आपदा में अवसर खोज लेते ‘गुरु’ लेखक और हुजूरी करते चेले

प्रकाश उप्रेती

हिंदी में अभिनंदन काल पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है. हर लाइक एवं कमेंट के साथ एक विशेषण और एक लेखक पैदा हो रहा है. पिछली सदी में पैदा हो चुके लेखकों के लिए यह चरम सुख का दौर है. उनको हर रोज नए- नए उपमान मिले रहे हैं. सोशल मीडिया पर लिखी उनकी हर एक बात पर-अद्भुत, अलौकिक, न भूतो न भविष्यति, दार्शनिकता, मार्मिकता, चिंतनीय आदि सब कुछ एक साथ खोज लिया जा रहा है. लेखक इसी में आत्ममुग्ध होते हुए अगले दिन लाइव आने की घोषणा भी वहीं कर देता है. उसकी घोषणा के बाद तो जलजला आ जाता है. लेखक गलती से अगर किसी विश्वविद्यालय का शिक्षक है तो चेले ‘आपदा में भी अवसर’ तलाश लेते हैं.

इसके बाद तो लेखक उर्फ़ गुरु जी नए-नए विशेषणों के साथ सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं. हर चेला अपनी तई, एकदम नया और टटका विशेषण खोज कर लाता है. जबकि वह सिर्फ उसकी नजर में ही नया होता है. इनमें से कुछ-साहित्य मनीषी, साहित्य मर्मज्ञ, साहित्यवेत्ता, मूर्धन्य लेखक, ज्ञान शिल्पी और अलाने-फलाने के जानकार हैं. इस तरह के अभिनंदन परक विशेषणों के बाद लेखक के लाइव होने का लिखत घोष ऐसा होता है मानो नगर में राजा के आने का उद्घोष हो रहा हो. गुरु लेखक को इसी से सच्चे, समर्पित और शोधार्थी चेले की पहचान होती है.

इसलिए कोई पीछे नहीं रहना चाहता है. हर कोई उधार के शब्दों और उर्दू कवियों के शेरों से गुरु लेखक को अलंकृत करने में ‘जी’ भी और जान भी लगा देते हैं. अब जो होगा वही तो खर्च करेंगे. दौड़ भी जब अपनों से लगानी हो तो ‘जी’ के साथ ‘जान’ ही काम आती है . ‘हुजूरी’ तो प्रत्यक्ष दर्शन का विषय है जो इस कोविड-19 की घेराबंदी में संभव नहीं है. ऐसा मैं, सोचता हूँ बाकि चेले तो कुछ भी कर गुजर सकते हैं. इस कोविड- 19 के दौर में गुरु लेखक और चेले दोनों बैकुंठ पा गए हैं. गुरु लेखक जैसे ही लेपटॉप की खिड़की से लाइव होता है तभी 10-12 चेले एक साथ कमेंट बॉक्स में प्रकट हो जाते हैं और पहले मेरा, नहीं… नहीं… पहले मेरा कमेंट की होड़ लग जाती है.

तेरा ध्यान किधर है
तेरा ध्यान किधर है

कई तो सीधे लेपटॉप की स्क्रीन के अंदर हाथ डालकर गुरु लेखक के चरण पकड लेते हैं जो इससे वंचित रह जाते हैं वो तुरंत कमेंट की तरफ रुख़ करते हैं ताकि कोई और चेला इस अवसर को भी न छीन ले. वह फटाफट कमेंट में 11 से 51 बार तक ‘गुरु जी प्रणाम… प्रणाम’ ही लिखते रहते हैं. गुरु लेखक घुटने से नीचे तक का कुर्ता, चेहरे पर हल्की दाढ़ी, कोविड-19 की वैक्सीन न खोज पाने की हताशा से भरे भाव वाले चेहरे के साथ लेपटॉप की स्क्रीन पर दिखाई देने वाले कमेंट पर नजर गडाए रखते हैं. गुरु लेखक की इस मुद्रा को देखकर जो चेले पहले के दोनों प्रयासों में असफल होते हैं वो झट से अद्भुत, अकल्पनीय, बेजोड़, सुगठित, ज्ञानवर्धक, नमामि गंगे, अविस्मरणीय, जैसे कमेंट की झड़ी लगा देते हैं. गुरु लेखक ने अभी सिर्फ इतना ही बोला है कि ‘मेरी आवाज सुनाई दे रही है’ ?

इस प्रश्नवाचक वाक्य से ही चेले गुरु के भाषण का रहस्यात्मक तत्वज्ञान जान लेते हैं. यही तो गुरु लेखक और चेले का संबंध है. गुरु लेखक गुड खाए और चेले तुरंत उसके स्वाद का खट्टापन बता दे. इसे ही तो वर्चुअल दौर के प्रगाढ़ संबंध कहते हैं. ख़ैर, गुरु लेखक बोलने से पहले वाचिक परम्परा में 10 लोगों का औपचारिक और 20 का अनौपचारिक अभिवादन करता है. गुरु लेखक जिन-जिन का अभिवादन करता है चेले भी ‘थम रिएक्शन’ से उनको अपनी सलामी पेश करते हैं. इस पूरे विधि-विधान के साथ गुरु लेखक का वो भाषण शुरू होता है जो इससे पहले वह 7 जगह दे चुका होता है. बस हर भाषण के ढाई आखर बदले होते हैं. बाकि सब वही होता है लेकिन नवीनता चेलों में बराबर बनी रहती है.

अगर गुरु लेखक ने ‘कामायनी को प्रसाद की उत्कृष्ट रचना’ कह दिया तो समझो यह इस सदी की सबसे मौलिक स्थापना है. इसके बाद तो चेले सदी की सबसे मौलिक स्थापना को ऐसे प्रचारित करते हैं कि ‘युवा नोवा हरारी’ भी अपने लिखे पर संदेह करने लगे. फिर नए-नए अभिनंदन परक विशेषण जन्म लेते हैं और पूरे सोशल मीडिया के आकाश में फ़ैल जाते हैं. चेलों की रेस में गुरु लेखक रातों रात चिंतक, समाजविज्ञानी, आलोचक बन जाता है .इसी रास्ते पर चलते हुए फेसबुक टिप्पणी के बल पर चेले युवा आलोचक हो जाते हैं.

अगर किसी विश्वविद्यालय का शिक्षक है तो चेले ‘आपदा में भी अवसर’ तलाश लेते हैं.
(अगर किसी विश्वविद्यालय का शिक्षक है तो चेले ‘आपदा में भी अवसर’ तलाश लेते हैं)

गुरु लेखक फिर किसी नए वेबिनार या वेबगोष्ठी की जुगत में लग जाता है. चेले लगातार गुरु लेखक को उनके बोले पर आने वाले कमेंट की अपडेट देते रहते हैं. लाइक, कमेंट और व्यू की हर घंटे की रिपोर्ट उन तक पहुँचती है. कमेंट से दोस्त, दुश्मन और सच्चा-पक्का चेला तय होता है. अगर किसी ने सदी की महान स्थापना पर प्रश्न कर दिया तो समझो वह चेलों और गुरु लेखक दोनों का जानी दुश्मन हो गया. कोविड-19 के दौर में साहित्य में कई मौलिक स्थापनाएं ठेली जा चुकी हैं. गुरु लेखक को हर रोज नए-नए अभिनंदन परक विशेषण मिल रहे हैं.

चेलों की निष्ठा का यह कठिन दौर है. उनको गुरु लेखक के हर स्टेटस, पोस्ट, लाइव, फोटो, 10 साल पहले छपे लेख की तस्वीर, बच्चों के बर्थडे पार्टी की मेमोरी, घटिया से घटिया लेख, भाषण और ट्विटर के लिंक आदि पर कमेंट करना है. कमेंट के साथ शेयर भी करना है. कमेंट भी ऐसा करना है जो दूसरे, तीसरे और चौथे चेले से ज्यादा लमालेट वाला हो. गुरु लेखक की नज़र में हमेशा ‘नंबर वन’ बने रहने का तनाव उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई देता है. वर्चुअल माध्यम की दूरी ने उनके तनाव को और बड़ा दिया है. अब उनको हर कमेंट के साथ अपनी मौजूदगी, निकटता और ‘मैं ही हूँ’ को बनाए-बचाए रखना है.

इस तरह कोरोना काल में साहित्य रात चौगुना बढ़ रहा है. युवा आलोचकों की बाढ़ आ गई है. कोविड की फैलने की रफ़्तार से ज्यादा तेज साहित्य में युवा आलोचक और कवि फ़ैल चुके हैं. साहित्य संक्रमण के दौर में हमेशा रहा लेकिन वर्चुअल कम्युनिटी संक्रमण के दौर से पहली बार गुजर रहा है. साहित्य के गुरु लेखक और चेलों ने आपदा में भी अवसर तलाश लिया है. यह साहित्य के इतिहास का नया युग है. भविष्य में जब भी हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा जाएगा तो इस काल के कवि, युवा आलोचक, गुरु लेखक ‘फुटकल’ नहीं फेसबुक खाते में जाएँगे.


डॉक्टर प्रकाश उप्रेती दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

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