ए मेरे अजीज..आपका कल संवारने के लिए मैंने अपना आज खो दिया

प्यारे दोस्त..
मैं पूरी ज़िम्मेदारी से यह ख़त आपके नाम लिख रहा हूं। लिखते हुए मेरे हाथ कांप रहे हैं। रूह थर्रा रही है। लफ्ज़ ख़ून के आंसू रो रहे हैं। मेरे प्यारे दोस्त बात शुरू होती है- आपकी और मेरी दोस्ती की शुरुआत से। यह वह वक्त था जब हम बचपन की दहलीज को अलविदा कह रहे थे और गांव के नज़दीक शहर में मैंने खुद को अकेला समझा लेकिन आपसे मुलाकात ने मेरा अकेलापन दूर कर दिया।

आप जब मुझे मिले तो आपके अंदर दूसरे लोगों के लिए जो इकराम, रहम दिली और इंसानियत थी उसे देखकर मेरे दिल ने आपको अपना दोस्त मान लिया। मैं इस दोस्ती को परवान चढ़ाने निकल पड़ा।

मेरे अजीज़ जब भी आप किसी परेशानी में मुब्तला हुए यकीनन मैंने पूरी शिद्दत और ईमानदारी से आप को उस परेशानी से निजात दिलाने की पूरी कोशिश की।जब आप अस्पताल में थे तो मैं आपके साथ वहां मौजूद था। आप थाने में थे तो मैं मौजूद था।

आप अपनी तिजारत मे जब नाकाम हुए तो हाथ बढ़ाकर वहां से निकालने वाला मैं ही था। जब कभी आप मुझसे कहते कि मेरे इस काम के लिए आप चले जाओ तो मैं निकल पड़ता। जब कभी देर रात वापस लौटने के लिए कोई सवारी मुहय्या नहीं होती तो मैं आधी विरान रात में पैदल ही चल देता था… आपको याद होगा कि आपकी शरीक़-ए-हयात जब हमला हुईं तो आप कितने ख़ुश थे,  आप जल्द ही बाप बनेंगे इस बात से आपको कितनी खुशी महसूस होती थी और 9 महीने बाद वो वक़्त भी आ गया ।

आपकी बीवी को दर्द ए ज़ै आधी रात में शुरू हुआ इत्तेफ़ाक की बात है आप शहर में मौजूद नहीं थे। आपकी वालदा मोहतरमा ने जब मुझे इसकी इत्तेला दी तो मैं आधी रात को ही उनको लेकर अस्पताल पहुंचा।  साथ ही मैंने अपनी बीवी मोहतरमा को भी साथ ले लिया।

आपकी वालदा मोहतरमा को मैंने आने से मना किया मगर वो नहीं मानी और साथ ही चली आयीं। जब अस्पताल में आपकी बीवी को मैंने दाख़िल करा दिया तब मैंने आपकी वालदा जी को ज़्यादा इसरार करके ऑटो कराकर वापिस भेज दिया। वो बेचारी इस उम्र में सारी रात अस्पताल में ठंड से परेशान ही रहती ये मुझसे गवारा ना था।

प्यारे दोस्त जिस वक्त मैं और मेरी अहलिया रात को अस्पताल की गलियारी में अपनी चादर बिछाकर सो रहे थे, शायद उस दौरान आप अपने किसी निजी दौरे के दौरान किसी पांच सितारा होटल के गर्म कमरे मे हीटर चलकर सो रहे होंगे। मेरे अजीज़ ,ज़िन्दगी में जिस पल आपने मुझे याद किया,  मैं आपकी रहनुमाई के लिए हमेशा तैयार था।

मगर हमारी दोस्ती का बुरा दौर जब शुरू हुआ जब आप कहीं किसी भी मुक़ाम पर मेरे लिए नदारद रहे। आपने कभी नहीं जाना कि आपका दोस्त कितनी वीरानियों के दौर से गुज़र रहा है। मेरे ही परिवार के एक सदस्य को एक झूठे आरोप में जब गिरफ्तार किया गया तो मदद मांगने मैं आपके पास आया आपने दिलासा तो पूरा दिया मग़र आप वक़्त पर ना पहुंच सके और मेरा एक अपना जेल की सलाखों के पीछे अपना पूरा महीना काटने पर मजबूर हो गया। आपने कभी पलट कर मुझे इस सब के लिए दिलासा नही दिलाया।

ए मेरे अज़ीज़ दोस्त
आपका कल संवारने के लिए मैंने अपना आज खो दिया है। आज आप क़ामयाबी की उस बुलंदी पर पहुंच गए है जहां से आपको मेरी ग़ुरबत और शिकस्ता हालत नज़र नही आएगी।

आपका और मेरा साथ यहीं तक था। अब फ़ासला बहुत बढ़ गया है। अब और ना चल पाऊंगा। आपके नाम पर कहीं दाग़ ना लग जाये इसलिय आपका नाम नही लिख रहा हूं।
माज़रत के साथ
आपका अदना दोस्त
डॉ उस्मान अहमद


यह खत उस्मान अहमद ने भेजा है। उस्मान पेशे से दंत चिकित्सक हैं।

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