मणिपुर, यही भी एक अनूठा देश है

यात्राएं जीवन का अनूठा अनुभव देती हैं। उन यात्राओं का अनुभव अलहदा होता है जिन यात्राओं पर निकलने से पहले आप पूरी तरह खाली  होते हैं।  नॉर्थ ईस्ट की यात्रा पर निकलने से पहले मैं उसे सिर्फ अखबारों की कतरनों और दिल्ली में पढ़ाई करने आने वाले नॉर्थ ईस्ट के बच्चों के मार्फत ही  जानता था  लेकिन नॉर्थ ईस्ट हमेशा मेरी रुचि का  क्षेत्र रहा ।

हमेशा से उसे और गहरे से जानने और समझने की इच्छा रही । यह यात्रा दिल्ली से तब आरंभ हुई जब नॉर्थ ईस्ट का एक राज्य मणिपुर आदिवासी बिल को लेकर चल रहे आंदोलन के कारण सुर्खियों में बना हुआ था । इसी समय वहां ILP ( Inner Line Permit) को लेकर आंदोलन चल रहा था ।

इन सारी स्थितियों के बावजूद मुझे नॉर्थ ईस्ट के इस  9 (तब ) जिलों वाले राज्य में ख़ासी दिलचस्पी थी। मणिपुर मेरे लिए सिर्फ पर्यटन की जगह मात्र नहीं थी बल्कि शेष भारत के संदर्भ में यहां के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक कायदों के लिहाज़ से भी  महत्वपूर्ण था।

‘ब्रह्मपुत्र मेल’ की एस-5  में सीट नंबर 34  पर रात के 11.30 बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से निकलते ही दिमाग में बहुत कहा- अनकहा , सुना – अनसुना  चलने लगा । इस ट्रेन से दीमापुर तक जाना था और फिर वहां से आगे की यात्रा तय करनी थी,  यात्रा असल में यहीं से शुरू होनी थी, पीछे तो सब पूर्वपीठिका जैसा था।  दीमापुर  पहुंचने के बाद इम्फ़ाल जाने के साधन के बारे में पता किया तो एक नाम सुनाई दिया ‘विंगर’ भला ये विंगर क्या बला है !

खैर जब तक मैं इस बारे में सोचता तभी एक आदमी ने कहा “ भैया चलीं , रेलवे स्टेशन के बाहर से मिलेगा, मुझे भी इम्फ़ाल जाना है और मैं वहीं रहता हूँ ।“ साथ चलने का प्रस्ताव देने वाला यह व्यक्ति बिहार से था और इम्फाल में उसकी दुकान थी।

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इसके बाद विंगर ( कुछ-कुछ मिनी वैन जैसा जिसमें 10 लोग बैठ सकते हैं) में बैठ गया जिसमें 10 लोगों के अतिरिक्त 12 बत्तखें  भी थी  । इन 10 लोगों में 6 लोग मणिपुर के अलग-अलग जिलों से, 3 व्यक्ति बिहार से जो इम्फ़ाल में काम करते थे और एक मैं । विंगर दीमापुर  से चला तो सीधे नागालैंड पुलिस के एक चैक-पोस्ट पर रुका । घने जंगलों से पटा यह क्षेत्र अंधकारमय था । बाहर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था तभी एक छह फुट के वर्दीधारी आदमी ने विंगर के अंदर टॉर्च से देखा और आगे की सीट पर बैठे दोनों लोगों ने उसे अपना कार्ड  दिखाया ।

फिर उसने टॉर्च बीच की सीट की तरफ किया और मुझे देखते ही कहा ‘मयांग’( जो नॉर्थ ईस्ट से बाहर का आदमी हो) अपना परमिट दिखाओ । मैंने उसी त्वरा के साथ कहा परमिट नहीं है । उसने मुझे गाड़ी से बाहर निकाल दिया फिर बाहर उसके ऑफिसर से मिलने के बाद मुझे आगे जाने दिया गया । यह एक नया अनुभव था ।  नागालैंड की सीमा खत्म हुई तो मणिपुर का पहला गांव आया – माओ । लगभग सुबह के 4.30 बजे थे कुछ लोग जग चुके थे, कुछ दरवाजे अभी भी बंद थे । मैंने देखा कि एक घर के  सामने सेना के दो जवान तनी बंदूकों के साथ खड़े हैं । नज़र को थोड़ा और घुमाया तो देखा उनके ऊपर पेड़ के पास भी तनी बंदूक के साथ एक और जवान खड़ा है । मेरे लिए यह सब डरावना और सिहरन पैदा करने वाला था ।

जरा सोचिए कि आप सुबह- सुबह उठें और उठते ही अपने घर के सामने दो अंजान सेना के वर्दीधारी लोगों को तनी हुई बंदूकों के साथ टहलते हुए पाएँ , कैसी प्रतिक्रिया होगी आपकी ? लेकिन मैंने जब वहाँ के लोगों से पूछा तो उनका जवाब था अब तो आदत हो गई है ।  माओ से निकले तो फिर किसी तरह इम्फ़ाल तक ट्रक से पहुंचा । विंगर बीच में खराब हो चुका था  । किसी तरह इम्फ़ाल पहुंचा और मणिपुर को उसकी आंतरिक व बाह्य संरचना के जरिए समझने की कोशिश की ।

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मणिपुर की आंतरिक स्थिति  
कई समस्याओं से जूझता पूर्वोत्तर का यह खूबसूरत राज्य आरंभ से ही उपेक्षा का शिकार रहा है । मुख्यधारा की राजनीति से लेकर मीडिया तक में मणिपुर कभी चर्चा का विषय नहीं रहा  । कभी आया भी तो नकारात्मक रूप में ही ।  इस उपेक्षा और नकारात्मक छवि गढ़ने के कारण भी मणिपुर के लोग अपने को अन्य भारत से कटा और अलग-थलग महसूस करते हैं । लेकिन ऐसी स्थितियां पैदा करने के लिए कौन जिम्मेदार हैं ?

मणिपुर के मानवाधिकार कार्यकर्त्ता धनवीर लाईश्रम कहते हैं कि “मणिपुर राज्य ने भारतीय संघीय ढांचे में शामिल होने से अब तक जितना हो उतना त्याग ही किया है लेकिन उसके बदले में हमें क्या मिला सिर्फ बंदूकें । हमने अपनी भाषा छोड़ी, अपना धर्म छोड़ा लेकिन उसकी कीमत पर क्या मिला आप देख ही रहे हैं । मणिपुर और पूरे पूर्वोत्तर में सरकार ने सिर्फ एक काम किया है लोगों को आपस में लड़ाने का । अंग्रेजों की  ‘फूट डालो शासन करो’ की नीति को ही भारत सरकार मणिपुर में अपना रही है। यहाँ अब नागा, कुकी और मैतैयी समुदायों के बीच आंतरिक टकराव चल रहे हैं।  इस तरह के टकरावों ने मणिपुर के लोगों की एकता और संघर्ष को कमजोर किया है जो इस छोटे से राज्य के हित में बिलकुल ठीक नहीं है ।

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सेना और सुरक्षा को लेकर मणिपुर बहुत चर्चा में रहता है । देश की राजनीति के साथ उसका एक वास्ता सेना के जरिए भी बनता है । इसमें अफ़स्पा कानून की बड़ी भूमिका है । दीमापुर  से लेकर इंफाल तक की यात्रा में इक्का-दुक्का सवारी गाड़ियों के अलावा कतारबद्ध सेना के ट्रक, जीप और बसें ही नज़र आईं । इंफाल में कई दिन घूमने के बाद मैंने देखा की कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ बंदुकें थामे सेना के जवान न खड़े हों । क्या बाज़ार, क्या गलियाँ, क्या खेल के मैदान,  क्या पार्क सब जगह तनी बंदूकें हैं  । एक अजीब सा डर का माहौल चारों ओर नज़र आता है ।  छोटे से इंफाल शहर में सेना की कई टुकड़ियाँ व उनके कैंप हैं जैसे – असम राइफल की कई बटालियन यहाँ है , बिहार रेजीमेंट , सिख रेजीमेंट,  सीआरपीएफ़, आर्मी, बीएसएफ़, से लेकर मणिपुर स्पेशल कमांडो और भी कई ।

एक छोटे से राज्य के छोटे से शहर में इतना सब शायद ही और किसी राज्य में होगा । यह किसी भी नए व्यक्ति के लिए एक  अलग दृश्य हो सकता है । यही नहीं मणिपुर में शिक्षा का हाल भी बुरा है । स्कूल तक की पढ़ाई तो ठीक पर उसके बाद की पढ़ाई के लिए कोई अच्छे कॉलेज नहीं हैं । कब कॉलेज और स्कूल बंद हो जाएँ कोई पता नहीं । मणिपुर में इतने संगठन हैं कि आए दिन किसी न किसी संगठन का किसी न किसी जिले में ‘बंद’ होता है । हिंदी का ‘बंद’ शब्द यहाँ लोगों के जीवन का हिस्सा हो गया है। इसलिए मणिपुर के बच्चों का देश के अन्य राज्यों में पलायन बड़ी संख्या में होता है ।

यह मणिपुर की एक सच्चाई है लेकिन  इसके अलावा भी बहुत कुछ है जो मणिपुर को मणिपुर बनाता है । इनमें से एक है इमा कैथेल बाजार जोकि अब मणिपुर की पहचान बन चुका है । यह दुनिया का सबसे अनूठा बाजार है ।

इमा कैथेल बाजार
मणिपुर की आंतरिक अर्थव्यवस्था में महिलाओं का बड़ा योगदान है।  आंतरिक ‘ट्रेडिंग’ की पूरी व्यवस्था लगभग महिलाओं के हाथों में ही है । इसके कारण भी मणिपुर की महिलाएँ अन्य भारत की महिलाओं के मुक़ाबले ज्यादा आत्मनिर्भर और सशक्त हैं । मणिपुर की महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण का ही प्रतीक है – इमा कैथेल या नुपी कैथेल । मणिपुर की राजधानी इंफाल के बीचों-बीच स्थित इमा कैथेल (Ima Keithel) राज्य की आंतरिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। मणिपुरी भाषा में इमा का मतलब होता है माँ और कैथेल का मतलब होता है बाज़ार

एक तरह से यह माताओं का बाज़ार है । इस नाम के पीछे का एक सीधा कारण जो मुझे नज़र आया वह यह कि इस मार्केट में सभी महिलाएँ लगभग 35 से 60 वर्ष के बीच की होंगी। इस बाज़ार में 10 हज़ार से ज्यादा महिलाएँ काम करती हैं । महिलाओं के द्वारा संचालित यह बाज़ार अपनी एक अलग पहचान रखता है । दुनिया का शायद यह इकलौता बाज़ार होगा जहाँ सिर्फ और सिर्फ महिला दुकानदार ही हैं । यह पूरी तरीके से महिलाओं द्वारा संचालित बाजार है । यहाँ आपको पूर्वोत्तर के खान-पान से लेकर परंपरागत और आधुनिक सामान जो चाहिए सब कुछ मिल जाएगा ।

तीन बड़े-बड़े कॉम्प्लेक्स नुमा आकार में फैले इस बाज़ार में खाने-पीने के सामान से लेकर सब्जी, मछली, बर्तन, कपड़े और घरेलू उपयोग की सभी वस्तुएँ मिलती हैं । मैदानी इलाकों में रहने वाली महिलाओं के साथ-साथ दूरदराज़ पहाड़ी इलाकों में रहने वाली आदिवासी महिलाएँ भी ताजी सब्जी, फल, मछली आदि बेचने बड़ी संख्या में यहाँ आती हैं । अपने तरह के इस अनूठे बाज़ार के इतिहास के बारे में ठीक-ठीक जानकारी तो नहीं है कि ये कब और किन परिस्थितियों में अस्तित्व में आया परंतु इस बाज़ार पर अध्ययन करने वाले व कुछ इतिहास की किताबें बताती हैं कि यह मणिपुर के राजा के शासन काल से ही है ।

तब यह बाज़ार मणिपुर के व्यापार का मुख्य केंद्र था लेकिन समय के साथ कई परिवर्तन इस बाज़ार में भी आए हैं । मणिपुर के मानवाधिकार कार्यकर्ता धनावीर लाइशरम (Dr. Dhanabir Laishram) बताते हैं कि  “यह बाज़ार आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनैतिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र है। मणिपुर के महिला आंदोलन का केंद्र है इमा कैथेल । यहाँ ‘लंच’ के समय महिलाएँ विभिन्न राजनैतिक, सामाजिक मुद्दों पर बात करती हैं । एक तरह से मणिपुरी महिलाओं की राजनैतिक चेतना की प्रयोगशाला के तौर पर इस बाज़ार को  देखा जा सकता है । यहाँ एक आवाज़ पर कई हज़ार महिलाएँ जमा हो जाती हैं लेकिन समय और राजनैतिक पार्टियों के ‘इनवॉल्वमेंट’ और ‘इन्ट्रेस्ट’ के कारण बाज़ार की एकता भी खंडित हुई है । अब मीटिंग से लेकर आंदोलनों में बाज़ार की एक तिहाई महिलाओं की भागीदारी ही होती है । आप देखिए इसी बाज़ार की उपज है मणिपुर का सबसे सशक्त महिला संगठन ‘मइरापाईबी’ (meirapaibi)”। यह बाजार अपने आप में मणिपुर की महिलाओं की संघर्षगाथा का प्रतीक है ।      

इंफाल शहर के ख्वाईरंबन्द (Khwairamband) नामक इलाके में स्थित यह बाज़ार तीन भागों में पुराना बाज़ार, लक्ष्मी बाज़ार और नया बाज़ार नाम से बड़े-बड़े कॉम्प्लेक्स में विभाजित है। इन तीनों में अलग-अलग वस्तुएँ मिलती हैं । जैसे नया बाज़ार में सब्जी, मछली और फल मिलते हैं तो वहीं लक्ष्मी बाज़ार में परंपरागत कपड़े और अन्य घरेलू सामान । इन तीनों कॉम्प्लेक्स को मिलाकर बनता है इमा कैथेल । जिसके अंदर छोटी-छोटी पंक्ति में 15-16 दुकानें  (दुकानें कोई ईंट सीमेंट या टीन से बनी हुई नहीं बल्कि जैसे सब्जी मंडी में होती हैं एक निश्चित स्थान कुछ-कुछ वैसा ही) हैं । बाज़ार का अपना एक सिस्टम बना हुआ है । अंदर दुकानें लगाने के लिए लाइसेंस (license) का होना जरूरी है जोकि IMC (Imphal municipal council) जारी करती है। इसके लिए कुछ पैसे साल के किराए के तौर पर IMC को देने होते हैं ।

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जिन महिलाओं के पास लाइसेंस नहीं होता वह बाज़ार के बाहर पटरी पर बैठकर सामान बेचती हैं । जिनकी तादाद भी बहुत अधिक है । पटरी पर सामान बेचने वाली अधिकांश महिलाएँ इंफाल से दूर पहाड़ी जिलों जैसे – बिशनुपुर, उखरुल, सेनापति, चंदेल, तामेंगलोंग, चुराचांदपुर आदि से आती हैं । इनमें से कुछ महिलाएँ तो पटरी पर बैठकर अपना सामान खुद बेचती हैं तो कुछ महिलाएँ सारा सामान वहाँ दुकान वाली महिलाओं को बेचकर अपने घर चली जाती हैं । यह तो इस बाज़ार की संरचनागत और व्यवस्थागत बातें हुई ।

लेकिन महिलाओं के द्वारा संचालित इस बाज़ार की पॉलिटिकल-इकोनॉमी (Political-Economy) को समझना भी जरूरी है। मणिपुर में ‘मैतेयी’ समुदाय का प्रभुत्व आरंभ से ही रहा जोकि अधिकांशत: मैदानी इलाकों में रहते हैं । मणिपुरी महिलाओं के संघर्ष के इतिहास को भी खंगाले तो मैतेयी महिलाओं ने बड़े संघर्ष किए हैं । राजनैतिक और सामाजिक आंदोलनों के कई मोर्चों पर मैतेयी महिलाएँ संघर्षरत रही हैं । यह एक अलग मुद्दा है लेकिन इस बाज़ार का अध्ययन करने वाली Binota Loitongbam ने कुछ आँकड़े इस बाज़ार के संदर्भ में दिए हैं जैसे- यहाँ 87.07% मैतेयी महिलाएँ सामान बेचने वाली हैं तो वहीं 4.42% मुस्लिम महिलाएँ और  8.50% क्रिश्चियन महिलाएँ (ये ही पहाड़ी इलाकों से आने वाली ट्राइब्स महिलाएँ हैं) हैं ।

इन आंकड़ों को यहाँ देने का मकसद सिर्फ इतना है कि मणिपुर की Socio-Political ढाँचे को इस आर्थिक पहलू के साथ जोड़कर भी देखा जाए । इन महिलाओं में अनपढ़ से लेकर ग्रेजुएट महिलाएँ तक हैं जो यहाँ सामान बेचने आती हैं । शायद ही देश का कोई अन्य प्रांत होगा जहाँ महिलाओं का ऐसा बाज़ार होगा ।

इस बाज़ार के कुछ अलिखित नियम हैं जो इसकी खूबसूरती भी है । यहाँ यदि कोई कपड़ा बेच रहा है तो वह कपड़ा ही बेचेगा सब्जी या कुछ और नहीं बेच सकता । यह कोई लिखित कानून नहीं है पर इस बात का सब लोग ध्यान रखते हैं । इससे कहीं न कहीं समानता का भाव तो बनता है लेकिन मणिपुर में होने वाले आए दिन बंद का असर भी यहाँ सामान बेचने वाली महिलाओं पर बहुत पड़ता है । खासकर उन महिलाओं पर जो पहाड़ी इलाकों से सामान बेचने आती हैं ।

कई महिला आंदोलनों का गवाह रहा यह इमा बाज़ार मणिपुर की आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनैतिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र है । साथ ही अपनी तरह का यह अनूठा बाज़ार मणिपुर की महिलाओं की शक्ति, गौरव, संघर्ष और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है । हम जैसे पुरुषवादी बाज़ार के आदी लोगों के लिए यह एक विचित्र अनुभव था ।

पूर्वोत्तर का यह छोटा सा राज्य अपने भीतर असीम संभावनाएँ समेटे हुए है । ज़रूरत है तो यहाँ के लोगों और  भौगोलिक स्थितियों को समझने की । शेष भारत से कटा यह राज्य अपनी सांस्कृतिक विरासत में श्रेष्ठ है । दुनिया को गोल्फ़ जैसा खेल देने वाला यह राज्य दिल्ली की सत्ता की उदासीनता को वर्षों से सहता आ रहा है । उत्सवधर्मी मणिपुर विभिन्न समुदायों  (मैतेयी, नागा , कुकी ) की साझी विरासत का बेजोड़ नमूना है । जिस मणिपुर को शेष भारत के लोग जानते हैं दरअसल वह टीवी की स्क्रीन और अखबार के पन्नों का मणिपुर है जबकि वास्तविक मणिपुर की तस्वीर उससे भिन्न है ।

पर्यटन के लिहाज से मणिपुर में लोकटक झील का जिक्र बार- बार आता है लेकिन मणिपुर को समझने के लिए यहाँ के हाट, ‘लैकई’(मोहल्ले) और बड़े- बड़े खेल के मैदानों को देखना चाहिए तभी मणिपुर की वास्तविक तस्वीर से रु-ब-रु हुआ जा सकता है । चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा यह राज्य एक आश भरी नज़रों से हर दिल्ली से आने वाले को देखता है और उसका स्वागत करता है …                 

प्रकाश उप्रेती

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