ओह! मेरी नोआ आखिर तुमने ऐसा क्यों किया…?

प्यारी नोआ
ये ख़त तुम्हारे और उन लड़कियों के नाम जो जीवन से हार कर मृत्यु का चयन करती हैं। तुम्हारी मृत्यु केवल तुम्हारी ही नहीं बल्कि उन तमाम लड़कियों की मृत्यु है जो जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर यौन शोषण और बलात्कार से गुज़री है और आज भी गुजर रही हैं।

कुछ को तो समाज सज़ा के डर से जिंदा जला देता है, कुछ को मार कर शरीर को क्षतिग्रस्त करके कहीं दूर कूड़े के ढ़ेर पर फेंक देता है और उफ़ तक नहीं करता है। क्योंकि उसके लिए स्त्री एक योनि से अधिक कुछ नहीं है। वही योनि जिससे उसने जन्म भी लिया है। उसी योनि को क्षत- विक्षत भी वही करता आया है। ऐसे लोगों को क्यों तुमने अपनी इच्छा मृत्यु से सबल दिया ?

बहुत सी लड़कियां बचपन से अबतक कभी न कभी किसी न किसी रूप में सेक्सुअली अब्यूज होती आयी है और आज भी हो रही हैं। तुम्हारी जैसी बहुत- सी लड़कियां हमारे देश में भी है जो बचपन में परिवार और आस-पड़ोस के लोगों से बलत्कृत होती है और चुप होकर रह जाती हैं। उनकी चुप्पी माता-पिता के उन पर अविश्वास और दोषी का परिवार व समाज का हिस्सा होने के कारण उस पर उनके अतिविश्वास के कारण होता है।

अगर माता-पिता समझदार हैं तो वह बच्चों को समझने की कोशिश करते हैं किंतु उन्हें कैसे इस मानसिक और शारीरिक आघात से बाहर निकाले इससे जूझते उन्हें भी देखा जा सकता हैं। वह भी इसी समाज का हिस्सा है जहां यौन हिंसा और बलात्कार के बाद परिवार और लड़की ही संदेह के घेरे में खड़ी कर दी जाती है। यही संदेह माता-पिता के भीतर डर के रूप में घर कर जाता है और वे उस बच्ची को पहले से अधिक सुरक्षा के घेरे में रखना शुरू कर देते हैं।

भावना मासीवाल, सहायक प्रध्यापक

माता-पिता का यही अतिसुरक्षा का घेरा बेटियों के मानसिक द्वंद्व का कारण बन जाता है। अतिसुरक्षा के पीछे माता-पिता का छुपा डर कब बच्ची के भीतर का डर और मानसिक आघात बन जाता है। वह खुद भी नहीं समझ पाती। इस तरह मासूम लड़कियां डिप्रेशन की शिकार होकर अपने लिए मृत्यु का चुनाव कर लेती है।

नोआ
तुम भी कुछ इसी तरह की पारिवारिक, सामाजिक व मानसिक स्थितियों से गुजरी होगी। जहां माता-पिता कहने को तुम्हारे साथ थे मगर भीतर से समाज और तुम्हारे साथ हुई घटना से डरे थे। उनकी लाख कोशिशें उनके भीतर के डर को तुमसे छुपा नहीं सकी होगी। इसी वजह से वह तुम्हें सँभालने में असफल हो गए। प्यारी नोआ तुम्हारी इच्छा मृत्यु तुम्हारे परिवार व समाज की मृत्यु है जो तुम्हें जीना नहीं सीखा सका।

नोआ तुम मुझे कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘सूरजमुखी अंधरे के’ की रत्ती की याद दिलाती हो। जो बचपन में इसी तरह यौन शोषण से गुजरती है। उस वक्त भी उसके माता-पिता, दोस्त सभी उसे ही चुप करा देते हैं और उसके साथ की वह घटना उसे असमान्य बना देती है। अंतर बस इतना ही है कि कृष्णा सोबती की ये पात्र कमज़ोर नहीं होती बल्कि आक्रामक और प्रतिक्रियावादी हो जाती है। मैं इसे लेखिका की दृढ़ छाया मानती हूं जो न ख़ुद टूटती है न अपने पात्रों को टूटने देती है।

मगर नोआ मैं जानती हूं, तुम्हारा अपने लिए मृत्यु का चयन तुम्हारे कमज़ोर सामाजिक परिवेश का हिस्सा है तुम्हारा अपना नहीं। नोआ तुम भी जीना चाहती थी। तुम्हारी भी इच्छाएं और सपने थे। मगर तुम्हें और तुम्हारे सपनों को तुम्हारे समाज ने तुम से छीन लिया। यह वही समाज है जो स्त्री को योनि और तमाम दूषित मानसिक आघातों से घेरे रखा। इसने तुम्हें भी मानसिक रूप से सबल नहीं बनने दिया। काश नोआ तुम इच्छा मृत्यु के चयन की अपेक्षा जीवन को चुनती और सबल होकर लड़ती तो समाज को कुछ बेहतर जबाब मिलता। प्यारी नोआ तुम्हें जीना था, लड़ना था और उन्हें सज़ा दिलाना था।

तुम्हे अपने जीवन की त्रासदी से बाहर निकलकर अपनी जैसी लड़कियों के जीने का हौसला बनना था। मगर तुमने तो उनके लिए भी मृत्यु के द्वार खोल दिए। आज भी मुझे याद है 2012 की निर्भया की घटना। जब वो जिंदगी और मौत से लड़ रही थी तो समाज कह रहा अब इसके जीने का क्या औचित्य? क्योंकि इनके लिए तब भी उसकी योनि ही मुख्य थी उसका जीवंत व्यक्तिव नहीं। वह लड़की जीवन से लड़ते हुए मृत्यु से हार गई। और एक तुम थी जिसने ख़ुद मृत्यु को गले लगा लिया और फिर से इस पितृसत्तात्मक समाज को कहने का मौका दे दिया कि बलात्कार के बाद लड़कियाँ सामान्य जीवन नहीं जी सकतीं।
ओह! मेरी नोआ आखिर तुमने ऐसा क्यों किया…?

भावना मासीवाल
(भावना मासीवाल दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं। जेंडर और स्त्री मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लिखती रही हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से शोध अध्येता हैं। )


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