शिक्षक दिवस: अब गुरु का नहीं, शिष्य का जमाना है

आज शिक्षक दिवस है। बचपन से ही इस दिन का अलग ही उत्साह रहता था। रंग और फूलों से काग़ज़ को सजाना शुरु कर देते थे और एक सुंदर- सा कार्ड अपनी प्यारी सी मैडम के लिए तैयार करते थे। वो दौर रेडीमेड का नहीं था न आर्चीज़ के कार्ड का। पैंसिल और रंगों की दुनिया थी।

उसी मैं हम भी हफ्ते भर पहले ही कागज़ को सुंदर से कार्ड के रंग में बदलने में दिन और रात एक कर देते थे। ख़ुशी तब और बढ़ जाती जब कार्ड को देखने के बाद मेम के चेहरे पर प्यारी सी स्माइल और हाथ सर पर आशीर्वाद के रूप में उठता था। उनका वह स्नेह बालमन में उनके प्रति प्रेम और विश्वास को अधिक परिपक्व बना देता था।

यह भी छात्र जीवन के दिन थे जहाँ शिक्षक अधिकार भाव से प्रेम और गुस्सा दोनों करते थे। अधिकार भाव ही था कि माता-पिता अपने बच्चों से अधिक गुरु पर विश्वास करते थे। क्योंकि वह भी भारतीय परंपरा में गुरु की भूमिका को ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के रूप में देखते आए थे। इसलिए अज्ञानता के अंधकार को दूर करने के लिए वह भी निस्वार्थ भाव से उन्हें शिक्षक को सौप देते थे।

खत के साथ ही किस्से, कहानी और कविता।

ऐसे परिवेश में छात्र भी बचपन से ही कबीर के दोहे ‘गुरु कुम्हार शिष्य घट’ की उक्तियों के साथ पले बढ़े हुए थे। शिष्य कुम्हार के कच्चे घड़े के समान थे जो गुरु कुम्हार को सौप दिए गए थे। वह समय था जब गुरु और शिष्य का संबंध जग में सबसे पवित्र और एकाधिकार का संबंध था। जीवन से ज्योति का संबंध था। अंधकार से प्रकाश का संबंध था।

मेरे जीवन में भी शिक्षक की भूमिका में घर पर पापा और सरकारी स्कूल की मेरी रक्षा मेम थी। जिन्होंने मुझे कलम से सही अक्षरों की पहचान कराई। अक्षरों की इस पहचान में गलती पर डांट और मार भी पड़ती थी। घर पर पापा शिक्षक की सख्त भूमिका में थे और स्कूल में मैडम। दोनों ही गुरु कुम्हार की भूमिका में मुझे तराशने में लगे थे।

कहते हैं बालमन को तराशना सरल होता है क्योंकि वो निष्कपट और निष्कलुष होता है और गागर पूरी खाली हो तो उसे भरने में भी आसानी होती है। आज तो न गागर खाली है न ज्ञान। गुरु और शिष्य की परंपरा भी आधुनिक तकनीकों के साथ हाईटेक हो गयी है। इन संबंधों में स्वार्थ और अविश्वास जैसे आधुनिक तकनीकी शब्दों का समावेश हो गया है। तभी तो हर दूसरा शिक्षक क़ानूनी मामलों में उलझा देखा जाता है।

इन सबके बीच आधुनिक तकनीक ने 2 साल की उम्र से ही ज्ञान के भंडार खोल दिए है। बच्चा पैदा बाद में होता है; शिक्षा, उसकी व्यवस्था और कैरियर का सवाल पहले माता-पिता के सामने मुँह खोले खड़ा हो जाता है। माता-पिता भी टेक्नोलॉजी के साथ स्मार्ट हो गए हैं।

अब उन्हें गुरु भी हाई टेक चाहिए जो जल्दी से जल्दी बच्चे को ज्ञानी और कामयाब बना दे
इसमें भी एक शर्त और पाबंदी है। गुरु बच्चे को कुछ कह नहीं सकते हैं डाँटना तो बहुत दूर की बात। अगर डांटा तो गुरु जी अपने गुरु होने की गरिमा खो सकते हैं और ये उनकी अपनी जिम्मेदारी है।

क्योंकि बच्चा आधुनिक जीवन शैली का है उसके लिए गुरु कामयाबी की एक सीढ़ी है उससे अधिक कुछ नहीं और फिर बाज़ार तो है ही… दूसरे गुरु बना लिए जाएंगे। दूसरी ओर ऐसे भी छात्र है जिनके हाथ में चाकू और छुरी है। गुरु कुछ कहें वहीं समझो गये..महानगरों में बहुत सारे केस ऐसे ही है। जहाँ छात्र ने शिक्षक पर हमला कर दिया या उसे मार दिया। कारण उसके गलत को गलत कहना था। तब से बेचारे शिक्षक गुरु की भूमिका से कर्मचारी की भूमिका में आ गए है।

बचपन से संत कबीर का जो दोहा सुनकर और पढ़कर हम बड़े हुए थे ‘गुरु कुम्हार शिष्य घट’ अब वही उक्ति उलट होकर ‘शिष्य कुम्हार और गुरु घट’ की भूमिका में आ गयी है। गुरु की भूमिका में स्वार्थ का समावेश हो गया है तो शिष्य की भूमिका चाकूधारी की हो गयी है। कबीर का दोहा समय और देशकाल के साथ उलट गया है विश्वास समर्पण और प्रेम के संबंध स्वार्थ के वशीभूत हो गए हैं।

इन सब के बीच आज भी निस्वार्थ भाव से गुरु-शिष्य के संबंधों को जीवित रखने वाले बहुत से गुरु और शिष्य मौजूद है। और सही मायनों में 5 सितंबर शिक्षक दिवस का दिन इन्हीं के प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव के प्रति समर्पित है।


भावना मासीवाल जेंडर और स्त्री मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लिखती रही हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से पीएचडी हैं।

 

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