‘अगर हमारी शादी हो गई होती तो मैं कुछ नहीं होती, मर गई होती’

डियर…

तुम्हारे लिये कोई उपयुक्त सम्बोधन नही मिला इसलिये जगह ख़ाली छोड़ दी।


तुम्हें मेरे लिये मेरे पापा ने पसंद किया था, मेरी पसंद कभी नही बन पाये! तुम कुछ ख़ास नहीं, फलां कंपनी में आम बड़े इंजीनियर थे । तुमने बात करने के लिए पापा से मेरा नम्बर मांगा, पापा ने मुझसे पूछकर ही तुमको दिया। जब तुमने पहली बार फ़ोन किया तो तुम्हारा नम्बर सेव नही होने के कारण तुमने ताना दिया, अच्छा नहीं लगने के बावजूद पहली बात- चीत का लिहाज़ कर मैं चुप थी। बड़ी मां ने फ़ोन पर समझाया था “ठीक से बात करना” इसलिये मैं तुम्हारे साथ फ़ोन पर बात चीत के दौरान ठीक से थी ।

तुमने आम से सवाल, पसंद ना पसंद से बात की शुरुआत की थी, ये वो समय था जब बाज़ार में उतरे नये- नये ब्राण्ड की लहर थी । तुमने पूछा, ‘तुम्हें किस ब्ब्रांड्ज़ के कपड़े पसंद हैं’, ‘मैंने कहा मैं बेनेटॉन पहनती हूँ।’ फिर अन्य पसंद ना पसंद पर भी बात हुई जिसपर तुम्हारा जवाब कटाक्षनुमा होता था। हां, तुम फ़लाँ की बेटी हो, तुम्हारी बात अलग है अगर तुम यह जानते थे तो तुमने पूछा ही क्यूँ था ?!

तुम्हारी मां मुझसे मिलने आने वाली थी तुमने कहा मेरी माँ बहुत सीधी हैं, माँ को ये मत कहना मैं बेनेटॉन पहनती हूँ । इडीयट अगर तुम्हारी माँ ब्रैंड्ज़ पर बात करती तो मैं उन्हें भी वही जवाब देती जो तुम्हें, प्रश्नों के जवाब पूछने वाले व्यक्ति पर निर्भर नही करता। ख़ैर, तुम्हारे तंज इसी तरह चलते रहे अपने रेगुलर क्रम में, रोज़ दफ़्तर से आकर तुम्हारी फ़िज़ूल की बातें सुनना मुझे बहुत बोझिल लगता था लेकिन मैं झेल रही थी कि शायद समय बाद सब ठीक हो जायेगा । लगभग पंद्रह बीस दिन बात करने के बावजूद मेरे भीतर तुम्हारे लिये कोई दिलचस्पी पैदा नही हुई, तुम इस बात का भी ताना देते थे कि मैं कभी तुमको sms या कॉल नहीं करती जबकि तुमको ख़ुद समझना था फिर भी तुम मुझको ताना देते थे।

बड़ी मां ने तुम्हारे बारे में पूछा तो मैंने कहा उसके भीतर एक औरत बैठी है, जिसे सिर्फ़ तंज करना आता है और कुछ नही । उन्होंने कहा रिश्ते को समय दो, अभी शुरुआत है बाद में समझने लगोगी । मेरी फ़ैमिली वाले चाहते थे मैं तुम्हें पसंद कर लूँ; पापा से कुछ भी कहना बेकार था उनका मानना था मैं किसी के साथ adjust नहीं कर सकती। मेरे रवैये से पापा को लगता था या तो मेरी शादी नहीं होगी, और अगर मैंने अपनी पसंद से की तो जल्दी ही divorce हो जायेगा, इसलिये मैं तुम्हारे साथ एडजेस्ट कर रही थीं।

घर में सभी भाई बहन को तुम पसंद थे, तुम काफ़ी अच्छे दिखते थे, ऐसा मेरे भाई बहन कहते थे ! उनको लगता था मैं बहुत फ़िल्मी हूँ लेकिन असल ज़िंदगी में फ़िल्म जैसा कुछ नही होता। असल ज़िंदगी के नायक तुम्हारे जैसे ही होते हैं। तुम कभी लहंगे का कलर डिस्कस करते तो कभी साड़ी या कभी कभी चूड़ी बिंदी, जबकि कुछ तय नही हुआ था । ऐसा नहीं है कि लड़के ये बातें नही करते, बिलकुल करते है मैं तो आज भी लिप्स्टिक का कलर भाई से डिस्कस करती हूँ लेकिन तुम्हारा तरीक़ा अलग था तुम मुझसे पूछते फिर उसे नकार देते ।

जब मुझे लगता तुम मुझे नीचा दिखाने के लिये ही मुझसे बात करते हो तब अचानक ही तुम मेरी बहुत तारीफ़ कर मुझे भौचक्क कर देते ! ऑफ़िस आवर में अगर मैं तुमसे बात नही करती थी तो तुम्हें बुरा लगता था हालाँकि, मुझे तुम्हारे बुरा लगने की ज़रा भी परवाह नही थी बल्कि अपने पापा की परवाह थी। लेकिन इस सबका अंत किसी एक दिन होना तय था और वह दिन उस दिन आया जब तुमने मुझे फ़ोन किया तो पीछे से बहुत लाउड टी वी की आवाज़ आ रही थी।

तुम्हारे पास तीन ऑप्शन थे, पहला टी वी देखते हुए तुम मुझे फ़ोन नही करते, दूसरा टी वी म्यूट कर सकते थे,, तीसरा तुम टी वी से दूर होकर बात करते लेकिन तुम तो तुम थे, बेमिशाल थे । उस दिन मैंने तुम्हारा कॉल डिस्कनेक्ट कर अपना फ़ोन switched ऑफ़ कर लिया । मैंने पापा को बता दिया कि मैं तुमसे शादी नही कर सकती । बात यहीं ख़त्म हो जाती तो ठीक था लेकिन कुछ दिन पहले facebook पर तुम्हारा रिक्वेस्ट आया कई कॉमन फ़्रेंड्ज़ होने के कारण तुम्हें बिना पहचाने ही मैंने ऐक्सेप्ट कर लिया । छूटते ही तुम अपने तंज की गठरी लेकर इन्बाक्स में हाज़िर हुए, तुमने बताया कि तुम्हारी वाइफ़ बहुत भली है, मेरी तरह नकचढ़ी नहीं, तुम फ़लाँ- फ़लाँ देश घूम आये हो और आजकल बैगेरह- बैगेरह कर रहे हो।

तुम्हारी हर बात पर सिर्फ़ स्माइल के इमोजी भेज रही थी, वो क्या है ना जिससे कोई रिश्ता नही रखना, उससे ज़बानबाज़ी क्या करना। फिर तुमने जल्दी ही मेरी दोनो किताबें ख़रीद पढ़ ली और फिर से तंज का शिलशिला शुरू हो गया। कहानियाँ पढ़कर तुम्हें तंज करने का अच्छा बहाना मिल गया था। तुमने ऐसी कहानियाँ लिखी, वैसी कहानियाँ लिखी, गंदी कहानियाँ हैं, अच्छा हुआ हमारी शादी नही हुई मेरा तो नाम ही ख़राब हो जाता। मैंने तुम्हारा इन्बाक्स ब्लाक कर दिया।

कभी- कभी मुझे मेरे लेखक वेख़क होने से चिढ़ होती है, फेसबुक ने दुनिया छोटी कर दी है, बदले हुए नाम के बावजूद भी मैं तुम्हें मिल गई और इस बदले हुए नाम का ताना भी तुमने दिया था। जबकि तुमसे बात चीत के दौरान तुमने कहा था शादी के बाद मेरा सेकंड नेम बदल जायेगा। मेरे पति के विरोध के बाद भी मैंने उसका नाम अपने नाम के साथ क्यूँ लगाया ये मेरा निजी मामला है जो मैं तुम्हें कभी नही बताऊँगी।

तुमने कहा अगर हमारी शादी हो गई होती तो तुम्हारा नाम ख़राब हो गया होता लेकिन अगर हमारी शादी हो गई होती तो मैं कुछ नहीं होती, अगर कुछ होती तो तुम जैसे टिपिकल सामंतवादी गधे की ग़ुलाम या मर गई होती । मुझे नही पता तुमने मुझे ब्लाक किया है या अन्फ़्रेंड, लेकिन दुआ करती हूं यह चिट्ठी तुम तक ज़रूर पहुँचे।

प्रियंका ओम
(यह खृत प्रियंका ओम ने लिखा है। वे लेखिका हैं और उनकी दो किताबें, ‘मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है’ एवं ‘वो अजीब लड़की’ प्रकाशित हो चुकी हैं। इस वक्त तंजानिया में रहती हैं। )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *