खदान मजदूरी और तीन सौ गायों की रखवाली करने वाला लेखक जिसने कम्युनिस्ट व्यवस्था के माथे पर डाली शिकन

लाज़्लो क्रास्नाहोर्का (फोटा-गूगल)
लाज़्लो क्रास्नाहोर्का (फोटा-गूगल)

1954 को ग्यूला (हंगरी) में जन्मे लाज़्लो क्रास्नाहोर्का ने अपने पहले ही उपन्यास ‘सेंटेटेगो’ से साहित्य के क्षेत्र में एक ख़ास पहचान बनाई। यह पहचान भले किसी स्वप्न-कथा जैसी लगे, लेकिन उसकी नींव में अपने समय की आंख में आंख डाले खड़ा एक ऐसा लेखक है, जो जीवन की कड़वाहट और मधुरता को जिस रूप में ग्रहण करता है और उसी रूप में अभिव्यक्त करने का जोखिम भी लेता है। विशाल भाषाई भण्डार, बौद्ध दर्शन से लेकर यूरोपियन बौद्धिक परंपरा तक विस्तृत वैश्विक ज्ञान, जुनूनी पात्र और बारिश से भीगे दृश्य भले लाज़्लो के लेखन में आधुनिकतावादी-अहं का प्रभाव छोड़ते हों, लेकिन कई स्थानों पर वे किसी पॉइंटलिस्ट की तरह विशुद्ध मजाकिया और सुरुचिपूर्ण लहज़े में व्यंग्योक्तियां करते भी नज़र आते हैं। जो दिलचस्प भी होती हैं और पैनी भी…  लाज़्लो सही मायनों में एक बड़ी शख़्सियत हैं। किसी संत की तरह, वे एक ही समय में पूर्णतः प्रकट भी होते हैं और हज़ारों गोपन रहस्यों से भरे भी। शायद इसीलिए वह अपने अपार्टमेंट में लोगों से मिलना पसंद नहीं करते। लिहाज़ा साक्षात्कारकर्ताओं को अक्सर लाज़्लो से बात करने के लिए क्रेज़बर्ग के आसपास के विभिन्न कैफे और रेस्तरां में लंबे वार्ता-सत्र आयोजित करने पड़ते हैं। आइए पढ़ते हैं कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब में लाज़्लो के विचार।- उपमा ऋचा (कहानीकार और अनुवादक)


सवाल:  शुरू से ही कुछ बताएं… मतलब लेखन की शुरुआत कैसे हुई?
लाज़्लो-  वह शायद साठ के दशक का आख़िरी और सत्तर के दशक का शुरुआती वक़्त रहा होगा। मैं सोचता था कि असल ज़िंदगी, सच्ची ज़िंदगी जैसी शै अगर कोई है, तो वो कहीं और है। फ्रांज काफ्का की कैसल के साथ मैल्कम लोरी की अंडर द वोल्केनो मेरी बाइबल थीं, लेकिन मैं एक पूर्णकालिक लेखक की भूमिका स्वीकार करने के मूड में नहीं था। मैं सिर्फ एक किताब लिखना चाहता था। हां सही सुना आपने, बस एक किताब… और उसके बाद मैं अलग-अलग काम करना चाहता था। ख़ासतौर पर संगीत के साथ कुछ नए प्रयोग! मुझे लगता था कि अभाव की ज़िंदगी ही असल ज़िंदगी है। इसीलिए मैं ग़रीबों के गांवों में डेरा डाला। ख़राब-ख़राब जगह नौकरियां कीं। अनिवार्य सैन्य सेवा से बचने के लिए हर तीन या चार महीने में ठिकाने बदलता रहा।

और फिर जैसे ही मैंने छिटपुट रचनाओं को प्रकाशित करवाना शुरू किया, मेरे पास पुलिस का न्यौता आ गया। दूसरे लोगों के हिसाब से मैं शायद थोड़ा ज़्यादा ही मुंहजोर था, क्योंकि पूछे गए हर सवाल के बाद मैंने उनसे कहा, ‘विश्वास कीजिए, मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।’ ‘लेकिन हमें तुम्हारे बारे में कई बातें पता चली हैं।’ ‘मगर मैं समकालीन राजनीति के बारे में नहीं लिखता।’ ‘हंह… हमें तुम्हारी बातों पर भरोसा नहीं…’ इस बात पर मुझे थोड़ा गुस्सा आ गया और मैंने तल्खी से कहा, ‘क्या सच में आपको लगता है कि मैं आप जैसे लोगों के बारे में कुछ लिखूंगा?’

यक़ीनन इतनी तल्खी उन्हें गुस्सा दिलाने के लिए काफी थी। फौरन एक पुलिस अधिकारी (या हो सकता है कि वो खुफ़िया-पुलिस से हो) ने मेरा पासपोर्ट जब्त करने की कोशिश की। हालांकि, सोवियत काल के कम्युनिस्ट सिस्टम में जारी किए जाने वाले लाल और नीले पासपोर्ट्स (लाल से आप केवल समाजवादी देशों में जा सकते थे, जबकि नीला पासपोर्ट असलियत में स्वतंत्रता देता था।) में से मेरे पास केवल लाल पासपोर्ट था। इसलिए मैंने हैरानी से पूछा भी, ‘क्या सच में आपको मेरा लाल पासपोर्ट चाहिए?’

लेकिन मेरी हैरानगी को सिरे से ख़ारिज करते हुए मेरा पासपोर्ट जब्त कर लिया गया। क्या आप यक़ीन करेंगे कि 1987 तक मेरे पास कोई पासपोर्ट नहीं था। लेकिन ख़ैर… यह थी मेरे लेखन करियर की पहली कहानी, जो आसानी से आख़िरी हो सकती थी। हाल ही में मुझे खुफ़िया पुलिस के दस्तावेजों में कुछ नोट्स मिले जिनमें संभावित सूचनार्थियों और जासूसों के बारे में जानकारी थी। जासूसी और मेरी… हा हा… भले अब यह सब मज़ाक लगता हो, लेकिन उस समय यह मजेदार नहीं था। फिर भी मैंने कभी राजनीतिक प्रदर्शन नहीं किए। बस छोटे गांवों और कस्बों में रहता रहा और अपने उपन्यास पर ध्यान लगाए रहा, जिसे मैं उन दिनों लिख रहा था। मेरा पहला उपन्यास…

लाज़्लो क्रास्नाहोर्का (फोटा-गूगल)
लाज़्लो क्रास्नाहोर्का (फोटा-गूगल)

सवाल: पहली रचना का प्रकाशन एक बड़ा सवाल होता है। आपके उपन्यास का प्रकाशन कैसे हुआ?
लाज़्लो- यह 1985 की बात है। कोई भी (यक़ीनन इसमें मैं भी शामिल था) यह नहीं समझ पा रहा था कि ‘सेंटेटेगो’ का प्रकाशन कैसे संभव होगा। क्योंकि कम्युनिस्ट व्यवस्था के माथे पर शिकन डालने के लिए उपन्यास का कथानक पर्याप्त था। इसी समय खुफ़िया-पुलिस के एक पूर्व अधिकारी समकालीन साहित्य के प्रकाशन से जुड़े प्रकाशन-गृह का निर्देशक बने। हो सकता है वो यह सिद्ध करना चाहते हों कि मुझमें अब भी शक्ति है। और इसी शक्ति या कहूं साहस के प्रदर्शन के लिए उन्होंने उपन्यास प्रकाशित करने का फैसला किया हो। मुझे लगता है कि किताब केवल इसी कारण प्रकाशित हो पाई, वरना…’

सवाल: आपने कहा कि आपको अलग-अलग काम करने की चाहत थी, तो कुछ बताएं कि कौन-कौन से काम किए?
लाज़्लो- कुछ समय तक मैंने खदान मज़दूर के तौर पर काम किया। सच कहूं यह एक मज़ेदार दौर था, जहां असली मज़दूर मुझे घेरे रखते थे। फिर मैं बुडापेस्ट के दूर गांवों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का निर्देशक बन गया। हर गांव में सांस्कृतिक-केंद्र थे, जहां लोग कालजयी रचनाओं को पढ़ते थे। पुस्तकालय उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थे। शुक्रवार और शनिवार को सांस्कृतिक केंद्र के निर्देशक गीत-संगीत के कार्यक्रम का आयोजन करवाते थे। या ऐसा ही कोई और कार्यक्रम, जो नौजवानों के लिए अच्छा हो। मैं आधा दर्जन गांवों के सांस्कृतिक केंद्रों का निर्देशक था। मतलब कि मुझे तमाम वक़्त यहां से वहां चक्कर लगते रहना होता था। लेकिन यह अच्छा काम था। मेरे पूंजीवादी पारिवारिक परिवेश से बहुर दूर मेरा पसंदीदा काम… लेकिन यहीं अंत नहीं।

मैंने कुछ वक़्त तक तक़रीबन तीन सौ गायों की रखवाली भी की। यह काम भी मुझे अच्छा लगता था। इंसानी पहुंच से दूर, घने निर्जन में गोशाला के बीच… मैं शायद कुछ महीने ही ग़रीब रखवाले की भूमिका में रहा। एक जेब में ‘अंडर द वोल्केनो’ और दूसरे में दोस्तोएव्स्की… भटकन के इन्हीं बरसों में मैंने पीना शुरू किया। आप जानते हैं कि हंगरी-साहित्य परंपरा में असल साहित्यकार वही थे, जो नशे में धुत्त रहते थे और मैं तो इसके लिए पागल था। लेकिन एक बार मैं कुछ ऐसे लेखकों के बीच फंस गया, जो एकमत से लेखन के लिए नशे की अनिवार्यता सिद्ध करते हुए कह रहे थे कि हंगरी की कलम अगर नशे के लिए पागल नहीं, तो उसमें वज़न नहीं… मैंने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया और (बारह बोतल शैंपेन की) शर्त लगाई कि मैं शराब छोड़ दूंगा।

सवाल: और आपने छोड़ दी?
लाज़्लो- हां मैं छोड़ दी… लेकिन आज भी मेरे समकालीन लेखकों में कई हैं, जो परंपरा निभा रहे हैं। मसलन पीटर हनोक्ज़ी… वो आदमी मेल्कोम लॉरी की तरह एक जीवित किंवदंती है।

सवाल: लिखना किस तरह होता है? मेरा मतलब कोई ख़ास व्यवस्था बनाई है आपने या…?
लाज़्लो- ख़ास व्यवस्था… हा हा… घुमक्कड़ ज़िंदगी ने कभी मुझे इसकी इजाजत नहीं दी कि मैं कोई व्यवस्था बनाऊँ। मैं हमेशा इस शहर से उस शहर के बीच झूलता रहा। रेलवे स्टेशन पर सुबह, होटल्स में रातें और लोगों को देखते, समझते, बात करते दिन…. ऐसे में आप किसी व्यवस्था की कल्पना कैसे कर सकते हैं। शायद यही वजह है मैं एक जगह बैठकर नहीं लिख सकता। मेरा मतलब डेस्क-राइटिंग से है। आइडिया की तलाश में मुझे घंटों लैपटॉप को घूरना भी पसंद नहीं। मेरे लिए लिखना एक बोध है। एक गंभीर कर्म… इसीलिए मैं एकदम असंगत जगह, एकदम असंगत परिस्थितियों में लिखता हूं। अक्सर लिखने की शुरुआत मन से करता हूं। अगर ठीक लगा, तो विचारों को दुरुस्त कर कागज़ पर उतारने की कवायद करता हूं, वरना दिमाग में ही धुलाई-पूंछाई होती रहती है।

लाज़्लो क्रास्नाहोर्का (फोटा-गूगल)

सवाल: साहित्य में विधागत श्रेष्ठता सिद्ध करने का पुराना चलन है। आपकी नज़र में क्या श्रेष्ठ है- गद्य या पद्य?
लाज़्लो- मैं बहुत गहराई से इस बात को महसूस करता हूं कि साहित्य-सृजन एक आध्यात्मिक कर्म है। हेनोक्ज़ी, जोन्स पिलिंज़्की, सेंडर वेयर्स आदि महान थे, क्योंकि उन्होंने कविताएं लिखीं। गद्य मेरी दृष्टि में कम महत्व रखता है। मुझे लगता है कि हम कविताओं से ज़्यादा प्रेम करते हैं क्योंकि यह गद्य से ज़्यादा दिलचस्प और ज़्यादा गोपन होती है। गद्य यथार्थ के कुछ अधिक ही निकट चला जाता है और इस चक्कर में अपना रस सुखा बैठता है।

गद्य में सिक्का क़ायम करने की वही सोच सकता है, जो ज़िंदगी की सच्चाईयों के निकट हो। इसीलिए पारंपरिक रूप से हंगरी के गद्य लेखक छोटे-छोटे वाक्यों की रचना करना पसंद करते हैं, लेकिन मेरे आपने प्रिय गद्य लेखक ग्यूला क्रूडी इसका अपवाद है। क्योंकि अब्बल तो उनकी भाषा इतनी मोहक है कि आप ख़ुद को विरोध करने के लिए तैयार नहीं कर पाते और दूसरे उन्हें भाषांतरित करना भी कठिन है। सही मायने में एक ठोस व्यक्ति…

सवाल: और उनके वाक्य?
लाज़्लो- उनकी वाक्य रचना दूसरे गद्य लेखकों से अलग थी। वह हमेशा मदहोश इंसान की तरह बात करते थे, जो बहुत अकेला हो। जिसे जीवन के बारे में कोई भ्रम न हो। जिसके पास बहुत ताक़त हो, लेकिन निहायत ही फ़िजूल… देखिए ग्यूला मुझे पसंद थे, मगर मेरे साहित्यिक आदर्श बिल्कुल भी नहीं थे। वह केवल मेरे लिए एक संबल की तरह थे, जिसने मुझे उस वक़्त में हौसला दिया जबकि मैं लिखने का फैसला कर चुका तो पर असमंजस में था। बल्कि अपनी भाषा के कारण जोन्स पिलिंज़्की मेरे लिए कहीं ज़्यादा मायने रखते थे। कई बार मैंने उनकी नक़ल करने की कोशिश भी की।

सवाल: आपने अभी कहा कि ग्यूला को भाषांतरित करना कठिन है। आपकी नज़र में अनुवाद के फ़ायदे-नुकसान और ख़तरे क्या हैं?
लाज़्लो- देखिए मैं फ़ायदे-नुकसान के फेर में नहीं पड़ूँगा। लेकिन ख़तरे के बारे में ज़रूर कहना चाहूंगा कि दरअसल ऐसी कोई बात नहीं है। मेरे हिसाब से अनुवाद मूल कृति का दूसरी भाषा में गढ़ा गया ढांचा है। इस तौर पर अनुवाद अनुवादक की कृति होता है, न कि मूल लेखक की। यह सही है कि मूलतः लेखक ही अपनी कृति को सींचता है, लेकिन अनुवाद की स्थिति में वह एक नई रचना होती है। जिसकी नींव अनुवादक भरता है, एक नई भाषा, एक नए परिवेश के अनुसार… इस बात को यूं भी समझा जा सकता है कि एक परिवार के दो सदस्य अलग-अलग होते हैं, फिर भी एक जैसे होने का आभास देते हैं। लेखक अनुवाद में केवल यह देखता है कि कथावस्तु समान है कि नहीं। कि कथ्य की हत्या तो नहीं हो गई। अगर दोनों (मूल रचना और अनुवाद) में समानता होती है, तो उसे संतोष होता है। अन्यथा की स्थिति में गुस्सा आता है। मुझे केवल एक बार गुस्सा आया था। ‘वार एंड वार’ के जर्मन अनुवाद को देखकर… क्योंकि अनुवाद इतना बेरहमी से हुआ था कि मेरी किताब बहुत बुरी किताब बन गई थी। इतनी बुरी कि उसे सुधार पाना भी असंभव था। लेकिन इसके अलावा मेरी हर किताब के अनुवाद ने मुझे आश्चर्य से भर दिया। वाक़ई मुझे बहुत बेहतरीन अनुवादक मिले।

सवाल: आपने बर्लिन में रहना क्यों चुना? कोई ख़ास वजह?
लाज़्लो- 1987 के बाद मैं एक लंबा वक़्त इस शहर में बिताया। इसीलिए इस जगह से एक जुड़ाव सा हो गया है। एक गहरा जुड़ाव… मुझे याद है पूर्वी बर्लिन घायल आत्माओं के लिए एक अस्पताल जैसा हुआ करता था। हर तरह के रचनाकार और वो भी जो रचनाकार होना चाहते थे, अपनी साधना के लिए यहां खिंचे चले आते थे। कितनी अच्छी बात थी न! उसी बार में बैठना, जहां तुमसे पहले कई बड़ी हस्तियां बैठी हों। उसी हवा को सांसों में भरना, जिसमें सृजन की ललक हो… इसीलिए आज मेरा वक़्त शहर में घूमते-टहलते बीतता है। हालांकि तब से अब में बहुत फ़र्क है। अब लोग यहां रचनाओं से ज़्यादा उन्हें बेचने के लोभ में यहां आते हैं। फिर भी यह शहर कलाकारों का गढ़ है।

सवाल: काफ्का के इतर और क्या पढ़ना पसंद करते है?
लाज़्लो- मुझे लगता है कि जब मैं काफ्का को पढ़ नहीं रहा होता हूं, तब मैं उनके बारे में सोच रहा होता हूं। जब मैं उनके बारे में सोच नहीं रहा होता हूं, तो अपनी पुरानी सोच को दोहराने, याद करने की कोशिश कर रहा होता हूं। और जब मैं उन्हें सोचते, दोहराते, याद करते हुए थक जाता हूं, तो फिर से पढ़ने लगता हूं। दांते, दोस्तोएव्स्की, प्रूस्ट, एज़रा पाउंड, बकेट, थॉमस बेनेहार्ड, अतीला जोजेफ़, सेंडर वेयर्स और पिलिंस्ज़की के साथ भी यही करता हूं।

वर्तमान में ‘सेंटेटेगो’ को आप किस तरह देखते हैं? क्या आपको लगता है कि दुनिया में या साहित्य में कोई ऐसा

लाज़्लो क्रास्नाहोर्का (फोटा-गूगल)

सवाल: परिवर्तन हुआ है, जिसने इस कृति के लिए दरवाज़े खोले हों?
लाज़्लो- मेरे ख्याल से जिन्होंने ‘सेंटेटेगो’ को पढ़ा है या इस पर बनी फिल्म देखी है, वे सवाल का जवाब बेहतर जानते हैं। जहां तक बात मेरी है, तो सेंटेटेगो’ के प्रकाशन के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ मुझे मिलीं, उनसे लगा कि पाठकों को ऐसी ही किताब चाहिए थी। यहां पाठकों से मेरा मतलब उन लोगों से है, जो किसी ऐसी किताब का इंतज़ार कर रहे थे जिसमें दुनिया के बारे में कहा गया हो। उन लोगों से, जो मनोरंजन के इतर बात करने वाली किताब चाहते थे। उन लोगों से, जो जीवन से भागना नहीं चाहते थे।

बल्कि बार-बार जीना चाहते थे। महसूस करना चाहते थे कि उनके पास भी सांसे हैं। जीवन है। अवसर है। समय के द्वारा लिखी जा रही लंबी पटकथा में उनका भी हिस्सा है। और इनके साथ उन लोगों से भी, जिनकी प्राथमिकताएं दयनीय मगर सुंदर थीं। मुझे हमेशा लगता है कि हमारे पास महान साहित्य की कमी है, जबकि हमारे पाठकों की इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। किसी दवा के तौर पर नहीं और न ही किसी भ्रम के तौर पर, बल्कि एक ऐसे बोध के तौर पर, जो उन्हें बताए कि दरअसल कोई दवा है ही नहीं।

सवाल: अपनी रचनाओं में आप अक्सर चीजों को बड़ी स्पष्टता से मापते या फिर लोकेशन्स को ख़ासतौर पर रेखांकित करते नज़र आते हैं… यह सब आपके लिए इतना ज़रूरी क्यों है?
लाज़्लो- क्योंकि मुझे लगता है कि कोई घटना कहां घटित हो रही है, यह जानना पाठकों के लिए ज़रूरी है। कथ्य को समझने के लिहाज़ से भी और उससे जुड़ने के लिहाज़ से भी…

सवाल: वह दुनिया जिसमें आपने बतौर लेखक शुरुआत की, क्या इस समय भी आपको दिखाई देती है?
लाज़्लो- यह बात चौंकाने वाली है कि हर चीज़ बदल चुकी है, पर फिर भी वैसी ही है। तेज़ कोलाहल करके बहती हुई किसी धारा की कल्पना कीजिए, जैसे ही वह मुड़ती है, कोई एक बूंद बुलबुले की तरह टूट जाती है। बुलबुला छोटी-छोटी बूंदों में तब्दील हो जाता है और बूंदें एक छोटी सी लहर बनकर धारा में समा जाती हैं। दृष्टि बूंदों पर ध्यान लगाने की कोशिश करती है, पर व्यर्थ… संभव ही नहीं यह, क्योंकि बूंदें तो हैं ही नहीं। वहां तो धारा है, जो पल-पल अलग होकर भी अंतत: एक है। वहां न पूर्णता है, न अपूर्णता। न ऐक्य है, न द्वैत… फिर क्य है वहां? एक सातत्य, जो पल-पल बदल रहा है। हम उसे देख सकते हैं। उसके साक्षी बन सकते हैं, मगर पकड़ नहीं सकते…

चुनिंदा साक्षात्कारों के अंश/ अनुवाद- उपमा ऋचा


 

उपमा ‘ऋचा’ कहानीकार और अनुवादक हैं। दर्जन भर से ज्यादा किताबों का अऩुवाद कर चुकी हैं। इनमें अन्ना बर्न्स का 2018 मैन बुकरप्राइज प्राप्त उपन्यास ‘मिल्कमैन’ भी शामिल है।


 

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