हरिवंश राय बच्चन की 112वीं जयंती, उनकी वो कविता जिसके लिए मिला था साहित्य अकादमी

हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और कवि हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) की आज 112वीं जयंती है। उनका जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के बाबूपट्टी गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें बच्चन कहा जाने लगा था जो कि आगे चलकर उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ लिया। उनका जन्म कायस्थ परिवार में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए. किया और कई सालों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में पढ़ाया भी।

हरिवंश राय बच्चन ने आकाशवाणी में भी काम किया। वो हिंदी विशेषज्ञ के तौर पर विदेश मंत्रालय से भी जुड़े रहे। 1935 में छपी उनकी कृति ‘मधुशाला’ बेहद लोकप्रिय हुई। इस रचना से उन्हें साहित्य जगत में नई पहचान मिली। उन्होंने अपनी चार आत्मकथा लिखीं थी। ये ‘क्या भूलूँ , कया याद करूं’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’ और ‘दशद्वार से सोपान’ है। ‘दो चट्टानें’ कविता संग्रह के लिए उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 1976 में उन्हें भारत सरकार ने साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया। 18 जनवरी 2003 में मुंबई में उनका निधन हुआ।

ड्राइंग रूम में मरता हुआ गुलाब
गुलाब
तू बदरंग हो गया है
बदरूप हो गया है
झुक गया है
तेरा मुंह चुचुक गया है
तू चुक गया है ।

ऐसा तुझे देख कर
मेरा मन डरता है
फूल इतना डरावाना हो कर मरता है!

खुशनुमा गुलदस्ते में
सजे हुए कमरे में
तू जब

ऋतु-राज राजदूत बन आया था
कितना मन भाया था-
रंग-रूप, रस-गंध टटका
क्षण भर को
पंखुरी की परतो में
जैसे हो अमरत्व अटका!
कृत्रिमता देती है कितना बडा झटका!

तू आसमान के नीचे सोता
तो ओस से मुंह धोता
हवा के झोंके से झरता
पंखुरी पंखुरी बिखरता
धरती पर संवरता
प्रकृति में भी है सुंदरता

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