श्रुति से निकलकर स्मृति में आए और फिर पुराण में छा गए, महेश

प्यारे बदले-बदले महेश दा
आशा है, तुम जंगलों में सुस्ता रहे होगे. घुप्प अंधेरी रात में नदी किनारे भूतों का तांडव देखने के ख्याल में घंटों बिता रहे होगे. कानों के नीचे उलझे और ब्रोकली की तरह फैले तुम्हारे गुच्छेदार बालों को चीड़ और देवदार की सरसराती हवा सुकूं दे रही होगी. कहीं किसी विरान जगह पर तुम्हारी धूनी रमी होगी. चूल्हे पर रखे पतीले में राक्षसी भोज तैयार हो रहा होगा. हाला तुम्हारें प्याले में जीवन का गीत गा रही होगी.

क्वांटम फिजिक्स और जे कृप्णमूर्ति के विचार दिमाग में खलबली मचा रहे होंगे. और फिर तुम्हारा अभौतिक मन जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय के लिए अद्वैत की शरण में साष्टांग कर रहा होगा. आखिर में चिर-परिचित हार्मोनियम कोई ऊंचा राग अलाप तुम्हें अर्धरात्रि में भाव मुद्रा में ले जा रहा होगा. और अगली ही सुबह आलू-मटर के साथ किचन में तुम भाभी के लिए बढ़िया-सी सब्जी बना रहे होगे.

महेश दा,
यहां तुम्हारे बारे में तरह-तरह की भ्रांति फैल रही है. शशि दा कहते हैं- ‘महेश को ब्रह्म ज्ञान मिल गया है. एक दिन अचानक उसकी आंखे खुली ही थी कि सामने ब्रह्मकमल लहलहा रहा था, तभी आकाश से जोरों की गर्जना हुई- विज्ञातारमरे केन विज्ञानीयात ( जो सब किसी को जानने वाला है उसे हम किस प्रकार जान सकते हैं.) और उसके कानों के पास से अंदर को घुसती भयानक ध्वनी ने कहा- महेश, ‘आत्मा, ज्ञान और ज्ञाता दोनों है. उसकी सत्ता स्वयं सिद्ध होती है उसे किसी अन्य प्रमाण से सिद्ध करने की कोई जरूरत नहीं है. सत, चित और आनंद ही ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है. यही ब्रह्म मायावच्छिन्न होने पर सगुण ब्रह्म का स्वरूप धारण कर अपर ब्रह्म अथवा ईश्वर कहलाता है. जो जगत की स्थिति, उत्पत्ति और लय का कारण है. और तुम मरघट में जीवन की उत्पत्ति का रहस्य खोज रहे हो. नादान हो तुम.’

शशि दा कहते हैं- पर महेश कहां मानने वाला ठहरा? और उस निर्विकल्प, निरुपाधि और निर्विकार ब्रह्म को चेतावनी दे डाली. बोला- महेश मरघट में जीवन का रहस्य न खोजे तो कहां जाये. लय, प्रलय, काल और कला जब मैं ही हूं तो फिर मेरे लिए कोई कैसे ईश्वर हो सकता है. कहते हैं तभी ब्रह्मकमल अंतरध्यान हो गया और ब्रह्म की जगह महेश श्रुति से निकलकर स्मृति और फिर पुराण में छा गया.

महेश दा क्या यह सच है! सुना है इसके बाद तुमने कठोर तपस्या की और सालों एक पैर पर खड़े होकर शास्त्रों का अध्ययन किया और अब सारे रुद्रप्रयाग में तुम्हारी जय-जयकार होती है. क्या नेता, क्या खनन माफिया और क्या वो बुढ़े संपादक जिन्हें तुम किसी जमाने में लात मारकर गए थे वो आजकल अपनी हाथों की रेखाएं लेकर तुम्हारे आस-पास घूमते हैं. खत का जवाब जरूर देना दा, क्योंकि मुझे शशि दा की बातों पर भरोसा नहीं होता ये फसक भी मारते हैं.

महेश दा,
तुम्हारे कॉमरेड दोस्त तुमसे खासा नाराज़ हैं. वो कहते हैं महेश को तो चप्पल पहनकर, हाथ में ढपली लेकर, यहां हमारे साथ शोषण के विरूद्ध सुनहरी क्रांति के गीत गाने थे. बिगुल फूंककर, हाथों को लहलाहना था. अगर ये सब करने की इच्छा नहीं थी तो दाड़ी और बाल बढ़ाकर, चेहरे पर गंभीरता ओढ़कर फेसबुक  पर ही सिस्टम के विरोध में झंडा गाड़ना था.

अब तारेंद्र दा को ही देख लो तुमसे खासा नाराज हैं. कहते हैं महेश हिंदी भूल गया है. जब देखो संस्कृत में लंबे-लंबे श्लोक लिखा करता है. इन्होंने पूरा जेएनयू छान मार लिया लेकिन इन्हें ऐसी कोई किताब नहीं मिली, न ही ऐसा विद्वान जो तुम्हारी संस्कृत का हिंदी अनुवाद कर दे. सच है क्या दा? कहीं ऐसा तो नहीं तुम्हें ये संस्कृत अपोरुषेय माध्यम से मिली हो! मैंने भी तारेंद्र दा को बोल दिया अगर तुम्हारी संस्कृत का हिंदी अनुवाद नहीं किया तो मैं भी पहाड़ी बामन नहीं! अब मैं तुम्हारे सारे संस्कृत श्लोकों को लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय ले जाने वाला हूं- वहीं पता चलेगा माजरा क्या है……… ये श्लोक तुमने किसी किताब से टीप कर लिखें या फिर तुम व्हॉट्सऐप खोलकर बैठे थे और अपने आप ही श्लोक अंकित होते चले गए….!

अब कल रात ही, महेश दा तुम्हारे अजीज गुरुजी मुझसे कह रहे थे- महेश तो शिक्षा के जरिए बच्चों में लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने के लिए जी जान से जुटा हुआ है. बड़े महेतन से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहा है. अब महेश दा अपने मुंह मिठ्ठू तो बन लिया जाता है लेकिन खुद की बुराई कहां की जाती है? मैं उनसे कैसे कहता- जब से मैंने तुम्हें दगा दी है तुम नाराज रहने लगे हो. तुम्हारी दी सारी एजुकेशन पॉलिसी में चाट गया था पर आखिरी वक्त में एक और ही ललित मेरे सामने आ खड़ा हुआ और बोला- पहले खुद तो शिक्षित हो ले, फिर बच्चों को शिक्षा देने चलना. बस यहां में उससे संवाद में उलझा रहा और वहां मेरे नाम की जो रिजर्व सीट थी वो खाली रह गई…  अब मुझे खुद के लिखे ही वो शब्द बार-बार याद आते हैं ‘स्टूडियो क्लर्की…..’

खैर महेश दा 871 शब्द हो गए हैं औऱ बात है कि खत्म नहीं हो रही. अभी तो प्रवीण का जिक्र रह गया है. वो आजकल खूब बागी जो हो रहा है. पर मैंने भी कसम खा रखी है उसे सारे आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ा कर ही दम लूंगा. ताकि कार्ल मार्क्स खुद ही प्रकट हो जाए शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने…!!!!

खैर महेश दा होली है- तुम खूब रंग खेलो
अगले खत तक इंतजार करना- उसमें तुमसे वसूली करनी है. और इस खत का स्पष्टीकरण भी देना है. वैसे बढ़िया है तुम फेसबुक पर नहीं हो या कम हो. शशि दा के बगल में फेसबुक की बीमारी का इलाज करने वाला एक डॉक्टर आजकल मालामाल हो रहा है….

तुम्हारा भुला जो अब बड़ा हो रहा है
ललित फुलारा

ललित फुलारा के बाकी ख़त नीचे पढ़ें
1- पहला खत- मैं गुनगुनाता हूं, कोई राग थिरकता है मेरे भीतर
2- हम आपकी स्मृतियां हैं; छूटे हुए वो ख्याल हैं-जो SMS और मेसेंजर में सिकुड़ गए हैं
3- प्यारी ईजा-कमरा फिर से सुना हो गया

3 thoughts on “श्रुति से निकलकर स्मृति में आए और फिर पुराण में छा गए, महेश

  1. ललित जी बहुत ही उम्दा लिखते है आप। भविष्य में बहुत ऊपर जाएंगे ,आपका लेखन इसकी पूरी संभावनाएं बता रहा है।

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