहा है। साठ साल में हमारी मानसिकता में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। राजनैतिक डोग्मा, वर्जना से हो लिये। एक मेरा अकेला ब्लाइंड शिष्य था। मेरा विभाग मेरे घर से सटा था तो मैं उसे अपने घर ही ले आता था। मेरे हैड ने एक दिन कहा, आप कैसे उसे घर ले जा रहे हैं! कॉलेज, कॉलेज है घर नहीं। मैंने तुरंत क्षमा मांग ली।

दूसरे दिन उन्होंने कहा, उप्रेती जी आपने बुरा तो नहीं माना। मैंने कहा, सर मैं गलत था, आपने सही जगह पर ला दिया। मुझे तो लगा क्षमा मांग के मैं पाक हो गया। एक बार मैंने अपने शिष्य अपनी गलती पर क्षमा मांगी। उसने मेरे पांव छू कर कहा सर ! क्यों कांटों में घसीट रहे हैं सर! मैंने कहा, मैं वाकई शरमिंदा हूं। पर वह चेखव के कहानी क्लर्क या छींक की तरह कितने ही दिन मेरे पीछे पड़ गया, सर मांफ कीजिए। क्योंकि उसकी दिमागी हालत ही ऐसे नहीं होने दी है कि गुरू भी अपनी गलती में साॅरी कह सके। उसे लगा गुरूजी टोंट कस रहे हैं।

कंडीशंड लोग, वर्जनाओं को ढोते, ढोवाते हैं। हम वो हो जाते हैं जो हम कभी थे ही नहीं। वह नहीं हो पाते जो हम थे। कितने सताये गये होंगे, इन यातनाओं से। अनुराधा बेनीवाल के किताब से सहमत असहमत की कोई बात नहीं रही। उसे पढ़ कर मुझे लगा मैं अनुराधा बेनीवाल हो गया हूं और उड़ रहा हूं आनंद का अज्रस्व श्रोत बहते, बहकते महकते हुए है। उसे मैंने ऐसे पढ़ा कि एक पंक्ति पढ़ता फिर खो जाता। वह लिखती है, ज्यों त्यों दुनिया घूमती हूं, एक ख्याल पक्का हो जाता है जैसे धरती पर कोई भी समय गलत नहीं है। हर घड़ी कहीं-न- कहीं समय सही बता रही है। ऐसे ही न कोई शहर गलत है, न कोई गली गलत है, न ही कोई इंसान गलत है, कहीं न कहीं सब सब एकदम फिट हैं…..। अपने तक पहॅुचने, और अपने आप को पाने के लिए घूमना, तुम घूमना।

अपने पर अपनी मर्जी से संयम खूब चीज है। वासना का प्रवाह भी संडाध पैदा करता है। पर थोपने पर जिंदगी सजा हुई, लद्दड़ हुई। दीदी!पता नहीं, तुम जिंदा भी हो या नहीं, पर तुम जहां भी हो, तुम अभी भी विद्रोही होगी।
मेरे अवचेतन में अंदर आजादी, विद्रोह के जो बीज तुमने डाले वो बुढापे में अभी तक फल फूल रहे हैं ।
और कभी क्या पता और मिलें अनुराधा! घूमते हुए और तरह से

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