‘संस्कृति’ आत्मा और वैदिक धर्म ‘पथ प्रदर्शक’ है

आत्मीय युवाशक्ति
यह पत्र आपको समर्पित है।
आप ही भारतीय संस्कृति, सभ्यता, वैदिक साहित्य एवं दर्शन के ध्वज वाहक हैं। आपसे संवाद करने से पहले मैं कहना चाहूंगा- ‘तत्वमसि’। यह वेद की चार घोषणाओं में से एक है। ‘वह तुम ही हो’। संपूर्ण व्याख्या में न जाते हुए ‘वह जो तुम हो’ उसी से मेरा यह पत्राचार है। संस्कृति हमारी आत्मा है। वैदिक धर्म पथप्रदर्शक है। जिस तरह से सुख का बोध अपने-आपसे होता है दूसरे से नहीं, उसी तरह ईश्वरीय ज्ञान को बोध भी खुद से ही होता है। आप सबमें बोध है। उसी बोध के अनुरुप अपना रास्ता चुनें। अपनी जड़ों को अपने उर में बसाए रखें। जड़ ही हमारी कामयाबी और देश की तरक्की का रास्ता होती है।

उस पथ पर कभी आगे न बढ़ें जो हमारी ‘आत्मा’ और ‘उद्देश्य’ दोनों के लिए घातक है। आप अलग-अलग विचारधाराओं को मानने वाले होंगे। सही विचार क्या है…। यह आपकी चेतना पर निर्भर है। अपनी अंतरआत्मा में झांके और अपने समृद्ध अतीत और प्राचीन दर्शन को जरूर पढ़ें। आधुनिक होने में कोई बुराई नहीं लेकिन जो आधुनिकता आपको जड़ों से काट देती है, समाज की समरसता और ‘राष्ट्र’ के प्रति समर्पण पर सवाल खड़ी करती है..वह आधुनिकता समृद्धि एवं विकास की जगह ‘विनाश’ की तरफ ले जाती है।

मुझे अच्छा लगता है जब प्रतिदिन में आपसे मिलता हूं। राष्ट्र के प्रति आपके समर्पण एवं देश के प्रति जज्बे को देखता हूं। मैं आपके बीच आपकी उम्र का ही युवा बन जाता हूं। ‘राष्ट्र’ सर्वोपरी है। राष्ट्र की सेवा निज स्वार्थ से परे है। आप खूब पढ़ें, लिखें एवं विचारशील बनें। अपनी परंपराओं को आगे ले जाएं। व्यस्तताओं में से थोड़ा-सा वक्त निकालकर में कोशिश करूंगा कि आपसे हर रोज पत्राचार के जरिए अपने भावनाओं को व्यक्त करूं। पहला ख़त है और विषय विस्तृत हैं।

अगली चिट्ठी में आपसे देश के मुद्दों, देश की मांग, राजनीति एवं वामपंथ के विद्रूप चेहरे व आजादी के बाद से भारत में सबसे ज्यादा राज करने वाली पार्टी को लेकर कई सारी बातचीत होगी। फिलहाल इस चिट्ठी को मैं ‘तत्वमसि’ तक ही रखना चाहूंगा। ‘चेतना’ पर सवाल उठाने वाले पदार्थ के हिमायती विचार वालों से इतना ही कहूंगा- कोई भी कार्य अपने कारण को छोड़कर क्या एक क्षण के लिए भी अवस्थित रह सकता है। क्या घड़ा मिट्टी को छोड़कर एक क्षण के लिए भी टिक सकता है। जगत के पदार्थ कार्यरूप हैं, जिनका कारण स्वयं ब्रह्म है। ईश्वर रस स्वरूप है। उपनिषद में भी कहा गया है- रसौ वै स:।

आपका शुभचिंतक
अजेय कुमार
क्षेत्रीय संगठन महामंत्री, भाजपा (पश्चिमी उत्तर प्रदेश)

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