कहानी सानधुरा की जहां पीताम्बर दत्त कन्वर्ट होकर पीटर दत्ता और जगन्नाथ तिवारी जे. तेवार्सन हो गये

(ज्ञान पंत)

चाचा को जाना तो बेरीनाग था लेकिन पता नहीं क्या सूझा कि किड़ू ‘दा को साथ लेकर सानधुरा की तरफ निकल गए हैं। गाँव की दुम पर कुछ बेहद कमजोर मकान व घास – फूस की दिन काटने लायक लायक झोपड़ियाँ हैं, जिसे स्थानीय लोग डिमौड़ि कहते हैं .. यहीं किड़ू ‘दा का घर है।

घूमने – फिरने के शौकीन हैं, तो जथकै मन आया ,  उथकै चल देते हैं।
करना भी क्या है, दो रोटी पेटपाल हैं, तो दिन कठिन दिन भी सहज ही निकलते जा रहे हैं। उन्हें पता है कि जग्गू पणज्यू के साथ जाने में खाने – पीने की कोई कमी नहीं होती है और बिड़ि – माचिस तो पहले ही जेब में ठुसा देने वाले हुए .. तो किड़ू ‘दा ,  खुश हैं बहुत खुश हैं, इसलिए भी कि वर्षो बाद आज सानधुरा जाने को मिलेगा। ऐसा भी नहीं कि वहाँ जाने की मनाही है या जाने पर कोई भगा देगा लेकिन अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती है उसकी ।

ये सब पढ़े – लिखे , स्मार्ट, अंग्रेजी बोलने – समझने वाले और कहाँ अँगूठा छाप सुर्ती फटकाने वाले किड़ू ‘दा..
आज भी सर्दी जुखाम हो गया तो स्वांक्कि – स्वांक्कि करके सिंङांणा बरमान में घुसा देता है .. । सानधुरा की एक अलग ही कहानी है। श्रुति परम्परा के अन्तर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी यह फसक यहाँ तक पहुँच गई है और आगे कहाँ तक जाएगी .. कुछ नहीं कहा जा सकता। उनका कहना है कि मिशनरी के प्रभाव में आकर आसपास गाँवों के कुछ लोगों द्वारा इसाई धर्म अपनाया तो उन्हें बिरादरी से निकाल दिया गया था ।

उनकी समुचित व्यवस्था हेतु गाँव से अलग एक रमणीक स्थल फर अंग्रेजों द्वारा बसाया गया जहाँ छोटे – छोटे सुख सुविधा सम्पन्न काटेजनुमा आवास दिए गए । पानी की समुचित व्यवस्था थी तो थोड़े परिश्रम से ही सानधुरा जगमग हो गया । शुरुआत में उधर जाने की सख्त मनाही थी .. खबरदार जो उथकै जाला त देखि रौला। छि: का्स लुकुड़ पैर राखनी .. घुनन है तलि और कमर है मलिकै नङांणै रुँनीं , रान्नी ! आमा बताती है कि वे लोग कुछ जादू जैसा करते हैं कि आदमी धरम भ्रष्ट हो जाता है .. और कयीं चेल्ली जै उना्र हा्थ पड़ा त पत्त नै क्याप तिक्खू जस ( क्रास) गाउन हालि दिनीं , जै बाद उँ आपणैं इज – बाबुन नि पच्छयाणन .. रनकार् ,अणहोत्ती करि दिनीं हो ! .. यह सब पुरानी बातें हैं जो समय के साथ काल के गर्त में समा गयीं । सानधुरा में अभी भी गिने चुने परिवार बचे हैं जो पहाड़ी संस्कृति में पूरी तौर पर रच बस गए हैं । पीढ़ियाँ गुजर गयीं लेकिन लोग कहाँ मानते हैं।

किस्से दर किस्से चले आ रहे हैं मूंख से मूंख तक । ऐसे ही कोई बता रहा था कि पीताम्बर दत्त पंजी जब कन्वर्ट हुए तो उनके दरवाजे पीटर दत्ता की तख्ती लगने वाली हुई । जगन्नाथ तिवाड़ी कहीं से सानधुरा लाए गए तो जे० तेवार्सन हो गए जो कहीं बाद में मिशन स्कूल के वाईस प्रिंसिपल भी बने । किड़ू ‘दा के बुड़बाज्यू अनराम के बारे में है कि वे एन० रामजे हो गए .. ऐसे अनेक किस्से आज भी सुनने में आते हैं । प्रगति की बात करें तो उन्हें खूब अवसर मिले । इंग्लैंड तक उनकी रिस्तेदारी हुई । वहाँ से गिफ्ट सानधुरा आते तो बदले में ये लोग बेरीनाग की स्पेशल चाय भेजते । ऐसी ही कोई हंसा पाण्डे .. हंसी एडवर्ड बनी बल । पढ़ी लिखी युवती थीं तो बाद में एक प्रतिष्ठित गर्ल्स कालेज की लखनऊ में प्रिंसिपल बनीं । रिटायरमेंट बाद यूके निवासी पति को भी साथ “यूके” ले गयी । उनके शुरुआती जीवन के किस्से लोग खूब चटखारे लेकर सुनाते हैं कि रातभर सानधुरा से नाँच – गाने की आवाज आती और डाड़ मारने जैसा वायलिन बजता .. टूऊँऊँऊँ .. ट्याँआँआँआँ ..

तो लोग कहते पित्तु मतलब पीताम्बर भुती रौ ! भल भौ , कैलि कौछी कि डबलनां लालच में इसाइ बंण कै .. एक मैडम कीलर थीं । कहीं के कांडपाल सानधुरा बसाए गए । पढ़ाई में अलमोड़ा टापर रहीं । वे भी कहीं कालेज में डाइरेक्टर रहीं पर ब्या नि करि वीलि .. देखींण चाणें गजब मरी भै । मंगलसूत्र जस किरास गाऊन लटकै बरि तलि जांणें लंब स्यात् झगुल जस जि पैरछी .. मरण बखत ययीं ऐ । वी कबर ले बणीं .. सानधुरा में दो तीन ही बची हैं । थीं तो काफी लेकिन सात वर्ष पहले भयंकर पैर पड़ा तो सब बगा ले गया .. इन सबके बावजूद मिठास अब भी बची है । पहले वाली कड़वाहट कबकी जा चुकी । खुशी है कि ये लोग आज भी जड़ों को नहीं भूले हैं ।

 

घर के परिवार ट्री की शुरुआत ही पंत , पाण्डे , जोशी से पीटर , सीटर , रामजे तक चली आती है .. जमीन में भला जड़ें कहाँ सूखतीं हैं ? ऐसा ही होता तो लोग जागर लगाने इंग्लैंड, अमेरिका से क्यों आते .. !  क्या पता चाचा के दिमाग में भी ऐसा ही कुछ चल रहा हो जो सानधुरा होते हुए बेरीनाग जा रहे हैं । लखनऊ रहे ,पढ़े हैं तो हो सकता है कि किसी मैडम या सिस्टर का रिफरेंस लाए हों .. लफडंर तो एक नम्बर हुए । संडे – संडे और बड़ा दिन मनाने में लालबाग चर्च के भी खूब चक्कर लगाए हैं .. । किड़ू ‘दा के बुड़बाज्यू की पीढ़ी के कुछ लोग इंग्लैंड बस गए हैं तो दो एक यहाँ भी हैं । इनकी फेमिली ट्री में उनका भी नाम है ।

यह बात सभापति ने चुनाव के समय किड़ु ‘दा को बताई थी कि उनकी किताब में अन ‘ दा की फोटुक है ….. यह सच है या झूठ , लेखक भी नहीं जानता क्योंकि काल्पनिक कथा में क्या सच क्या झूठ ! बस , पानी की तरह कथा चलती रहनी चाहिए ….. कहीं ताल बन जाए तो वो बात अलग है ! सानधुरा में भी पहले जैसी चहल पहल नहीं रही । जो पढ़ – लिख गए , वे निकल गए है । कुछ मर – खप गए और कुछ समय की दौड़ पीछे रह गए …. तो यहीं दिन काट रहे हैं । खेती – बाड़ी , काम धंधा कुछ है नहीं लेकिन रहते अंग्रेजी ठाठ से ही हैं । जानकार बताते हैं कि मिशनरी वाले उनका पूरा ध्यान रखते हैं …… ठीक ही हुआ फिर ।

सानधुरा से कनाव – कनावै ( पहाड़ से सटे ) एक रास्ता बेरीनाग जाता है । थोड़ा पथरीला जरुर है लेकिन घुमावदार रास्ते की अपेक्षा दूरी काफी कम हो जाती है …… तो उसी रास्ते पर चलते चले जा रहे हैं । अधिकांश घरों में ताले लटके हैं और जहाँ किड़ू ‘दा के बुड़बाज्यू की फोटो होने का अनुमान था …… वहाँ एक बुड़ि अदमरी मैडम को देखते ही छोटे जालीदार गेट से चाचा ने गुडाफ्टरनून कहा तो उसने हाथ हिलाया और दरी में लुढ़क गयी ….. इसलिए वे भीतर नहीं गए । वैसे भी दोपहर का यह समय दाल – भात खाकर लमलेट लगाने का है । गाँव के बच्चे दिन में जब गाय , बैल चराने इधर आते हैं तो शरारतन इन गोरे घरों में गुडमार्निंग , गुडनून चिल्लाकर भाग जाते हैं …… इसलिए भी मैडम लोग ध्यान नहीं देतीं । एक दो हैं जो बच्चों को देखते ही बिलायती टाफी , बिस्किट्स देती रहतीं हैं ।

किड़ू दा को इन सबसे ज्यादा मतलब नहीं है । उसे तो चाचा का साथ मिला और कहीं गोरी मैडम बैठो कहती तो एलबम देख लेता ….. वो क्या देखता , चाचा ही बताते कि यो अन ‘दा छन ! त्यार बुड़बाज्यू , चा धैं का्स छाजि रयीं ….. इतना ही बहुत था उसकी इनर्जी के लिए लेकिन संयोग नहीं बना ….. चिंता न कर , कदिनै फिर आई जा्ल रत्तै टैम में ….. इतने में ही किड़ू ‘दा खुश है गए हैं । ऐसी ही तमाम बातों के बीच बेरीनाग पहुँच गए हैं । रास्ते में किड़ू बता रहा था कि भली घरवाई छी मेरि ले ! पत्त नै कै झांटै नजर लागी या कै रनकारैलि के खवाछै ….. हा्थ पातै मुचि जानी रै । थल ‘क कौतिक जै रैछियाँ महाराज ! रात में गजब जोड़ लागी भ्या किशनुवांक् …. काफलैकी दाँणी जसी तेरि मुखड़ी काई काइ / माया को अलज्याट सुवा म्यार उज्यांण किलै नि चाइ …. रंगत आई भै कूँछा ! टिपाइ फुटी भै , दुमकी ले तबै हुंण छी …. खट्टैन डकार ऊँण बैग्या , असकस जसि ले भयी , मरोड़ पणी त सोचौ झा्ड़ – पिसाब फिरि ऊँ …… लौटिबेरि आयूँ त वां के नै , छार् फैकी रयी भ्यो ! जोड़ चलिए भ्या ….. । पुरि रात मांछनै चार फड़फड़ानै रयूँ …… कां मिलछी ? कती दुहा्र घर बैठि गेछी या रामगंग में फाव हालि मरी …. के पत्त नि चल् ! फिर मैलि ले लपोड़ छाड़ि देछ । उ दिन छ और आज ‘क दिन छ … मेरि दुन्नी में उज्याव भये नै । मूँ खाल्ली मरणां लिजियै ज्यूँन भयूँ ……. होय होय , के बात नै , धैर्ज धर , पछा ब्या करि ल्हीयै , सब ठीक है जा्ल ….. ऐसे ही चाचा समझाते रहे थे । बिशन सींग की दूकान पर चाय , एक प्लेट पकोड़ी का आर्डर देकर गंगोलीहाट टैक्सी स्टैंड की तरफ निकल लिए हैं ।

उनके आने तक किड़ू ‘दा को ज्यादा भूख लगेगी तो तरी मारकर हाफ डाईड चावल भी खा लेगा ….. ऐसा ही बिशन ‘ दा से कह गए हैं । डिग्री कालेज से छात्र – छात्राओं का झुंड नीचे की तरफ लौट रहा है तो वहाँ जाकर क्या करेंगे ….. आँखों को दूरबीन बनाकर ध्यान लगाया तो पता चला कि उन चार लड़कियों के बराबर में जो लोंडा चल रहा है , वह गढ़तिर का गोविंद बोरा ही है । लड़कियाँ पहचान में नहीं आ रहीं तो अनुमान लगा रहे हैं कि बंतु , परु और कब्बू हो सकतीं हैं लेकिन ये चौथी कौन मरी होगी आज ? कहीं खष्टी तो नहीं है …. अपने ही सवाल में हवा मुच गयी है । बड़ी दैखर है , लड़ाई झगड़े में एक नम्बर की …. इसके सामने तो कब्बू का मूँख भी नहीं देखना हुआ । पता नहीं क्यों खार खाती होगी मेरे से !

अब धाल लगाएं तो कैसे और दौड़ कर जाएं तो दुकान से जमनी ‘का ही कह देंगे ….. जग्गू पगैली ग्यो कै और धाल लगाते हैं तो लोग कहेंगे कि यारो , जग्गू मसांण ‘क हाथ् पड़ि ग्यो ….. । तेज कदमों से चलते हुए नजीक से कहा है …. ओ गोविंद ! उत्तर में लड़कियाँ बरफ जैसी जम गईं हैं , केवल गोविंद ने पीछे मुड़कर देखा है …. अरे , जग्गू तू कब आया यार ? अब लड़कियाँ भी पहचान में आ गईं थीं ।

(सभी पात्र व घटनाएं काल्पनिक एवं मनगढ़ंत हैं)

(लेखक ज्ञान पंत के फेसबुक वॉल से साभार)

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