पिता का ख़त बेटे के नाम : अपने विचारों के चश्मे से दुनिया को देखना

मेरे प्यारे पुत्र,
पिता होने के नाते मेरी सफलता इसी में होगी कि तुम्हें एक बेहतर इंसान के रूप में पाऊं. इंसान बनने की होड़ में आजकल प्रतिस्पर्धा बहुत कम है, फिर भी लोग इसमें अपना भविष्य नहीं देख रहे. ऐसी कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं है जिसमें बैठकर तुम एक बेहतर इंसान बन सको. इसके लिए तुम्हें हर पल सीखना होगा, हर क्षण सीखना होना. क्लासरूम से, किताबों से और उससे कहीं ज्यादा जिंदगी से.. जिंदगी के हर पड़ाव में तुम्हारी कुछ चिंताएं होंगी. अपनी इस चिट्ठी में उन्हीं चिंताओं के प्रति अपना अनुभव साझा कर रहा हूँ.. जब भी तुम विचलित हो, इस चिट्ठी को जरूर पढ़ना..

दादियों-चाचियों की गोद तुम्हें किसी भी प्ले स्कूल से ज्यादा सिखाएगा
पैदा होते ही मैं तुमपर किताबों का बोझ नहीं लादना चाहता. पहले तुम अपने आसपास को पढ़ना, अपने समाज को पढ़ना. मैं नहीं चाहता कि तीन साल का होते ही तुम्हें प्ले स्कूल में छोड़ आऊं. मुहल्ले की दादियों, चाचियों और बुआओं की गोद, दादाओं-चाचाओं का दुलार तुम्हें किसी भी प्ले स्कूल से ज्यादा सिखाएगा. मैं नहीं चाहता कि सात साल का होते ही तुम्हारे गले में थर्मस टांग पीली बस में बिठाकर तुम्हें विदा कर दूँ. वही बस, वही बीस-पचीस लोग तुम्हारी दुनिया बन जाए. मैं तुम्हें ऐसे स्कूल में पढ़ाना चाहता हूँ जहाँ पढ़ने-लिखने से ज्यादा जिंदगी जीना सिखाया जाता हो. जहाँ अपने छात्रों को बड़ा आदमी से ज्यादा अच्छा आदमी बनाने की कवायद होती हो.

अपने विचारों के चश्मे से दुनिया को देखना
दिन-रात मोटी-मोटी किताबें रटकर 4.5 पॉवर के मोटे लेंस वाले चश्मे से दुनिया को देखने से बेहतर मेरा मानना है कि अपने विचारों के चश्मे से दुनिया को देखो. आर्कीमिडिज का सिद्धांत, न्यूटन के नियम, मार्क्स की विचारधारा इन सबका रटा जाना जरूरी नहीं. सही-गलत के फर्क को समझना दुनिया को देखने का सबसे ज़रूरी चश्मा है. इसे तुम जीवनपर्यन्त अपनी आँखों से लगाए रखना.👓

प्यारे पुत्र, मैं नहीं चाहता कि अपनी इच्छाओं का बोझ तुमपर लाद दूँ. जिसे तुम जीवन भर ढोते रहो. मैं नहीं चाहता कि तुम रिश्तेदारों के सामने अंग्रेजी में Physics is my favorite subject या I want to become a Scientist बोलो और मैं तन के बैठ जाऊं. मैं तुम्हें I want to become a Scientist के बाद B.Tech, फिर UPSC, फिर SSC और अंत में B.Ed. के चक्रव्यूह में उलझा कर नहीं रखना चाहता. तुम स्वतंत्र हो करियर चयन के लिए. सिर्फ मेरे अहं की संतुष्टि के लिए अपना करियर मत चुनना.

अपनी भाषा को लेकर शर्मिंदा मत होना
एक बात और, अपनी भाषा को लेकर कभी शर्मिंदा मत होना. हीनभावनाएँ मत पालना. दुनिया भर में 7000 से अधिक भाषाएँ हैं. इनमें शायद ही कोई ऐसी भाषा हो जिसे साल या दो साल की मेहनत में नहीं सीखा जा सकता. महत्त्वपूर्ण भाषा सीखना नहीं है, महत्त्वपूर्ण है बोला कैसे जाए. बड़ों से, छोटों से. ये शऊर कइयों को जीवन भर नहीं आ पाता. फिर क्या फायदा सीखी हुई भाषाओं का! बोलना सीख जाओ, भाषाएँ संचार में कभी बाधक नहीं बनेंगी.

अब तुम बालिग़ हो गए हो. यह उमर का सबसे खतरनाक दौर है. नया खून, नया जोश. इंसान ज्यादातर गलतियां इसी उमर में करता है. यही उम्र तुम्हारे जीवन भर के चरित्र को तय करेगी. नयी भावनाएं पनपेंगी. नये रिश्ते बनेंगे. पारिवारिक रिश्तों से इतर कुछ रिश्ते. उन रिश्तों की इज्जत करना सीखना. अपने साथी की इज्जत करना सीखना. जोश और होश का संतुलन बनाए रखना. तुम अगर सही रहोगे तो एक पिता होने के नाते हमेशा तुम्हारे पीछे रहूँगा, तुम्हारा संबल बनकर.

अब तुम ये भी शिकायत कर सकते हो कि पूरे पत्र में मैंने सिर्फ अपनी इच्छाएँ थोपी हैं. इसमें तुम्हारी स्वतंत्रता कहाँ बचती है! मेरे प्यारे पुत्र, यह सब मेरे जीवन के अनुभव थे जो तुमसे शब्दों में साझा किया. तुम स्वतंत्र हो इस चिट्ठी को संजो कर रखने के लिए या फाड़ कर कूड़े में फेंक देने के लिए.

तुम्हारा पिता

(यह खत हमें अमन ने भेजा है।  अमन पत्रकारिता के छात्र हैं। )

 

One thought on “पिता का ख़त बेटे के नाम : अपने विचारों के चश्मे से दुनिया को देखना

  1. ये उन सभी भविष्य के पिताओं की आवाज़ बनेगा जो इस तरह की सभी बातें सोच कर तो रख चुके है लेकिन बयां नही कर पा रहे है हर पिता अपने बच्चे के लिए बेहतर करना चाहता है आने वाले समय मे आज के पिताओं से अलग बिलकुल इसी तरह के ख्यालों को एक पिता जियेगा । ये लेख एक मार्गदर्शन है सभी युवा पीढ़ी के लिए सभी का आने वाला कल इस लेख के माध्यम से और अधिक सुलझा हुआ होगा । धन्यवाद🙏🏼😊

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