श्रद्धेय गुरुवर..आपके चरित्र में ही भगवान का दर्शन पाया मैंने

श्रद्धेय गुरुवर,
सादर वंदन! चरण-स्पर्श!
गुरुवर मैं आजतक अनभिज्ञ था ज्ञान से, और व्यवहार से भी! आपने ही सिखाया हैं ज्ञान की ज्योत जलाना! आपसे ही सीखा हैं निष्काम कर्म! आपने सिखाई हैं कर्म की पूजा!तकदीर का फ़लसफ़ा कभी न समझा,जब से आपने दिखाया हैं कर्म का मार्ग, तकदीर खुद चली आई!

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मेरे अनभिज्ञ नापाक दिल में पाक कर्म की पृष्ठभूमि आपके पावन हाथों ने रची हैं! आपसे ही सही इबादत का सलीका सीखा है!आपकी सादगी और पाक साफ नियत ने ही मुझे तहजीब से अवगत करवाया है!माया, मोह, ईर्ष्या,द्वेष, क्रोध की आग की लपटों से आपने ही बचाया हैं! प्रेम, दया, परोपकार का पाठ आपने ही पढ़ाया हैं!सत्य की कीमत को भी बस आपने ही समझाया हैं!

हे गुरुवर राह ए मंजिल में आपकी दुआओ का असर पाया हैं!किसी पहाङ से झरते झरने से स्वच्छ आपकी नियत ने हमारे गुनाहों को माफ किया हैं!नजरें थी मेरी फिर भी अंधा था,आपकी नजरों ने मजहब और इंसानियत का रास्ता दिखाया हैं!.
गुरूवर आपके चरणों की मिट्टी को हरदम माथे से लगा रक्खा हैं! आपके चरित्र में ही भगवान का दर्शन पाया हैं मैंने।

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आपके मार्गदर्शन ने ही दुनियादारी के दलदल से बचाया हैं आज तक।शास्त्रों का वंदनीय गुरू आपके व्यक्तित्व में ही पाया! बचपन में बङों से गुरू का महत्व सीखा था लेकिन आपने ही वह महत्व समझाया हमें पाठशाला में जिंदगी की पोथियों का अनुशीलन करवाते करवाते ! आखिरी मंजिल तक आपकी आशीष ही राह दिखाएगी।

हे गुरुश्रेष्ठ! आपने ही अंधेरी गलियों में भटकते इस अबोध मुसाफिर को मंजिल तक पहुंचाया हैं!आपका बारंबार वंदन।

आपका आशीर्वाद बना रहे!
आपका शिष्य
नरपत दान बारहठ

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