उथल-पुथल से भरे मन के आवेग को शिथिल कर अवसाद की काई को हरिता में बदलती किताब


जीवन संवाद
जीवन संवाद किताब

फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद सोशल मीडिया पर अवसाद को लेकर काफी कुछ कहा और लिखा जा रहा है। ऐसे में ‘ख़तोकिताबत’ पाठकों के लिए ‘जीवन के निराश क्षणों को आस में तब्दील करने वाली’ और अपनों के कंधों पर हाथ रखकर ‘आपके होने से फर्क पड़ता है’ कहने वाली किताब ‘जीवन संवाद’ के पन्नों से गुजरने हुए एक पाठक की प्रतिक्रिया एवं अनुभव लाया है। कोरोना के इस त्रासद काल में हमारे कोमल मन के भीतर डर, चिंता, अवसाद एवं असुरक्षा की भावना जिस तरह से प्रबल हो रही है, ऐसे वक्त में यह किताब इसलिए भी जरूरी हो जाती है, क्योंकि यह हमारे मन के भीतर पड़ी गांठ और मानसिक तनाव को दूर करने की सकारात्मक सोच देती है एवं रास्ता दिखाती है; लोगों से संवाद करती है। इस किताब की घटनाएं कोरी/काल्पनिक न होकर हमारे समाज और अपनों के बीच के टूटते रिश्ते, घुटन भरी जिंदगी एवं उलझनों से भरी असल दास्तां हैं, जहां लेखक उनके मन के भीतर की जमती काई को हरिता में बदलने का दरवाजा खोल रहा है। वरिष्ठ पत्रकार एवं मोटिवेशनल वक्ता दयाशंकर मिश्र द्वारा लिखी गई 227 पन्नों की यह किताब आपका वक्त जरूर लेगी, पर खत्म होते ही भीषण गर्मी के बाद किसी पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर बहने वाली सरसराती हवा का स्पर्श देकर तरोताजगी से भर जाएगी। उथल-पुथल से भरे मन के आवेग को शिथिल कर जाएगी। : खतोकिताबत


 ‘डिप्रेशन और आत्महत्या के विरुद्ध- जीवन संवाद’ इस किताब का नाम सुनकर आपके जेहन में भी वो सवाल कौंध सकते हैं, जो किताब पलटते हुए मेरे मन में उठे थे। ऊपर से किताब के कवर पर पीली पट्टी में काले अक्षरों में लिखी एक लाइन- ‘इंटरनेट पर एक करोड़ से अधिक बार पढ़ी गई वेबसीरीज! किताब के तीसरे पन्ने पर लिखा है- ‘जीवन संवाद‘- जिंदगी के प्रति प्रार्थना है!। आत्महत्या और अवसाद के खिलाफ इस किताब में ऐसा क्या है, जो इसे प्रकाशित होने से पहले ही इंटरनेट पर इतना बड़ा पाठक वर्ग पढ़ गया!; यह जानने के लिए मैं अनुक्रम पर ठहरा और दूसरी ही लाइन ने मेरे भीतर एक अजीब-सी सकारात्मकता भर दी और मैं मुस्करा उठा।

यह लाइन ‘आपके होने से फर्क पड़ता है’ थी और इसके बाद के 63 नंबर तक के अनुक्रम को पढ़ते ही मुझे लगा इसमें तो कबीर से लेकर विवेकानंद और बुद्ध से लेकर गांधी सभी समाहित हैं! क्या यह किताब दार्शनिक सार है या फिर दार्शनिकता के साथ काल्पनिकता के मिश्रण वाली कहानियों को समेटे हुए! खैर, उत्सुकता के साथ अब तक मैं आठवें पन्ने ‘लेखक की ओर से’ पर आ गया था और लेखक दयाशंकर मिश्र अपनी इस किताब को लेकर क्या कह रहे हैं; पढ़ रहा था। वो लिखते हैं- ‘मेरे जीवन में यात्रा का विशेष महत्व है। मैंने जीवन में जो भी सीखा, समझा सब इन्हीं यात्राओं के कारण संभव हुआ है। जीवन से संवाद की प्रक्रिया में पहला प्रवेश यहीं से हुआ। अपरिचित पर विश्वास, उसकी परख, समाज के मनोविज्ञान की झलक यहीं से मिलीं। इन कहानियों, यात्राओं से ही मुझे साहस और शक्ति मिली जिससे जिंदगी में कभी कुछ मुश्किल नहीं लगा।’

 

जीवन संवाद किताब के लोकार्पण की तस्वीर
जीवन संवाद किताब के लोकार्पण की तस्वीर

फिर क्या था अगले दो घंटे तक मैं इस किताब में रम गया। यह न तो उपन्यास है और न ही कहानियों की किताब और न ही यात्रा संस्मरण और न ही इस किताब में आंकड़ों वाले लेख समाहित हैं। यह तो आपके आसपास के लोगों की उलझनों, उनके मन के भीतर पड़ी गांठ और मानसिक तनाव को दूर करने वाली सूक्तियां हैं। वो सूक्तियां जिन्हें कभी कोई आपको बताता नहीं। लेखक ने अपने जीवन में आए पात्रों, अपने से मुठभेड़ हुए परेशान लोगों और तनाव की वजह से टूटते रिश्तों को इन सूक्तियों की शक्ति बतलाई और जीवन से संवाद की टूटता डोर को फिर से जोड़ दिया। 227 पेजों की यह किताब आपको आत्महत्या से लेकर अवसाद और जीवन की निराशा के प्रति एक सकारात्मक आशा दे जाएगी। साथ ही यह भी बताएगी कि हम जिस युग में रह रहे हैं, वहां के शहरी जीवन में युवा से लेकर दंपत्ति किस तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उनकी जीवन की वो क्या परेशानियां हैं, जो अवसाद का रूप ले रही हैं और जिनको अपने मन के भीतर ही समेटकर वो आत्महत्या की तरफ बढ़ने वाली सोच से घिर रहे हैं।

आशुतोष पांडे
आशुतोष पांडे

इस किताब को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि हम सभी अपने करीबियों के अवसाद को उनका साथ देकर, उनकी बात सुनकर और उनकी समस्याओं पर ध्यान देकर बेहद आसानी से भगा सकते हैं, बर्शते हमें इसके लिए उनसे जुड़ना होगा और उनसे मिलने होगा। वैश्विक कोरोना महामारी के इस वक्त मैं बस्ती स्थित अपने गांव जगदीशपुर (सेमरहिया) आया हूं, जहां मैंने फिर से एक बार इस किताब के पन्नों को पलटना शुरू किया है। मेरे घर के सामने ही पीपल का पेड़ है, जिसकी छांव में मैं ‘जीवन संवाद’ को इनदिनों फिर पढ़ रहा हूं। वैसे यह सच है कि गांव की दहलीज पर अवसाद जैसी कोई चीज नहीं है, लेकिन मैं शहर में रहकर तिल-तिल घुटते अपने करीबियों और दोस्तों से यह जरूर कहना चाहूंगा कि अगर वक्त हो, तो इस किताब को एक बार पलट कर देखिए, उसके बाद इसके आगे के पन्ने खुद-ब-खुद आपसे जुड़ते जाएंगे।

 

आशुतोष पांडे

 


आशुतोष पांडे
आशुतोष पांडे

 

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