गिरिराज किशोर ‘बा’: नेपथ्य में ठहरी स्त्री की भूमिका को ईमानदारी और मजबूती से बताने वाली किताब

उंची इमारतों के कंगूरे ही दिखाई देते हैं। नींव की ईंट तो गहरे अंधेरों में ख़ामोश दबी रहती है…

गांधी के जीवन में बा भी नींव की ईंट जैसी थीं। आस्था व सरोकारों में अपने पति की तरह महान, तथापि एक ‘फॉरगाटन वुमेन’… जिन्हें कभी याद किया गया तो बापू की छाया तले और जिनका कभी स्मरण किया गया तो बापू की छवि के साथ; हालांकि जो समय बापू के विचार, बापू के कार्य, बापू के संघर्ष, बापू की सीख, बापू के सवाल, बापू के शब्द, बापू के प्रयोग, और बापू के कदमों के निशान तौल रहा था। समय के ठीक उसी परिदृश्य पर बा भी अपने विचारों, कार्यों, संघर्षों, सीखों, सवालों, शब्दों और योग-प्रयोगों के साथ-साथ क़दमों की आहटों के साथ मौजूद थीं।

लेकिन जाने कैसे लिखते वक़्त कुछ छूट गया, कुछ साथ रहा… जो छूट गया, वह बा का क़िस्सा था और जो साथ रहा, वह बापू का हिस्सा था। जो छूट गईं, वह बा की आहटें थी और जो साथ रहे वह बापू के क़दमों के निशान थे। बापू का समय! बापू का इतिहास! इसीलिए जब वर्षों बाद एक कलम ने बापू के समय में बा को खोजने की कवायद शुरू की, तो गांधी जैसे महाकाव्यात्मक व्यक्तित्व के जीवन में से कस्तूरबा की ज़िंदगी के चावल चुनना, बगैर हथियार के मैदान-ए-जंग में उतरने जैसा था। क्योंकि समय द्वारा छोड़े गए अधूरे दस्तावेजों के साथ बा को ढूंढते हुए दृष्टि जिस भी गली में पर ठहरती, थोड़ा आगे जाकर रास्ता बंद हो जाता। कहीं साक्ष्य मौन, कहीं साक्षी नदारद… फिर बा को ढूंढ़ना, अकेली बा को ढूंढ़ना ही नहीं था। बा को ढूंढने का मतलब बापू को ढूंढ़ना भी था।

उन बापू को, जो जननायक होने से पहले बा के पति थे और हरीलाल, रामदास, मणिलाल, देवदास के पिता! बा को ढूंढने का मतलब, उस स्त्री को ढूंढ़ना भी था जो नेपथ्य में खड़ी रही। बा को ढूंढने का मतलब, समय की उस नब्ज़ को ढूंढ़ना था जिसमें लोक से लेकर तंत्र तक हर कोई अपने-अपने ढंग से, अपना होना तलाश रहा था। तराश रहा था। और इन सबसे अहम; बा को ढूंढ़ना विस्मृति के कगार पर खड़े एक ऐसे व्यक्तित्व को ढूंढ़ना था, जिसके बारे में न समय बहुत मुखर है और न स्मृति…

लेकिन यह बातें तभी तक थीं, जब तक ये किताब नहीं लिखी गई थी क्योंकि नेपथ्य में ठहरी स्त्री की भूमिका को पूरी ईमानदारी और मजबूती से बताते-जताते इस किताब के पृष्ठों से गुजरने के बाद बड़ी-बड़ी तारीखों और बड़े-बड़े व्यक्तित्वों के बीच खोई हुई‘बा’ खोई हुई नहीं लगतीं। उनकी आहटें वापस हमारी स्मृति बन जाती हैं। हमारी धुन! हमारा पाथेय!!

उपमा ‘ऋचा’

पुस्तक की समीक्षा उपमा ‘ऋचा’ ने लिखी हैं। कहानीकार और अनुवादक हैं। दर्जन भर से ज्यादा किताबों का अऩुवाद कर चुकी हैं। इनमें अन्ना बर्न्स का 2018 मैन बुकरप्राइज प्राप्त उपन्यास ‘मिल्कमैन’ भी शामिल है।

 

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