गिरीश कर्नाड का नाटक ययाति: यह एक नहीं, प्रत्येक मनुष्य की जीवन कथा है

पहले मेज! फिर कुर्सी हिली उसके बाद बेड भी डोलने लगा। धीरे धीरे लैपटॉप, पंखा उसके बाद अलमारी में पड़ी किताबें भी हिली। लेकिन नाटक को पढ़ने में लीन थी। वैसे भी आखिरी पन्ने को छोड़कर उठ पाना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल हो जाता है। फिर सोचा नाटक को समाप्त करके ही कोई और कार्य करूंगी। अचानक देखा तो कपड़े का बैग भी हिलोरे खा रहा था। फिर लगा कहीं भूकंप तो नहीं आया न!

अरे हां …भूकंप तो कहीं नहीं, यहीं आया है! जल्दी से हाथ में पकड़ी हुई किताब को मेज पर रखा और कमरे से बाहर निकल गयी। बहुत डरी हुई थी, ऐसा लग रहा था मानो घर ही मेरे ऊपर गिर रहा हो। खैर! 15 मिनट के बाद भूकंप का नामोनिशान नहीं रहा। उसके बाद अनूदित नाटक की किताब ‘ययाति’ के आखिर दो पन्नों को भी पढ़ लिया। कल दिन से ही गिरीश कर्नाड के नाटक ‘ययाति’ को पढ़ रही थी।

वास्तव में गिरीश कर्नाड का लेखन बहुत प्रभावशाली है। गिरीश कर्नाड अपनी मातृभाषा कन्नड़ में लेखन कार्य करते थे। उन्होंने अपना पहला नाटक ’ययाति’ सन् 1961 में कन्नड़ भाषा में लिखा था। जिसका हिंदी में अनुवाद बी.आर. नारायण ने किया है। इस अनुदित नाटक का पहला संस्करण सन् 1979 में आया था जो मात्र 90 पृष्ठों की है। और जिसको चार अंकों में विभाजित किया गया है। गिरीश कर्नाड ने ‘ययाति’ नाटक की कथावस्तु को पौराणिक पृष्ठभूमि से लिया है।

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जैसा कि वर्तमान समय में पौराणिक आख्यानों को मिथक के नाम से जाना जाता है। उन्होंने इस मिथक कथा को आधुनिक परिस्थितियों और घटनाओं के समकक्ष खड़ा किया है। ताकि आधुनिक समाज अपने पौराणिक कथाओं के जरिये प्रेम, द्वेष और त्याग को समझे। जो आधुनिक समय में मनुष्य के जीवन से समाप्त होते जा रहे है। नाटक में मानवीय संवेदनाओं के छटपटाहट को विभिन्न पात्रों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। मैंने अभी तक गिरीश कनार्ड के नाटक ’ययाति’ का मंचन नहीं देखा हैं।

लेकिन जिस तरह कोई नाटक पर्दे पर चलता रहता है, उसी तरह पढ़ते समय आखों के सामने ‘ययाति’ नाटक का संपूर्ण दृश्य चलता दिखाई दे रहा था। नाटक में छः पात्र है, जो अपने अपने मूल्यों पर जीवन जीते दिखाई देते हैं। जैसा कि किताब की फ्लैप पर लिखा है “ययाति नाटक के सारे पात्र इस श्रृंखला को अपने-अपने स्थान से गति देते हैं, जैसे जीवन में हम सब।


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अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं से प्रेरित-पीड़ित इस तरह हम जीवन का निर्माण करते हैं।” अर्थात गिरीश कर्नाड इस नाटक के जरिये समाज में रह रहे, आप और हम जैसे लोगों की जीवन की इच्छाओं, आकांक्षाओं और पीड़ाओं को एक मंच पर प्रस्तुत कर रहे है।

जो एक काल में ही नहीं अपितु हर देशकाल में घट रही हैं। और यह एक मनुष्य नहीं प्रत्येक मनुष्य की जीवन की कथा है। गिरीश कर्नाड ने नाटक ‘ययाति’ में पारिवारिक इर्ष्या को भी अलग अलग रूपों में प्रस्तुत किया है। जैसे ययाति और शर्मिष्ठा के प्रेमप्रसंग को सुनकर उनकी पत्नी देवयानी घर छोड़ चली जाती है। नाटक में देवयानी और ययाति के संबंधों के उतार-चढ़ाव और उनके जीवन में हो रहे नैतिक मूल्यों के ह्रास को दिखाया गया है। साथ ही ययाति का शर्मिष्ठा की ओर आकर्षित होकर प्रेम करना और देवयानी का ययाति से सम्बन्ध तोड़ना आदि।

नाटक में पुत्र के आगमन पर आरती नहीं होती, बल्कि ययाति से पुरु कहते है “हमारे वंश की गरिमा! मेरे पिताजी ने किस प्रकार पहली बार ही पचास ऋचाओं को कंठस्थ कर लिया था!”

नाटक के इस संवाद को पढ़कर अनुमान हो जाता है कि पिता और पुत्र के मध्य इर्ष्या है जो नाटक में ययाति और पुरु के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आती है, जिससे स्प्ष्ट जा जाता है कि ययाति और उनके पुत्र पुरु के मध्य प्रेमभाव जैसा कुछ भी नहीं है। बल्कि वह दोनों जब भी वार्तालाप करते है तो झगड़ने लगते है। किन्तु इस नाटक में प्रेम, द्वेष के अतिरिक्त कुछ जीवन मूल्य भी हैं जो समाज को एक सूत्र में बांध कर रखते हैं। जैसे नाटक के शीर्षक के पात्र ययाति को यौवन-लिप्सा के रूप में प्रस्तुत किया है। वहीं पुरु अपने पिता का श्राप लेकर स्वयं वृद्धा अवस्था को स्वीकार कर लेते है। जबकि पुरु की पत्नी चित्रलेखा अपने पति के त्याग से दुखी होकर ययाति से कहती है कि “आपकी सभी विजयों के लिए मेरी क्या आवश्यकता है? आपके पास तारुण्य है। पुरुराज के पास त्याग है। मैं क्या करूँ यहाँ?” और विष पी लेती है, विक्षोभ में दुखी चित्रलेखा करें भी क्या! पुरु ने विवाह किया लेकिन निर्णय लेने का अधिकार पत्नी को न दिया। पत्नी को बिना बताएं ययाति के श्राप को अपना लिया। क्या चित्रलेखा के प्रति पुरु का कोई प्रेम और आत्मसम्मान का भाव नहीं है? यहीं सोचकर चित्रलेखा ने मृत्यु को गले से लगा लिया। अपने पिता के लिये त्याग करके पुरु अपनी प्रजा और ययाति की सामने महान बन बैठे, लेकिन पत्नी के बारे सोचा भी नहीं।

इसके पश्चात ययाति को श्राप मिलने पर शर्मिष्ठा उसको उसी रूप में स्वीकार करके उसी के पास रहने लगी। लेकिन चित्रलेखा की मृत्यु से ययाति का हृदय परिवर्तित हो जाता है। जिसके कारण ययाति पुरु को राज्य सौंप देते है और अंत में शर्मिष्ठा के साथ जंगल में चले जाते हैं। इस नाटक में गिरीश कर्नाड ने पौराणिक पात्रों के द्वारा वर्तमान व्यवस्था और परिस्थितियों को दर्शाया। जो वर्तमान समाज में आज भी विद्यमान है।

देखा जाएं तो इस प्रकार का लेखन कार्य करना सरल नहीं है, लेकिन गिरीश कर्नाड ने अपने लेखन में इन सभी मानवीय मूल्यों को समाहित किया। जिससे उनके लेखन में जीवन मूल्य, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं के भाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। ययाति नाटक को पढ़कर मेरे जो विचार बनें, मैंने उन्हें साझा किया। बाकी पढ़ने के बाद सबके अलग-अलग विचार हो सकते। वैसे भी विचारों का क्या! वो तो बनते-बिगड़ते रहते हैं, पढ़ा जाना आवश्यक है।  साहित्य, सिनेमा और रंगमंच में …एक लेखक, नाटककार, निर्देशक और अभिनेता!
(अनुराधा)


अनुराधा पीएचडी शोधार्थी हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। संपर्क- anuradha.du91@gmail.com

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