पुराना जूता और इलाहाबाद स्टेशन- वकील के साथ मेरा किस्सा



मैं बेरोजगार था। अचानक एक दिन इलाहाबाद से फोन आया। नंबर सेव नहीं था। किसी भी अपरिचित नंबर से फोन आने पर उनदिनों में तपाक से उठा लेता था। इसके दो कारण थे। पहला- उन दिनों मैं नल्ला था। करने को कुछ था नहीं। दूसरा- लगता था हर अपरिचित नंबर कहीं नौकरी देने वाला तो नहीं है। खैर फोन उठाया तो पता चला उधर से विकास तिवारी हैं। कुछ कहता वो ही पहले बोल पड़े- नल्ले खाली बैठा है तो इलाहाबाद आ जा। मैंने भी मौके पर चौका दे मारा और फौरन जहाज के टिकट की पेशकश कर दी। ये ठीक वैसे ही था जैसे राजपाल यादव अचानक किसी फिल्म के लिए 100 करोड़ मांग लें। कुछ ही देर बाद जब हमारी बात खत्म हो गई तो फोन में एक मैसेज आया जिसमें लिखा था- नल्ले फोन चेक कर कल की टिकट कर दी है। सेकेंड एसी है। हां अपना पेटीएम वॉलेट भी देख ले उसमें भी कुछ है।

यह सुनते ही लगा बेरोजगार को रोजगार मिल गया। फिर क्या था? पुराने जूते पॉलिश करावाए। झोला तैयार किया और स्टेशन पहुंचा गया। सेकेंड एसी में सब चकाचक था। फट से अपनी सीट पर धमक लिया। पैर फैलाए और घर से बोतल में भरा पानी गटक गया। वो भी पूरे टशन में जैसे जूस भरा हो। पन्नी निकाली जिसमें रोटी और आलू की सब्जी थी, खाना शुरू कर दिया। तभी छह फुट का एक हष्ट-पुष्ट भीमकाय आदमी आकर हैल्लो बोला। मैंने सकपकाकर नमस्कार किया और झट से पन्नी छिपाई। उसने नाम पूछा और खुद का नाम मनोहर बताया। ये भी बताया सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं। विजिटिंग कार्ड भी थमा दिया अपना। वो वकील कम सीबीआई अधिकारी ज्यादा लग रहा था। मेरे बारे में तसल्ली से तमाम बातें पूछ डाली।

मैंने कहा-सर क्या सीधे क्लब से आ रहे हो। ( मेरे चेहरे पर मुस्कराहट थी) शायद उसे बात जची नहीं। चेहरा तमतमा गय़ा। अंग्रेजी में उन्होंने कहा- व्हट डू यू मीन?। कुछ कहता। इससे पहले ही उन्होंने फिर सवाल दाग दिया- करते क्या हो आप? मैने खुद को संभाला और बात बदलने की कोशिश की। लपाक उन्होंने फिर पूछा। मैने दबे स्वर में कहा-बेरोजगार हूं। इसके बाद वो नरम पड़ गए। ना जाने क्यों? कुछ देर शांत रहे। फिर बोले बेटा- You want to eat? मैंने कहा- नहीं सर अभी खाया है। वो मुस्कराए। हमने थोड़ी और बातचीत की और सो गए। सुबह हो चुकी थी। वकील साहब जगे और कड़े स्वार में मुझे जगाते हुए- गुड मॉर्निंग कहा।

मैं जागा और लपाक नीचे उतरा। ट्रेन आउटर से स्टेशन की ओर चल पड़ी थी। जूता तलाशने लगा। नहीं दिखा तो लाइट जलाई। वकील साहब ने मेरे परेशानी का कारण पूछा। मैं गुस्से में बोला- सर कोई साला जूता मार गया। वकील ने मुस्कराते हुए कहा- बेटा परेशान मत हो शायद चोर को तुमसे अधिक जूते की जरूरत थी। जस्ट चिल। कुछ ऐसा ही बोला था। मेरी खोपड़ी भनक उठी। उस जूते को अभी तीन साल पहले ही खरीदा था। कल 40 रुपये देकर चमकवाया था। और वकील कह रहा है- जस्ट चिल। मैं भी गुस्से से छनमना उठा। वो मेरी खामोशी देख बोले- कोई बात नहीं है बेटा परेशान मत हो। मैं भी थोड़ा रूखे स्वर में बोला। सर मैं सुप्रीम कोर्ट में नहीं हूं। बेरोजगार हूं। वो शांत हुए। अंगड़ाई लेते हुए सीट से उठे और सामान समेटा पर जूता उनका भी गायब था।

थोड़ा बुदबुदाए। मुझे भनक हुई। मैं खिल उठा। मुस्करा कर बोला- का सर आप का भी बुटवा उड़ा दिया क्या चोरवा? वो क्रोध में अंग्रेजी में गालियां बक रहे थे। मेरी ओर देखते हुए कहा- सुबह मुझे कोर्ट जाना है। अब क्या होगा। मैंने सवाल किया। सर जूता कॉस्टली था क्या? उन्होंने कहा- हां बहुत। कुछ आगे कहता इससे पहले बोले अभी कुछ दिन पहले एक क्लाइंट ने ऑनलाइन ऑर्डर करके भिजवाया था।

स्टेशन आ चुका था। वो बार-बार चोर को कोस रहे थे। दबे स्वर में मैंने उन्हीं का डायलॉग दे मारा। सर उसको आप से अधिक जरूरत रही होगी। उन्होंने घूर कर मेरी तरफ देखा। मैं भी बोला जस्ट चिल सर। वो मुस्कराए। दोनों नंगे पांव अपने बैग के साथ ट्रेन से उतरे। वकील साबह उतरते ही बोले कि मैने क्लाइंट से कहा था कि सेकेंड एसी में मैं नहीं चलता। यहां सेफ नहीं रहता। नाराज होते हुए। मेरी ओर देखकर। मैंने कहा- सर अभी 10 बजे के पहले कोई दुकान नहीं खुलेगी। आप को कहां जाना है। उन्होंने कहा कि होटल कान्हा श्याम। मुझसे पूछे जानते हो कहां है। मैंने कहा- हां सर यहां का बड़ा होटल है। मैं उधर ही जा रहा हूं। फिर वो बोले तुम भी वहीं रुके हो क्या। मैने नाराज होते हुए जवाब दिया। सर क्यों मजे ले रहे हो। मैं बेरोजगार हूं और दोस्त के घर आया हूं। और मैं सिविल लाइन की ओर जाने लगा। फौरन उन्होंने मुझे रोका और कहा मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं। शायद कहीं जूता मिल जाए। हम चल पड़े।

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से मैं और वकील साहब सिविल लाइन की ओर बड़ ही रहे थे। तभी वकील साहब को होटल से फोन आया और उनको बताया गया कि गाड़ी उनकी प्लेटफॉर्म 1 की ओर लगाई जा चुकी है। वकील साहब ने जूते खोने की झल्लाहट उस फोन करने वाले पर निकाली और गाड़ी के लिए मना कर दिया। यह सुनते मैं तमतमा उठा और खुद को रोक नहीं पाया। गुस्से में वकील साहब से बोला। सर गाड़ी क्यों मना कर दी। यहां पैरो में जूते नहीं हैं और हां रस्ते में फूल थोड़ी बिछे हैं। हद है।

वकील ने अपना मोटा चश्मा उतारते हुए मेरी ओर घूरा। मुझे लगा शायद ज्यादा ही बोल दिया। वक्त की नज़ाकत समझ फौरन सॉरी दे मारा। अच्छा ये अंग्रेज साले चले गए पर कुछ शब्द ऐसे हमें सिखा गए जो कहने से पाप तो कट जाते हैं पर अपराधबोध नहीं जाता। उन्हीं शब्दों में एक शब्द ये सौरी भी है। साला लगता ही नहीं माफी मांगी है। ऐसा लगता जैसे बस फिरकी ली हो। खैर, वकील मोटी आवाज में चटका। अब चलोगे महाराज। अमूमन मैं इलाहाबाद स्टेशन पर कभी सीधे रस्ते तो गया नहीं। कारण आप को पता ही होगा- टिकट नहीं लेता इलाहाबाद पढ़ा छात्रा। कोई लड़की साथ हो तो बात अलग है। वकील कुछ कहता मैं पटरी पर कूद पड़ा और वकील की ओर हाथ बढ़ाया और कूदने का इशारा किया। यह देखते ही वकील मेरे पर तड़का और बोला पागल हो गए हो क्या? आर यू मैड? मैंने कहा- कूदो सर नहीं तो रलवे पुलिस दोनों को कूंटेगी। यह सुनते ही वकील को पंख लग गए। मेरे साथ नंगे पांव दौड़ उठा। झाड़ियों, सरपतों, और संडास कर रहे लोगों के बीच से दुर्गंध झेलते हुए पक्की सड़क पर आ पहुंचे।

वकील का आधा शरीर ओंस की वजह से भीग चुका था। सड़क मिलते ही वकील ने लंबी सांस ली और रेलवे की दीवार के सामने खड़ा हो गया। मैं आगे आ चुका था। पीछे देखा तो वकील दीवार को निहार रहा था। उसे खड़ा देख मैं पीछे से उसके पास पहुंचा। दीवार पर एम जुनैद- गुप्त रोगी संपर्क करें। शीघ्र पतन वाले पुरुष निराश ना हों । संपर्क। पुता था। वकील की गंभीरता देख मैं शर्म से पानी-पानी हो गया। ठीक वैसे ही जैसे जब मैंने अपनी बेरोजगारी के बारे में बताया था तो वकील दया भरी नजर से मेरी तरफ देखा था। मैंने वकील के भीमकाय शरीर को ऊपर से नीचे तक तांका। और चुटकी ली- क्या सर। लगता है सारे नंबर नोट कर लिए आपने । और मैं हंसा पड़ा। मजाक से वकील खफा हो गया और बोला- आर यू मैड? मेरे बच्चे हैं यार। यह सुनते ही मुझे सांप सूंघ गया। मैं शांत हुआ। फिर अचानक वकील के कान में लगे इयरफोन पर नजर गई । वकील ना जाने किस भाषा में किसी से बात कर रहा था। हम दोनों होटल की ओर गए पर पता नहीं कैसे मैं भी थोड़ा रस्ता भटक गया।

वकील कहां गया और मैं कहां…यह जानने के लिए अगली किस्त का इंतजार करें
आशुतोष पांडे पेशे से पत्रकार हैं। इलाहाबाद में थे तो सिर पर लंबी चुटिया थी। नोएडा शहर ने चुटिया छीन ली। नंबर वन फसकी हैं। जहां लोगों के पास टाइम नहीं है। इनके पास भरा-पूरा है। ये नल्ले ही आए थे और नल्ले ही जाएंगे। कसम जो खा रखी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *