शिक्षक दिवस 2019: उन गुमनाम गुरुओं के नाम जिन्होंने निस्वार्थ भाव से गले लगाया

प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक की अहम भूमिका होती है। बचपन से लेकर जवानी और बुढ़ापे तक हमारे जीवन में ऐसे तमाम गुमनाम शिक्षक होते हैं जो निस्वार्थ भाव से हमें गले लगाते हैं। हमारा मार्गदर्शन करते हैं। ऐसे गुरुओं को किसी भी चीज की चाहत नहीं होती, वे अपने शिष्यों से कोई अपेक्षा नहीं रखते, बस एक ही ख्वाहिश दिल में संजोते हैं कि उनके शिष्य आगे बढ़े और अपना भविष्य संवारे।

ऐसे ही मेरे जीवन में कई गुमनाम गुरुओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही जिन्होंने निस्वार्थ भाव से मुझे गले लगाया और मेरा मार्गदर्शन किया। अब भी करते हैं। ये तमाम गुरु किसी न किसी रूप में हमारे साथ खड़े रहते हैं। हमें संबल बनाते हैं और अपने अनुभवों की पौथी से हमारे जीवन को सींचते हैं। इसलिए, इस शिक्षक दिवस पर मैं ऐसे तमाम गुरुओं को नमन करना चाहता हूं।

महान शिक्षाविद और भारत के पांचवें उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति रहे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्ण का मानना था कि असली शिक्षक वो ही है जो छात्रों को आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें। दरअसल, हर छात्र के जीवन में सबसे बड़ी चुनौती और संघर्ष भविष्य को लेकर होता है। छात्र, स्कूल की कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय की बेंच तक, भविष्य को लेकर आशंकित रहते हैं। ऐसे में तमाम शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को शिक्षा देने के साथ ही, उनके भविष्य निर्माण में भी अपना सकारात्मक सहयोग दें।

बचपन से ही बच्चों का किताबों के प्रति लगाव विकसित करें। उन्हें किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करें, क्योंकि किताबों के जरिए ही हम भारतीय समाज और बहुलतावादी संस्कृति की समझ विकसित करते हैं। किताबों के जरिए, बीते हुए कल और आने वाले कल को समझते हैं। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का भी मानना था कि किताबें ही वो माध्यम हैं जो दो संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकती हैं।

खत के साथ ही किस्से, कहानी और कविता।

हमारे वक्त और अब के वक्त में शिक्षा और गुरुओं के स्वरूप में काफी तब्दीली आई है। शिक्षकों के आचरण से लेकर वेष-भूषा और वाणी तक सब बदल गई है। यह ऐसा दौर है जब शिक्षा इतनी महंगी है कि छात्र और शिक्षक दोनों पर ही बाजारवाद का प्रभाव काफी बढ़ गया है। गुरुओं की गरिमा में गिरावट आया है और शिष्य अपने कर्तव्य मार्ग से हटने लगे हैं। ऐसे में हमें मानवता की नैतिक जड़ों को जरूर याद करना चाहिए क्योंकि इनसे ही अच्छी व्यवस्था और स्वतंत्रता दोनों ही बनी रह सकती है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का भी ये ही मानना था। शिक्षक का काम ही होता है कि वह छात्रों के भीतर की बुराइयों को खत्म कर सकें। यह तभी संभव है जब शिक्षक अपने भीतर की बुराई से अवगत हो। अगर शिक्षक के भीतर की बुराई हावी रहेगी तो शिक्षा के साथ ही छात्र का भविष्य भी प्रभावित होगा।

भारतीय संस्कृति और धार्मिक ग्रंथों में तो शिक्षक को साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और हमेश की संज्ञा दी गई है। शिक्षक का काम ही है कि वह देश के निर्माण करने वाले भविष्य को अच्छे से प्रशिक्षित और प्रकाशमान करें। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मान्यता थी कि मानव की प्रकृति स्वभाविक रूप से अच्छी है और ज्ञान के फैलाने से सभी बुराइयों का अंत हो जायेगा। यह ज्ञान शिक्षक ही फैला सकता है। शिक्षा के जरिए ही समाज की कुरीतियों और बुराइयों को जड़ से मिटाया जा सकता है। इसलिए, समाज को दिशा देने और छात्रों के भीतर नवचेतना को विकसित करने में शिक्षक की वैसे ही भूमिका होती है जैसे की परिवार की भूमिका बच्चे के भीतर संस्कार व व्यवहार की तालीम के रूप में होती है। इसलिए, हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो क्लास की पहली बेंच से लेकर आखिरी बेंच तक हर बच्चे के बारे में जानते हैं, उसका नाम याद हो। कमजोर बच्चों को भी उसी तरह से हाथ पकड़कर आगे बढ़ाएं जिस तरह से होशियार बच्चों को बढ़ाया जा सकता है। अपने सभी छात्रों से समान व्यवहार करने वाले शिक्षक की असल मायने में राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।


अजेय कुमार
(संगठन महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी (यूपी)

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