यात्रा-पुस्तक ‘चले साथ पहाड़’: नदियों के प्रवाह, ऊंचे पहाड़ों से रिसने वाले झरनों और पर्वत चोटियों के दिलचस्प अनुभव

 

ललित मोहन रयाल
लेखक अरुण कुकसाल के सद्य प्रकाशित यात्रा-वृत्तांत ‘चले साथ पहाड़’ में लेखक ने अलग-अलग कालखंडों में की गई 10 यात्राओं को शामिल किया है. इनमें से सुंदरढुंगा ग्लेशियर की यात्रा तीन दशक पहले की है, शेष यात्राएं इसी दशक की हैं. मेरे लिए इससे बढ़कर बात क्या होगी कि जिन स्थलों की उन्होंने यात्रा की, उनमें से अधिकांश क्षेत्रों में मेरी तैनातियाँ रही हैं, जिसके चलते उन स्थलों से मैं सहजता से तादात्म्य स्थापित कर लेता हूँ.

सर-बडियार की यात्रा में उन्हें पर्वतीय जनजीवन की जीवंतता और संघर्ष की झलक दिखती है, तो श्रीनगर-रानीखेत, श्रीनगर-अल्मोड़ा की यात्रा में गढ़वाल-कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक विरासत. मद्महेश्वर, कार्तिक स्वामी, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और केदारनाथ यात्राएँ आपको खूबसूरत किंतु अनजाने तीर्थ-स्थलों की ओर ले जाती हैं. एक अच्छा यात्रा वृत्तांत, स्थान-विशेष की प्राकृतिक विशेषताओं, बस्तियों के प्रारूपों, सामाजिक संरचनाओं, रहन-सहन और आगंतुकों के अनुभवों को स्थान देता है. लेखक ने इन गंतव्यों को तटस्थ दृष्टा के रूप में देखा है.

इस संकलन में आपको नदियों के प्रवाह, ऊँचे पहाड़ों से रिसने वाले झरनों, दुर्गम बस्तियों, ऊँची पर्वत चोटियों के दिलचस्प अनुभव पढ़ने को मिलेंगे. प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत ‘आखिरी चट्टान तक’ लिखने वाले मोहन राकेश के मुताबिक, यात्रा, यात्री को तटस्थ नजरिया देती है, जो आमतौर पर इंसान को दैनिक जीवन में देखने को नहीं मिलती.

मानव स्वभाव से प्रकृति-प्रेमी है. इन अनुभवों में लेखक का सौंदर्य-बोध, कुदरत को देखने की उल्लास-भावना, व्यक्ति-परखता, आत्मीयता सहज ही देखने को मिलती है. जो दुश्वारियां उन्होंने देखी, उन्हें शुद्ध मनोभावों से प्रकट करने में जरा भी गुरेज नहीं किया है. रचना में यायावर की नजर पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य से कहीं अधिक जनजीवन की दुश्वारियों पर टिकी रही- दानपुर की यात्रा में लेखक ने स्थानीय निवासी के मुख से निकले उद्गारों को रिकॉर्ड किया है-

लेखक अरुण कुकसाल

“मूलभूत सुविधाओं से अनछुए ये पेड़-पहाड़ आपको दिखने में सुंदर लगेंगे ही। पर जब आपको इनमें ही रहना हो तब आपका यह विचार, विचार ही रह सकता है।” मद्महेश्वर-यात्रा में साथी यात्री भूपेंद्र कहते हैं, “सुबह के छह बजे चलना शुरू किया था और इस समय बज रहे हैं बारह, घड़ी में भी और हमारे मुँह पर भी।” इस यात्रा में वे मैखंबा चट्टी में छोटा सा रेस्ट-हाउस चलाती रंगोली से मिलते हैं। उसकी कर्मठता देख उसकी जिजीविषा को सराहे बिना नहीं रह पाते।

इसी तरह दानपुर यात्रा में विनायकधार की बचुलदी के उद्यम के चलते, उसकी दुकान उन्हें शहर के किसी मॉल के समतुल्य दिखती है। कुल मिलाकर ‘चले साथ पहाड़’ यात्रा वृत्तांत पढ़ना दिलचस्प अनुभव रहा. महसूस किया कि लेखक की डायरी के साथ-साथ आप भी उन दृश्यों से रूबरू होने लगते हैं.

(लेखक अरुण कुकसाल के फेसबुक वॉल से साभार)

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