एक बार फिर दिल्ली से उदास होकर जा रहा हूं।

प्रिय ललित
         
जाने से पहले तुम्हें ये खत लिखने बैठा हूं। समझ में नहीं आ रहा क्या लिखूं? लऔर ऊपर से तुमने कहा है कि पत्र छोटा होना चाहिए। जिसने मुझे परेशानी में डाल दिया है। तुम्हारी इस बात से मुझे शेक्सपीयर की एक बात याद आ रही है। जिसमें उसने कहा था कि संक्षिप्ता विद्धता की निशानी है। पर भाई मैं कोई विद्वान तो हूं नहीं की अपनी बात कम से कम शब्दों में कह दूं। फिर भी कोशिश करता हूं। मुझे पता नहीं था कि जुटान वाले कार्यक्रम में तुम भी आओगे और कविता पाठ भी करोगे।
 
जब तुमने मुझे इसके बारे में बताया तो मुझे बहुत खुशी हुई। और तुम नहीं आते तो मैं वहां अकेला और असहज महसूस करता। पर इससे भी बड़ी खुशी की बात यह है कि मुझे अब अकेले नोएडा नहीं जाना पड़ेगा। दिल्ली कई बार आ चुका हूं फिर भी यहां अकेले कहीं आने-जाने में अच्छा नहीं लगता है।
 
मेट्रो में तो असहज महसूस करता हूं। राजीव चौक से तो सच में डर ही लगता है! यहां मेट्रो में चढ़ना-उतरना कोई युद्ध लड़ने से कम थोड़े न है! इसलिए दिल्ली में जब कोई मेरे साथ होता है तो सहज महसूस करता हूं और अच्छा लगता है। लेकिन अकेले होने पर बहुत ही बुरा लगता है। तुम्हारी कविताएं मैंने पहले भी पढ़ी थी लेकिन कवि के मुंह से कविताएं सुनने का एक अलग ही आनंद होता है। तुम पहली बार कविता पाठ कर रहे थे, ये तुम्हें देखकर लगा नहीं। तुमने बहुत ही सहज और स्वभाविक ढंग से कविता पाठ किया।
 
मैं जब पहली बार मंच से कविता पाठ करने गया था तो मेरी हालत खराब हो गई थी। पांव हिलने लगे थे। किसी तरह हड़बड़ाते हुए मैंने कविता पाठ किया था। मंच से उतरने के बाद भी मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी और सामान्य होने में काफी समय लगा था। और अब तो मंचों से बोलने की आदत ही हो गई है।
 
तुम अच्छी कविताएं लिख लेते हो। विंबो और प्रतिकों की समझदारी भी अच्छी है। बस तुमने एक ही चीज़ की कमी है और वो है विचारधारा की इसे दूर करने में मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं। तुम्हें बहुत साहित्य पढ़ने की जरूरत है। बिना इसके लेखन में परिपक्वता नहीं आती। इसमें तुम अंकिता से भी मदद ले सकते हो। उन्हें कविताओं की बहुत अच्छी समझदारी है। जब भी कोई कविता लिखो तो उसे एक बार पढ़वा लिया करो। जब मुझे कोई नहीं जानता था उन्होंने मेरा साथ दिया था। अगर मैंने कुछ अच्छा लिखा गै तो इसका सारा श्रेय अंकिता को ही जाता है। इस बार तुम्हारे यहां आना बहुत ही अच्छा रहा।
 
 
 
आंटी के साथ बिताए ये तीन-चार दिन हमेशा याद रखूंगा। वो कितनी अच्छी हैं। तुम्हारे ऑफिस चले जाने के बाद मैंने आंटी से कई विषयों पर बातचीत की। स्कूली शिक्षा न होने के बाद भी उनकी राजनीतिक और सामाजिक समझदारी आज के पढ़े-लिखे इन मोदी भक्त नौजवानों से हजार गुना अच्छी है। वे भाजपा को अमीरों की पार्टी मानती हैं। मोदी और योगी से नफरत करती हैं। आंटी का साफ मानना है कि भाजपा सरकार आने से गरीबों की समस्याएं बढ़ी हैं और देश का माहौल खराब हुआ है। इस सांप्रदायिक माहौल में उनका ये कहना कि इस देश में रहने के लिए जब हिंदू मुस्लमान नहीं बन सकता तो कोई मुसलमान हिंदू क्यों बनेगा। ये बहुत बड़ी बात है।

और सच कहूं तो मैं अब तक जितनी माओं से मिला हूं सबकी सोच लगभग ऐसी ही है। अंकिता की मां की भी सोच ऐसी ही है। और मेरी मां की भी।। ये उस पीढ़ी के लोग जिन्हें स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने का अवसर नहीं मिला। फिर भी ये इतनी अच्छी सोच रखती हैं। और एक हमारी पीढ़ी के लोग हैं जो स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक से पढ़ कर निकल रहे हैं और बहुत ही घटिया सोच रखते हैं।
 
 
समझ नहीं आते की हमारे देश के ये स्कूल, कॉलेज और ये बड़े-बड़े विश्वविद्यालय आधुनिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए बने हैं या इस देश के नौजवानों को सांप्रदायिक और जातिवादी बनाने के लिए। आंटी से बात करने के बाद सोच रहा हूं कि एक सर्वे होना चाहिए कि इस देश में शिक्षित लोग ज्यादा सांप्रदायिक हैं या अशिक्षित। मुझे लगता है कि आंकड़ा बड़ा चौकाने वाला आयेगा।
इन्हीं सब बातों से मैं अब अकादमिक शिक्षा के प्रति उदासीन होता जा रहा हूं। चाहे कोई जेएनयू से पढ़े या पढ़ाए या ऑक्सपोर्ड में। मुझे अब इनमें कोई दिलचस्पी नहीं है। अब तक जितने भी छात्रों और शिक्षकों से मिला हूं। अधिकांश मुझे गदहे ही लगे हैं। न इनमें साहस है और न विवेक और नहीं शोषित और वंचित जनता के लिए कुछ करने का जज्बा। सब सिर्फ अपने को ही सेट करने में लगे हैं।
मुझे अब सिर्फ अनपढ़, गरीब, दलित, किसान, आदिवासी, मजदूर और महिलाओं से ही उम्मीद है। यही देश और दुनिया को आगे ले जाएंगे। बाकि सभी सिर्फ सहायक की भूमिका निभाएंगे। जुटान की जो रिपोर्ट अब तक लगाया गया है। उसमें मेरी बातों को जगह नहीं दिया गया है। जबकि मैंने सबसे अलग हटकर और बहुत ही जरूरी बातें बोली थीं। इस तरह की उपेक्षा से मुझे बहुत दुख पहुंचता है। चाहे कोई मेरी निजी जिंदगी में करे या सार्वजनिक। हमारे लोगों के बलिदान का ये लोग कभी सम्मान नहीं करेंगे। एक बार फिर दिल्ली से उदास होकर जा रहा हूं।
तुम अपनी सेहत का ख्याल रखना। और लोगों से मिला-जुला करो। जनपक्षधर कार्यक्रमों में भागीदारी किया करो। तभी दिल्ली की इस अमानवीय परिस्थिति को झेल पाओगे। अब शायद मैं दिल्ली न आ पाऊं। पर तुम बनारस जरूर आना। तब तक के लिए अलविदा।
तुम्हारा
विनोद शंकर
30/4/2017

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