खत, हां खत!

खत…
 
इंटरनेट के जमाने के किशोरों
 
आज पत्र के माध्यम से चलो हम तुम्हें अपने किशोरावस्था में ले चलते हैं। इंटरनेट से पहले वाले जमाने की अक्काशी करते हैं। ९० के दशक के एक छोटे से शहर की और वहां के खतरों और उम्मीदों की बातें करते हैं। जी भर के। उम्मीद है कि तुम्हें भी हमारा वह दौर पसंद आएगा। मुझे भी बहुत पसंद है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि तब हमारे सिर पर कमाने का बोझ नहीं था, न जिंदगी में इतने फितने-फसाद थे। वह वही दौर था, जब लोग एक-दूसरे को खत लिखा करते थे। दुनिया डिजिटल नहीं हुई थी। इंटरनेट, वॉट्सअप, वीडियो कॉल तो दूर तब बेसिक फोन भी दूर की ही कौड़ी होती थी।
 
खत, हां खत! तब सच में एक अच्छा माध्यम होता था। दोस्ती, प्यार, इसरार, मनुहार से लेकर नाराजगी तक जाहिर करने की बेहतरीन भावाभिव्यक्ति। उसमें अपनेपन के साथ वो मजे-मजे की शिकायतें और वो मजे-मजे की हिकायतें होती थी कि बस पूछो मत। जाहिर है हम बदलते तकनीकी दौर के साक्षी हैं। डाक की जगह अब ई-फॉर्मेट ने ले ली है। तकनीकी उठा-पटक वाले इस दौर से पहले छोटे शहर और कस्बे में लोग अपनी प्रेयसियों से मिलने के लिए बहाने ढूंढ़ते रहते थे, लेकिन बहाना भी ससुरा ऐसा लुकाया रहता था कि खोजे नहीं मिलता था। तब बर्थ-डे, मैरेज-डे टाइप की पार्टियां होती नहीं थी। बस एक शादी-बियाह का ही सहारा रहता था। कई बार तो प्रेमिकाओं से मिलने के लिए लोग बिन बुलाए बाराती बन जाते थे।
 
इसके अलावा जेठ की तपती दोपहरी और अमावस की काली रात उनके लिए सर्दी की गुनगुनी धूप वाले दिन और सुहानी चांदनी रात से उन्हें बेहतर नजर आती थी, क्योंकि तब सडक़ें सुनसान होती थी और किसी के देख लिए जाने का खतरा कम होता था। ऐसी ही तपती धूप में चकोर की भांति प्रेमी प्रेमिकाओं की छत की तरफ टकटकी लगाए रहते थे या फिर जमा देने वाली सर्दी में अमावस की सुनसान रातों में प्रेमी प्रेमिकाओं के पास की तंग संकरी गलियों में, जिधर से कोई आता-जाता न हो उससे मिलने के लिए घंटों इंतजार करते थे। और वह मिलन भी सिर्फ दो मिनट का होता था। इसके बाद दोनों एक-दूसरे को चिट्ठी थमाते और अपनी-अपनी राह पकड़ लेते थे।
 
लेकिन दोस्तो आशिकों पर सिर्फ मौसम की ही मार नहीं पड़ती थी। वह एक और बहुत बड़े खतरे से जूझ रहे होते थे। डर और बहुत बड़े खतरे के बीच होता था वह मिलन। तब घरवालों से ज्यादा खतरा पड़ोसियों का होता था। इस बीच गली के दोनों तरफ दो दोस्त पहरा दे रहे होते थे। खतरे का इल्हाम होते ही वह खास तरह के संकेतकों से रोमियो को आगाह करते थे। संकेत भी रोज-रोज गढ़े जाते थे, ताकि रोज एक ही तरह के संकेत होने से किसी को आभास न हो जाए। लेकिन पड़ोसी भी ऐसे-वैसे नहीं होते थे। बड़े घाघ होते थे। बगुले की तरह वह भी हमेशा टकटकी लगाए रहते थे। कई बार वह पकडऩे में कामयाब हो ही जाते थे। फिर पिटम्मस-कुटम्मस शुरू। इसके साथ ही बाई प्रोडक्ट में उन्हें दिनभर के बातचीत की खुराक भी मिल जाती थी। वैसे दिनभर की गॉसिप्स और पिटम्मस-कुटम्मस के अलावा भी उनका स्वार्थ निहित होता था। किसी को लाइन नहीं मिली होती थी… तो कोई किसी अन्य वजह से खार खाए होता था… तो किसी को अपने मोहल्ले की इज्जत की चिंता सता रही होती थी।
 
 
ये इज्जत भी न उस वक्त बहुत बड़ी चीज होती थी। होती तो अब भी है, लेकिन उस वक्त बहुत-बहुत-बहुत बड़ी चीज होती थी, तब तो ये हाल था कि जिसने अपनी जिंदगी में कभी पगड़ी न पहनी हो, उसकी भी पगड़ी उछल जाती थी। हालांकि उछलकर कहां गिरी यह तो किसी ने उस जमाने से लेकर आज तक नहीं देखा, लेकिन उछलती जरूर थी। इसलिए हमलोगों ने मान लिया था कि यह एक खास तरह की पगड़ी है, जो उछलकर गिरती नहीं, बल्कि काफूर की तरह हवा में ही विलीन हो जाती है। वैसे ही बड़ी जल्दी इज्जतदारों की नाक भी कट जाया करती थी। हालांकि वह कटी नाक भी हममें से आज तक कभी किसी ने नहीं देखी। हमेशा साबूत, मुकम्मल चेहरे पर टंगी ही नजर आती थी। इतनी साबूत और इतनी मुकम्मल कि भारी-भरकम चश्मे के फ्रेम में समाहित मोटे-मोटे शीशे के फ्रेम (तब हल्के वाले फाइवर आप्टिकल्स नहीं आए थे) का बोझ यूं उठाए फिरती थी जैसे अगर चश्मा न हो तो उनकी नाक ही उड़ जाए। हमलोगों ने इन कटी नाकों पर भी काफी रिसर्च किया, बहुत खोजबीन की। लेकिन कटने की बात तो दूर, हल्का-सा खरोंच भी नजर नहीं आता था। इसलिए तब हमने मान लिया था कि हो सकता है कि हमें ही निकट दृष्टि दोष हो, इस वजह से यह कटी नाक साबूत दिख रही है। वैसे हमारा बस चलता तो उन नासिकाओं को अपने कॉलेज की लेबोरेटरी में ले जाकर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप पर जरूर देखते कि आखिर यह साबूत दिखने वाली नाक कटी कहां से है। पर पता नहीं हम जैसे निकट दृष्टि दोष वालों को वहां भी वह नाक कटी हुई दिखती या नहीं।
 
हमारे यहां प्रेम का कूटनीतिक प्रयोग भी खूब होता था, जैसे दो देशों के डिप्लोमैटिक मामले में होता है। जिनके यहां से रिश्ते बनाने या बिगाडऩे होते थे, वहां ये किशोर प्रेमी युगल बड़े काम आते थे। इज्जत उतारनी होती थी तो बीच सडक़ पर रस ले-लेकर उसका बखान शुरू कर देते थे। दो देशों में जैसे युद्ध का माहौल बनता है, ठीक वैसा ही माहौल बना देते। इसका नतीजा होता यह कि मजबूरन वे दोनों परिवार न चाहते हुए भी आपस में लड़ पड़ते। और यदि एहसान लादना होता था तो उन्हें पकडक़र उनके घर ले जाते और अकेले होने पर भी चुपके से दबी आवाज बताते देखिए भाई साहब, (हालांकि घरवालों को छोडक़र तब तक मालूम सबको हो जाता था) घर की बात थी, इसलिए लेकर चले आए, नहीं तो आप समझ सकते हैं, क्या-क्या हो सकता था। और घर वाले भी मौके की नजाकत को समझकर इतने बड़े एहसान के बोझ तले ऐसे दबते कि जिंदगी भर उससे सिर उठाकर बात नहीं कर पाते। उसे देखते ही हाथ जोड़ लेते। उसके बाद इससे भी बड़े स्तर की कूटनीतिक संबंध बनाए जाते। फिर लडक़ी को कहा जाता कि बिना रक्षाबंधन के वह उस लडक़े को राखी बांध दे। साहबान कई मामलों में तो यह भी देखा गया कि यह प्रस्ताव प्रेमी-प्रेमिका ही दे देते थे- आपलोगों को हम पर यकीन नहीं है तो मैं राखी बांधने-बंधवाने को तैयार हूं आदि। इतने बड़े डिप्लोमैसी के बाद उन दोनों के रिश्ते और ज्यादा गहरे हो जाते और वे दोनों भाई-बहन के पवित्र रिश्ते में बंध जाते। इसके बाद सारे लोग राहत की ऐसे सांस लेते जैसे परमाणु बम गिरने से बचा लिया गया हो। पूरी धरती का विध्वंस होने से बच गया हो।
 
इसके अलावा और भी ऐसे कई दिलचस्प वाक्ये आंखों देखी है। जैसे सडक़ पर लडक़ा, लडक़ी से कम से कम ३०० मीटर की दूरी बनाकर चलते। इतनी दूरी के बावजूद वे काफी चौकन्ना रहते कि कहीं कोई लख तो नहीं रहा है। उस वक्त प्रेमपत्र का आदान-प्रदान करने के लिए ऐसे लडक़े को ढूंढ़ा जाता था, जिसका आना-जाना दोनों परिवारों में हो। फिर उससे आजिजी-मिन्नतें की जाती कि वह पत्र इधर से उधर पहुंचा दे और उधर से इधर ला दे। वह लडक़ा पूरा भाव बनाता कि अभी नहीं, अभी मुझे बाजार जाना है, सब्जी लानी है, ट्यूशन जाना है आदि। ऐसा वह इसलिए करता था, ताकि पत्र पहुंचाने की अधिकतम कीमत वसूली जा सके। एक पत्र की कीमत उसे १०-१० रुपए तक मिल जाती थी। इतने में उसके दोस्तों के साथ दो दिन के नाश्ते का या नाश्ते के साथ सिनेमा देखने का इंतजाम हो जाता था।
 
प्रेम और प्रेमपत्र के बहाने एक अच्छा-खासा रोजगार चल रहा था, जिससे जुड़े रहते थे। कई तो प्रेमपत्र लिखने के विशेषज्ञ होते थे। इसी से वह अच्छी-खासी कमाई कर लिया करते थे। ऐसे लोग मोहल्ले भर का ही नहीं, शहर भर के रोमियो-जूलियट का पत्र लिखा करते थे। वह काफी मशहूर होते थे। उनकी हैसियत किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं होती थी। शहर भर के रोमियो-जूलियट ऐसे बंदा-बंदी को ढूंढक़र रखते थे, जो ऐसा पत्र लिख दे कि सामने वाले/वाली के दिल में हलचल मच जाए। पत्र पढ़ते ही वह तड़पकर हां कर दे। इसके अलावा मुर्गे और खस्सी के खून की रिसाइकिलिंग भी हो जाती थी। इन दुकानों से खून खरीदकर प्रेमी-प्रेमिकाएं ले आते थे। पत्र लिखने में स्याही की जगह उस खून का इस्तेमाल इस तरह के डायलॉग के साथ करते थे- पत्र लिखा है खून से स्याही मत समझना… आदि पता नहीं क्या-क्या? यानी कि तुम सब समझ रहे हो न, एक वैकल्पिक रोजगार का बड़ा माध्यम थे- प्रेम और प्रेमपत्र। लिखने से पहुंचाने, मिलने-मिलाने तक कई लोग इस धंधे में लगे होते थे। सिनेमा देखने और चाय-नाश्ता के लिए इन बीच वालों को अपनी अंटी गीली नहीं करनी पड़ती थी।
 
लेकिन जब से पत्रों की जगह सोशल साइट्स, वीडियो चैट और फोन ने ले ली है, तब से देर से आना, जल्दी जाना टाइप वो मजे-मजे की शिकायतें और हिकायतें तो याद रखने के काबिल नहीं ही रहीं, साथ में कूटनीतिक संबंध बनने-बनाने और रोजगार का एक बहुत बड़ा जरिया भी जाता रहा।
जाहिर है इसकी वजह सिर्फ तकनीक ही नहीं है, बल्कि बदलते दौर में कम हुई बंदिशें और डेटिंग के नए-नए तरीकों ने भी यह गड़बड़झाला किया है। समाज में धीरे-धीरे आजादी के कीटाणुओं ने अपने पंख पसारने शुरू कर दिए हैं। महानगरों में तो अल्ट्रा आजादी आ गई है। बताइए भला यह भी कोई दौर है। इस वजह से कूटनीतिक संबंध बनाने के मौके तो जाते ही रहे और इससे जुड़े रोजगार पर भी मंदी की मार… मार क्या बंद ही हो गए कहिए। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इसे रोका जाए, नहीं तो बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। पर्यावरण में पहले ही जहर घुल गया है। सांस लेने में दिक्कतें शुरू हो गई है। सांस्कृतिक प्रदूषण का भी खतरा बढ़ता जा रहा है। इसलिए उन्हीं अदृश्य पगड़ी और लंबी नाक वालों ने स्वच्छता अभियान चलाने का बीड़ा उठाया है। होंगे इटली के नायक रोमियो-जूलियट, लेकिन तकनीक और खुलेपन के नाम पर हम देसी रोमियो-जूलियट को तो इसकी खुली छूट नहीं दे सकते न। तुम्ही बताओ!
 
इसलिए यह बेहद जरूरी है कि रोमियो-जूलियट को इतनी आसानी से न मिलने दिया जाए, ताकि कूटनीतिक संबंध बनाने और फिर से उन रोजगारों को फलने-फूलने का अवसर मिल सके। इसीलिए हमारे जैसे पीढ़ी वाले लोगों ने तय किया है कि वह पुराना दौर लौटाने के लिए एक एंटी रोमियो स्क्वायड का निर्माण किया जाए, ताकि समाज में फिर से वही वातावरण बन सके और वह सारे कूटनीतिक रिश्तों और धंधों को पनपने का मौका मिल सके। इसलिए हमारी पूरी कोशिश है कि इस मुहिम में किशोरों और युवाओं को जोड़ा जाएं, ताकि वे उस दौर की गरिमा और महिमा को समझ सकें। मंदी के इस दौर में रोजगार के उस वैकल्पित स्रोत को फिर से जिंदा कर सकें। खत्म हो गई कूटनीतिक रिश्तों की बहाली के लिए जी-जान लगा दें।
फकत तुम सबका

 

इंटरनेट और सोशल साइट्स के जमाने से पहले वाला किशोर

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