हिंदी दिवस विशेष: अपने ही देश में हिंदी की स्थिति को देखकर दुख होता है

भावना मासीवाल जेंडर और स्त्री मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइट्स के लिए लगातार लिखती हैं। हिंदी साहित्य में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से पीएचडी हैं। हिंदी दिवस पर उनका यह लेख पढ़ें जिसमें उन्होंने हिंदी को लेकर अलग तरह की चिंता व्यक्त की है।


भावना मासीवाल

भाषा और हिंदी का सवाल आज का नहीं है। आज़ादी से पूर्व ब्रिटिश राजसत्ता के दौरान भी यह प्रश्न मौजूद था । उस समय देश के उत्थान व अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए खड़ी बोली हिंदी को केंद्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया । भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा भी है-

“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सुल”

सबको साथ लेकर समन्वय करती आगे बढ़ती है हिंदी
भारत एक बहुभाषी देश है । इस कारण एक ऐसी भाषा की मांग बढ़ी जिसके माध्यम से आमजन के मध्य सम्पर्क साधा जा सके। यह काम हिंदी ने किया। हिंदी, उर्दू और संस्कृत की करीबी है। इसके साथ ही यह दक्षिण भारत की क्षेत्रीय बोलियों व उनके शब्द भण्डार को भी अपने शब्दकोष में शामिल करती है।

हिंदी में बहिष्कार का भाव नहीं है बल्कि वह तो सब को साथ लेकर समन्वय करती हुई आगे बढ़ती है।

इतना ही नहीं वह फ़ारसी, तुर्की, अंग्रेजी, पुर्तगाली और अन्य भाषाओं के शब्दों को भी खुद में समाहित करती आगे बढ़ती है । इसी कारण हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में स्थान तो पाती है, लेकिन आधिकारिक तौर पर अभी तक हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया। दरअसल, हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का जो संघर्ष आजादी के पूर्व किया गया। वह संघर्ष अब समाप्त हो गया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी 1918 में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए कहा था। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के समर्थन में थे। लेकिन लंबे विचार-विमर्श के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राज भाषा बनाने का फैसला लिया गया।

आम नागरिक भविष्य की सभी संभावना अंग्रेजी में देखता है
लेकिन सवाल यह है कि भले ही हिंदी संपर्क भाषा हो लेकिन क्या यह सही मायने में राजभाषा के रूप में भी स्थान बना पाई है? नहीं, बल्कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अंग्रेजी ही हमारी राजभाषा है। हिंदी को राजकाज की भाषा के रूप में बचाए रखने के लिए हमने अंग्रेजी से हिंदी अनुवादकों की नियुक्ति कर दी। ताकि हिंदी भाषा का महत्व बचा रहे।

क्या हिंदी का संघर्ष उसका अनुवाद किया जाना व उस अनुवाद के माध्यम से उसके अस्तित्व को बचाना है? क्या राजभाषा के रूप में हिंदी का अपना अस्तित्व नहीं है? क्यों आज भी अपने ही देश में प्रथम भाषा के रूप में अंग्रेजी और द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार्यता है। वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता हिंदी पर गर्व तो कराती है लेकिन अपने ही देश में हिंदी की जो स्थिति है, उसे देखकर दुख भी होता है। दरअसल, भविष्य की सभी संभावनाओं का रास्ता एक आम नागरिक अंग्रेजी में देखता है। क्योंकि बचपन से अंग्रेजी का दबाव उसकी सफल व्यक्ति की गणना का मानक है।

युवा हिंदी से अधिक अंग्रेजी को से प्रेम करता है
वह इसे कहीं बाहर से नहीं बल्कि अपने ही परिवेश से सीख रहा है। उसका सामाजिक परिवेश उसे परीक्षाओं से लेकर बड़े पद तक पहुंचने में अंग्रेजी की उपयोगिता का अहसास करा देता है। वैश्विक मंचों पर आयोजित पहचान की भाषा भी अंग्रेजी ही बनकर उभरती है। हिंदी आज भी द्वितीय भाषा ही है। युवा हिंदी से अधिक अंग्रेजी से प्रेम करता है क्योंकि भविष्य की भाषा अंग्रेजी है। रोजगार, सूचनाओं में हिंदी से अधिक अंग्रेजी का दबदबा है।

आज हिंदी बेशक विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है परंतु अपने ही देश में हिंदी उपेक्षित होती है। हिंदी का एक क्षेत्र खुद को हिंदी भाषी कहकर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग करता है तो दूसरा क्षेत्र खुद को गैर हिंदी से अधिक अंग्रेजी का मानता है। हिंदी और अंग्रेजी का झगड़ा अपने ही घर में आज भी चल रहा है और अंग्रेजी आज भी राजभाषा के रूप में वर्चस्व बनाए हुए है।

 

हिंदी जब अपने घर में उपेक्षित होती है तो घर से बाहर भी उसका सम्मान नहीं होता है। वैश्विक परिदृश में हिंदी का बढ़ता हुआ स्वरूप दरसल बाजार का प्रभाव है। विकसित देशों के लिए हमारा देश आज सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है और उसमें निवेश करना फायदे का सौदा। यही कारण है कि पूंजी और बाजार ने हिंदी को विश्व मंच दिया है। यह तो हुई घर से बाहर अर्थात वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की बात। हमारे अपने घर में हिंदी की क्या स्थिति है एक नजर इस पर डालना अनिवार्य है। सुधार की पहली प्रक्रिया घर से आरंभ होती है परंतु घर के भीतर तो हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी का वर्चस्व है। केवल सहित्यिक गोष्ठियों में ही हिंदी भाषी होने का अहसास होता है अन्यथा तो अंग्रेजी ने ही अपना दबदबा बरकरार रखा है।

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