प्यारी सखी! मैं भी तुम्हारी तरह एक आम मां हूं

प्यारी सखी
पहले तो माफ़ी क्योंकि ये दोस्ती के उसूलों के खिलाफ है कि दो दोस्तों के बीच की बात को यूं किसी सार्वजनिक मंच पर लाया जाय, लेकिन मैं ऐसा कर रही हूं, क्योँकि कुछ बातें जरिया होती हैं, उन तमाम लोगों तक अपना पक्ष पहुँचाने की जो उस बात से जुड़े हों।

तुम्हें शायद याद भी ना हो कि कुछ दिन पहले जब मैं अपनी बेटी की दिनचर्या का कोई हिस्सा तुम्हें सुना रही थी, तुमने आंखों में असीम दया भरते हुए कहा था-‘आप आद्या का कितना अच्छा खयाल रखते हो, वो आपको कितना आशीर्वाद देती होगी।’

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सखी!
तुम्हारे ये शब्द मेरे कानों में हथौड़े की तरह बजे। मेरा मन किया कि तुम्हें जवाब दूं लेकिन उसी वक़्त मुझे ये भी लगा कि पहले खुद से तो जवाब लूं कि तुम, जो कि मुझे इतने करीब से जानती हो, तुम जिससे मेरा शायद ही कुछ छुपा हो, अगर मेरे बच्चे के बारे में ऐसा सोचती तो तो इसकी वजह क्या है?

करीब तीन साल पहले मैंने अपनी बेटी के बारे में सोशल मीडिया में खुलकर लिखना शुरू किया। इसके पीछे बहुत सारी वजहें रही जिनमें एक बड़ी वजह ये भी थी कि मैं चाहती थी, मेरे सीमित दायरे में ही सही, लोगों का विकलांगता को लेकर नजरिया बदले।

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किसी खास बच्चे को देखकर लोग दया ना दिखाएं, उसके पास जाएं, उससे डरें नहीं। उसके माता- पिता की रोमांचक दिनचर्या के बारे में जानें, उनके संघर्षों के गवाह बनें और जहां हों, संवेदनशीलता दिखाएं, सहानुभूति या दया नहीं।
मैं बहुत हद तक कामयाब भी रही।

मेरे आसपास बहुत कुछ बदला है। मुझे लगने लगा था ,आद्या अब एक आम बच्चे की तरह प्यार पाती है, दया नहीं लेकिन तुमने मुझे फिर से वहीं लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से मैंने शुरू किया था।

तो सुनो सखी!
हम सब इंसान कमोबेश एक जैसे ही बने हैं। ऐसे ही हम सबके बच्चे भी। किसी मेडिकल कंडीशन पर किसी का बस नहीं और इसी वजह से मेरा बच्चा या हर स्पेशल बच्चा बाकियों से अलग होता है।

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मैं भी तुम्हारी तरह एक आम मां हूं। और मैं तो खुद को बहुत कमज़ोर मां मानती हूं। जैसे तुम अपने बच्चे की परवरिश करती हो,प्यार,डांट,खेल और रूठना मनाना करती हो, मैं भी बस वैसा ही करती हूं। फ़र्क़ बस ये है कि मेरे बच्चे को थोडा ज्यादा देखभाल की जरुरत है। शायद उसे उम्र भर इस देखभाल की जरूरत हो, लेकिन इससे मैं मां के तौर पर महान नहीं बनती और ना ही मेरा बच्चा किसी की दया का पात्र।

मेरी बेटी आम बच्चों की तरह शरारती और स्वार्थी है। तुम कभी उससे पूछना कि वो अपनी मम्मा से प्यार करती है?तो उसका जवाब हमेशा ना होगा। हाँ सिर्फ तब जब मैं कहूँ कि मेरे पास आइस क्रीम है। तुम एक बहुत अच्छी माँ हो। अपने बच्चे की बेहतरीन परवरिश कर रही हो लेकिन क्या तुमने कभी सोचा कि इसके बदले तुम्हें अपने बच्चे से आशीर्वाद मिलेगा? नहीं ना?वो इसलिए कि हमारी मानसिकता में ये कूट कूट कर भरा है कि किसी दीन हीन की सेवा करो तो आशीर्वाद मिलता है।

हमारा समाज यही मानता है कि बीमारी या विकलांगता किसी पूर्व जन्म के बुरे कर्म का नतीजा है और ऐसे लोगों की सेवा से पुण्य मिलता है।  मैं इस सोच का पूरा विरोध करते हुए तुम्हें और बाक़ी लोगो को बताना चाहती हूँ कि विकलांगता या किसी बीमारी पर हमारा जोर नहीं चलता लेकिन इन अवस्थाओं के प्रति हम क्या नजरिया रखते हैं,ये सब हमारे अपने वश में है।

ये मेरे संवाद की असफलता है कि तुम अपनी इस सोच को नहीं बदल पाई। इसे पढ़कर कोई और बदल पाए तो मेरी बात सफल होगी।

(यह ख़त दीपिका घिल्डियाल ने लिखा है। दीपिका देहरादून के एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं।)

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