दिल्ली में नहीं, तेरे दिल में रहती हूं… रे पहाड़

डॉ रेखा उप्रेती की पहाड़ के नाम पाती

ओ पहाड़!
कैसा है रे!!
तू सोचेगा वर्षों बाद याद कैसे आई। नहीं रे, भूली कहां हूं तुझे… हां चिट्ठी लिखने का ख्याल नहीं आया कभी। कल रात दिल्ली मौसी आई सपने में। उलाहना देती रही। “बसे हो मेरी ज़मीन पर, याराना पहाड़ से !!” “ नहीं मौसी, हमने आपका नमक खाया है”

मैंने तनिक मुस्कुराने की कोशिश की। लगा दिल्ली बोलेगी
“तो अब गोली भी खा” पर वह तमतमाती हुई निकल गयी। यूं भी साल में नौ महीने तमतमाई ही रहती है…। बड़ा धर्मसंकट है रे। तुझसे यारी भी नहीं छूटती और दिल्ली को नाराज़ भी नहीं करना चाहती… दोनों हाथों में लड्डू चाहिए न हमें…।

मेरी छोड़, अपनी सुना… तुझे भी तो कितने शिकवे होंगे न… तू तो पूर्वज रहा, पिता और प्रेमी भी… हमने तो बस तर्पण कर तसल्ली कर ली, बेटियों की तरह घर-आंगन छोड़ पराए हो गए, बेवफ़ा प्रेमिकाओं से ‘सूटेबल ब्वौय’ ढूंढ घर बसा लिया… न वंशजों की तरह तेरी दी हुई अमूल्य थाती को सहेज कर रखा, न बीमार होते पिता की तीमारदारी का दायित्व समझा, न ठुकराए गए प्रेमी की कराह पर कान दिए…

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मां नहीं बन पाए तेरी कि तेरे बंजर होते खेतों को आंचल और आंखों से सींच फिर से हरा कर दें…
तेरे दहकते जंगलों पर बारिस बन बरस न सके, न तेरे सूखते स्रोतों को फिर से नम करने को अपना खून पानी किया…हम तो खुद ही पानी की तरह बह आए इधर .. और सोच लिया कि पानी की नियति है नीचे की ओर बहना … यह नहीं सोचा कि वाष्प बन फिर से बरसा जा सकता है शिखरों पर… बर्फ बन जमा जा सकता है, पिघल कर बना जा सकता है झील, झरना, नदी, गाड़, गधेरा… धरती के भीतर रिस कर फूटा जा सकता है किसी नौले की सीर में…

पता है मेरे पिताजी दिल्ली में नौकरी करते रहे और दिल में यह हौंस पाले रहे कि सेवा-निवृत होकर लौटूंगा पहाड़… मगर ये हो सका…
मैं भी यही सोचती हूं … हो सकेगा क्या..!!

और क्या जर्जर हो चुकी देह को तू उसी प्यार से बांहों में समेट सकेगा…पिछली बेवफाई भूल कर…

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इन दिनों कितनी तेरी संताने लौटीं हैं तुझमें पनाह पाने को… महानगरों की मृग-मरीचिका के छल में उलझे रहे…अब छाले लेकर लौटे हैं… थोड़ा उदार हो जाना रे…अपने दिल में जगह देना…हो सके तो इस बार दिखाना वह राह जो बाहर नहीं भीतर को लौटती है… देहरी के खुले द्वार और भरे भकार दिखाना उन्हें…पुरखों के लगाए बूढ़े पेड़ों की छांह में बैठ समझाना उन्हें कि नए वृक्षों को पनपने में ज्यादा देर नहीं लगती…

थोड़ी सी नमी और धैर्य… तेरे लिए भी अच्छा है रे, फिर से लहराएगी तेरे सूने आंगनों में बहार, द्वार पर उग आए ‘सीसूण’ के झाड़ छ्टेंगें, उघरी ‘कुडियां’ आबाद होंगीं, सूने पड़े छन में रम्भाएगी गाय, बाड़े में बछिया संग उछाल मारेंगें बच्चे… संगी–साथियों के साथ कटकी चहा और देस-विदेस के फसक…

नाराज़ मत होना रे, तुझे क्या समझा रही मैं… यहां दिल्ली के वातानुकूलित कमरे में बैठ भावुक-सी चिट्ठी लिखना कितना आसान है न… तू भी हंस रहा होगा… कितने अनुत्तरित प्रश्नों को छुए बिना लिखी यह पाती पढ़ तो रहा न … !! पढ़ कर चाहे उड़ा देना हवा में … तिरते शब्दों को क्या पता मिल जाए ज़मीन वहीं कहीं… जानती हूँ रूखे-सूखे दीखते तेरे पाषण-ह्रदय में अब भी रिस रहे हैं करुणा के कण… उनकी थोड़ी नमी पाकर लहलहा उठेंगे धान से …

जवाब देगा इसकी संभावना नहीं है…पर लिखे तो पता है न मेरा पता… दिल्ली में नहीं, तेरे दिल में रहती हूँ…अब भी…
प्रतीक्षा में
एक पहाड़न


रेखा उप्रेती दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज में हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

2 thoughts on “दिल्ली में नहीं, तेरे दिल में रहती हूं… रे पहाड़

  1. अहा गजब दी,, आप क्या लिख देती हो पहाड़ को,, हाँ एक पहाड़न का दिल है तो पहाड़ तो अस्तित्व में ही,,, ये पहाड़ मेरी भी कमजोरी,, 👏👏💐💐

  2. रेखा तुम्हारी प्रेम पाती तो छू गई दिल को। पहाड़िन की ये प्रेम पुकार तो पहाड़ का दिल भी पिघला सकती है।

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