वामपंथी दादा का निराला चेला: पर्दा उठ रहा है बिना भावनाएं आहत किए पढ़ें

यह संवाद वामपंथी दादा और उनके नए नवेले शिष्य के बीच उस वक्त चल रहा है जब दादा मार्क्स को दो सौ साल से ज्यादा हो गए हैं। प्रेत को न मानने वाले दादा, की प्रेत पूजा जारी है। विचारों का एक ऐसा वर्ग है जो दादा मार्क्स और उनके चेलों की मूर्तियों को गंगा में विसर्जन करने पर तुला है। कुछ जोशीले नौजवानों का मानना है- भटकती आत्माएं बेहद खतरनाक होती हैं। गंगा नहला दिया जाए तो प्रकोप शांत हो जाता है। दूसरी तरफ, स्वर्ग और नरक के बंधन से मुक्त, सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठ किसी को न मानने वाले बंधु , दाढ़ी बढ़ाए, टीशर्ट और कालजयी टोपी में दादा मार्क्स, चाचा लेनिन और उनके विचार- वंशज च्वे ग्वेरा और गुरुभाई माओत्से तुंग का ध्यान-जात किए हैं। ऐसे ही वक्त में विचारों की द्वंदात्मकता में उलझा एक शिष्य, वामपंथी दादा से ज्ञान ले रहा है। आगे का संवाद निजी और नितांत तो नहीं है, लेकिन आपमें से कुछ की भावनाएं आहत कर सकता है तो कुछ की भावनाएं तुष्ट।


पर्दा उठ रहा है। गुरु-शिष्य की उम्र और दिखावट- बनावट का अंदाजा पाठक आस-पास की स्थितियों, दृष्यों और जनों से स्वयं लगाएं।

वामपंथी दादा: हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं।

चेला: मतलब
वामपंथी दादा: अरे, धर्म नहीं मानने वाले। संविधान धर्म नहीं मानता।
चेला: क्यों

वामपंथी दादा: क्योंकि दादा मार्क्स कह गए थे धर्म अफीम है।
चेला: दादा लेकिन संविधान में धर्म निरपेक्ष का मतलब….।

( दादा बिना सुने गुस्सा और उत्तेजित होते हुए)

तुम्हें कुछ नहीं आता। दक्षिणपंथी होते जा रहे हो।

चेला: दादा पर धर्मनिरपेक्ष का मतलब तो, स्टेट का कोई अपना धर्म नहीं होगा और स्टेट सभी धर्मों का सम्मान करेगा।

वामपंथी दादा: नहीं ऐसा नहीं है, धर्म बस अफीम है, अफीम है और अफीम है। हम समाज में शोषण की जनक इस अफीम को नहीं चखेंगे, नहीं चखेंगे। विरोध करते हैं।
लाल सलाम, लाल सलाम।

चेला सोचते हुए- कल तो खूब माल फूंका है

चेला: दादा.. और विवाह
वामपंथी दादा: विवाह को नहीं मानते।
चेला: क्यों

वामपंथी दादा: क्योंकि दादा मार्क्स ने कहा है कि विवाह वैध वेश्यावृत्ति है।
चेला: कैसे

वामपंथी दादा: विवाह के बाद पत्नी से सेक्स का कानूनी अधिकार मिल जाता है। स्त्री का शोषण होता है। मर्द उसे सेक्स स्लेव बना डालते हैं। हम विवाह का विरोध करते हैं। लाल सलाम, लाल सलाम। कॉमरेड रेड सेल्यूट। हां, याद आया विवाह संस्था है। वेश्यावृत्ति को लिगली प्रमोट करने वाली संस्था। हम इसे ध्वस्त कर देंगे।

चेला: दादा, परिवार के बारे में
वामपंथी दादा: हम परिवार को नहीं मानते।

चेला सोचते हुए दादा सटिया गए हैं क्या?
चेला: क्यों
वामपंथी दादा:
क्योंकि परिवार संस्था है। जो संस्था है वो पूंजीवादी है। पूंजीवादी मानसिकता की पोषक है। पूंजीवाद को बढ़ावा देती है। समाज में वर्ग असमानता का पुनरुत्पादन करती है।

चेला: कैसे

वामपंथी दादा: परिवार से संपत्ति पर निजी स्वामित्व के अधिकार को बढ़ावा मिलता है। संपत्ति पर निजी स्वामित्व से समाज में शोषण बढ़ता है। परिवार क्रांति के लिए बाधक है।
परिवार समाज में व्याप्त असमान प्रणाली को बढ़ावा देती है।
यह विचारधारा को कंट्रोल करती है।
लोगों को कन्वेंस करती है कि वो समाज में व्याप्त असमान प्रणाली में ही रहे।
परिवार नाम की संस्था इस असमान प्रणाली को नेचुरल और बढ़िया बताती है। हम इसका विरोध करते हैं।
लाल सलाम, लाल सलाम। कॉमरेड रेड सेल्यूट। रिवोल्यूशन लॉन्ग लीव।

चेला: और आस्था, विश्वास और भगवान।
वामपंथी दादा: हम ईश्वर को नहीं मानते हैं।
चेला: क्यों”

वामपंथी दादा: भगवान, ईश्वर, आस्था और विश्वास जैसी चीज़ें समाज को मूर्ख बनाने के लिए गढ़ी गई हैं।
ये सारी चीज़ें अवैज्ञानिक हैं।
हम वैज्ञानिक चेतना वाला समाज बनाना चाहते हैं।
तुम्हें नहीं पता, नास्तिकता मार्क्सवाद का प्राकृतिक और अविभाज्य हिस्सा है।
यह वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत और अभ्यास के लिए जरूरी है।

चेला: ..और दादा आस्था
वामपंथी दादा: आस्था जैसी कोई चीज़ नहीं होती। आस्था लोगों के साइंटफिक अप्रोच को कम करती है और उन्हें कमजोर करती है।

विश्वास

वामपंथी दादा: हम सिर्फ मार्क्स के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं।
अब ज्यादा सवाल मत पूछ। अभी बहुत अध्ययन करना है तुम्हें। मार्क्सवाद को समझना पड़ेगा।
लाल सलाम, लाल सलाम…

चेला: पर दादा
वामपंथी दादा: क्या है?
चेला: जिज्ञासा है और क्यो जो बढ़े जा रही है। पूछ लूं और कह लूं।

वामपंथी दादा: हुउअ

चेला: ये माओ त्से तुंग कौन था?
वामपंथी दादा:  महान क्रांतिकारी। मार्क्सवाद को जमीन पर उतारने वाला महान नेता।

चेला: दादा, पर ये तो 6 करोड़ लोगों का नरसंहार करवा दिया।
वामपंथी दादा: तुम्हारी संगत बिगड़ गई है। तुम्हें कुछ नहीं पता। क्रांति के लिए हिंसा जायज है। प्रतिहिंसा। हिंसा के बिना समाज में कभी कोई परिवर्तन नहीं आया है।
लाल सलाम, लाल सलाम।

चेला: दादा ये जोसेफ स्टोलिन, पोल पोट,किम सुंग….
वामपंथी दादा: महान क्रांतिकारी।
चेला: पर सुना है 4 करोड़, 17 लाख, 16 लाख नरसंहार।
वामपंथी दादा: तुम मूर्ख हो।

चेला: दादा
-ये मार्क्सवादी मुस्लिम नेताओं/राजाओं और ईसाइयों के बारे में बोलने पर दूसरों को सांप्रदायिक क्यों कह देते हैं?
– हिंदू धर्म/इतिहास/आध्यात्म/दर्शन के बारे में हर तथ्य को नकारात्मकता से क्यों पेश करते हैं?
-भारत में मुस्लिम आक्रमण को आगमन क्यों कहते हैं?
-बिना स्टेट/मनी के कोई सोसायटी कैसे चलेगी?
– 200 साल में 1 अरब से ज्यादा नरसंहार
– वियतनाम 10 लाख से ज्यादा/ लेटिन अमेरिका में डेढ़ लाख
– अफगानिस्तान में 15 लाख, अफ्रीका में 17 लाख, नॉर्थ कोरिया और कंबोडिया में 20-20 लाख
-दादा ये वामपंथियों के निशाने पर भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्य ही क्यों रहते हैं?

दादा.. दा..दा.दा…

वामपंथी दादा: तुम कुतर्क पर उतर गए हो। तर्क लेकर आना फिर बात करते हैं।
चेला पगला गया है। उल्टे-सीधे सवाल कर रहा है। इसे दिमाग से दक्षिणपंथ का जहर निकालना पड़ेगा। कल सोचता हूं कैसे इसके भीतर के शैतान को बाहर निकालूं।

चेला: दादा माफ करना।
लग रहा है धुएं का असर ज्यादा ही हो गया। हर दिन दादा ज्ञान देते थे। आज लगता है मैंने ही दे दिया।


ललित फुलारा
पेशे से पत्रकार हैं. कला-साहित्य में विशेष रुचि है. दर्शन को जीना और दर्शन के हो जाना चाहते हैं. विचार, वास्तविकता और सत्य की खोज में उलझे हुए हैं.  आप जो पढ़े रहे हैं और जहां पढ़ रहे हैं-ये इनकी ही देन है. शब्द को माया समझते हैं, मोह उतरा नहीं है.

 

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