बिछुड़े मित्र को एक ख़त

पुराने कागजों में आज यह आधा-अधूरा पत्र मिल गया – इसे कभी पूरा करके, परिचित के हाथ आपके पास दूर देश भेजा था – लिखा है

वेरी डियर ….जी
नमस्कार !
एक लम्बे मौन के बाद आपकी स्मृति के झरोखों में झाँक लेने की यह कोशिश, इसलिए कि बहुत पास से कोई बहुत दूर आपके पास आ रही हैं.

यह सितम्बर है और यादों में है चौबीस सितम्बर, एक तिथि भर नहीं है जो – पूरा कोलाज बनाती है यह तारीख …… डीडीए फलैट्स में आपका घर – मम्मी की बातें और उनके हाथ का खाना – दिल्ली यूनिवर्सिटी आर्ट्स फैकल्टी – हरिजन सेवक संघ – खादी भण्डार …मैं तो मानती हूँ कि मन में विगत स्मृतियों का आना, बने रहना, खो जाना – केवल निरर्थक ही नहीं होता.

मेरे लिए सार्थक इन स्मृतियों के बहाने आपसे संपर्क हो पाएगा या नहीं – नहीं जानती – फिर भी मेरा नया पता है

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मेरा फोन और मोबाइल ………………….

आदर एवं शुभकामनाओं सहित !
इन पंक्तियों को पढ़कर आज मैं इस पुराने अधूरे ख़त को नए सिरे से पूरा करने बैठ गई हूँ. अब तो आप जाने कहाँ हैं – कोई खोज-खबर नहीं – विदेश की महत्वपूर्ण नौकरी से निवृत्त किन्तु अपनी अभिरुचि से तो अब भी जुड़ी होंगी – लेखन ! हालांकि इस बीच कुछ पढ़ा नहीं आपका लिखा. प्रवास की एक उल्लेखनीय कहानी और फिर नाटक का मंचन तक मेरी स्मृति में है.

एक पत्र कवि की स्मृति को….!

यह भी स्मृति में है कि मुझसे आप की घनघोर नाराजी का लेना-देना उस बात से था जिसे साहित्यिक शब्दावली में मूर्ति-भंजन कहते हैं. आपके जीवन-क्रम पर किसी आत्मीय ने कुछ कह भर दिया मुझसे और आपके पूछने पर भी मैंने आपको बहुत अधिक नहीं बताया, बस इतना ही तो था. लेकिन मुझे आज भी याद है आपका कथन – ‘तुम मुझसे छिपा रही हो .. दुःख यह नहीं कि वे तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हैं, पीड़ा तो इस बात की है कि मैं सहसा तुम्हारे लिए इतनी महत्वहीन हो गई !’

वह दिन और आज का दिन – फिर आपने कोई संपर्क नहीं रखा. बात आपके मन में इतनी गहरी गड़ गई. मैं सोचती हूँ – पत्र भूले-भटके भी कभी सही पते पर पहुँच ही जाते हैं – शायद यह भी पहुंचे – और आपका भाव परिवर्तन हो, हम फिर से मित्र हों….इसी आशा में आप जैसे बिछुड़े मित्र को यह पत्र …

सादर
विजया सती
विजया सती दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिन्दू कॉलेज में 30 सालों से अध्यापन कार्य कर रही हैं. लेकिन इसके बावजूद भी स्वयं को हमेशा साहित्य की छात्रा मानती हैं. विदेशों में भी अध्यापन कार्य किया है. यह ख़त उन्होंने अपने गुरु हिंदी के महान कवि और संपादक रहे स्वर्गीय अजित कुमार जी के नाम लिखा है.

 

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