माफ करना पापा, कुछ कमी मेरी थी तो कुछ आपकी

प्रिय पापा नमस्ते
मुझे माफ करना।
आपने बेटा-बेटी में कभी कोई भेद नहीं किया। भाई की तरह मुझे भी घर से दूर पढ़ने के लिए भेजा। मुझे याद है मेरे लिए आपने और मां ने कितनी तकलीफें झेली हैं। कई बार ऐसे अवसर आए कि घर में फीस जमा करने के पैसे नहीं थे पर आपने या तो लोन लिया या मां ने अपने गहने बेचे।

हर बार मुझे नया मोबाइल देकर पुराना मोबाइल खुद ले लेते थे। विवाह की बात आई तो आपने ही कहा था कि नहीं पहले मेरी बेटी पढ़ेगी और अपने पैर पर खड़ी होगी फिर उसकी शादी-विवाह के बारे में सोचेंगे। आप हर वक्त मेरे साथ खड़े रहे। पर थोड़ी सी कमी कर दी पापा आपने।

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कभी बताया नहीं कि समाज जैसा दिखता है वैसा है नहीं। लोग जैसे दिखते हैं वैसे होते नहीं। उनको परखने समझने का संस्कार नहीं दे पाए। मैं तो अबोध थी। जैसे लोग घर पर मिले, जैसा प्यार घर पर मिला यही सोचकर घर की दहलीज से निकल पड़ी थी। यही सोचकर कि लोग भी आप जैसे होंगे। यही भरोसा मुझे मार गया पापा।

जिनमें आप जैसी लविंग व केयरिंग ढूढ़ी उसी ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर मेरी हत्या कर दी। मैं सड़क किनारे कूड़े के ढेर पर पड़ी हूं। मेरा चेहरा बुरी तरह कुचल दिया गया है। पुलिस ने गाजियाबाद और आसपास के सभी कॉलेजों को सूचना भेजी दी है पर शिनाख्त मुश्किल है। आप कुछ दिन बाद बेटी को खोजते थाने में मेरी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने जाएंगे तो हो सकता है मेरी तस्वीर देखकर आपके पैर के नीचे से जमीन खिसक जाए। मुझे माफ करना पापा।

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गलती मेरी भी थी। जब घर से पढ़ने के लिए आई तो मुझे पूरा ध्यान पढ़ाई लिखाई पर लगाना चाहिए था। पापा, ने तो कहा ही था कि बिटिया पढ़ने का मन हो तो बाहर भेजूँ? मैंने आगे बढ़कर बड़े जोश से कहा था कि मैं पढ़ूंगी पापा। क्या पढ़ी खाक? सबका देखा देखी बॉयफ्रेंड बनाना जरूरी लगने लगा। दोस्तों के साथ मस्ती करना, घूमना फिरना, फिल्म देखना, शॉपिंग करना जरूरी लगने लगा।

पढ़ाई धीरे-धीरे पीछे छूटने लगी और मैं एक अलग दुनिया में रहने लगी। पापा, यहाँ भी गलती आपकी ही है। आपने बताया ही नहीं कभी कि अच्छे लोगों संगत क्या होती है? जैसी संगत होगी वैसी ही गति होगी ना पापा?

मेरी ज्यादातर सहेलियों में एक दो को छोड़कर ज्यादातर इसी राह पर हैं। लड़कियाँ ही क्यों लड़के भी उसी तरफ भाग रहे हैं- – खाना-पीना- घूमना-फिरना-मस्ती करना यही लाइफ है। आज मरकर यह लगता है ये लाइफ नहीं थी। पढ़ने के लिए घर से बाहर आए थे तो पढ़ते। अपना एक लक्ष्य तय करते। कुछ ऐसा सोचते जिससे कि माँ-बाप का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता।

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कुछ ऐसा करते कि समाज में मेरा मान बढ़ता। कुछ ऐसा करते जिससे देश को मुझपर गर्व होता। जो हम कर रहे थे गंदी नाली के कीड़ों से बेहतर कुछ नहीं था। आपने कभी बताया ही नहीं पापा कि मनुष्य का जीवन कीड़े मकोड़ों सा नहीं होता। उसके ऊपर पूरी सृष्टि के ख्याल की जिम्मेदारी होती है। वह सभी जीवों में श्रेष्ठ है उसके पास अच्छा बुरा सोच पाने का विवेक है। जो ईश्वर ने किसी भी जीव को नहीं दी है।

माफ करना पापा, कुछ कमी मेरी थी तो कुछ आपकी। पर मैं चाहती हूँ बाकी पिता अपने बच्चों को समाज को समझने की सीख दें, अच्छा संस्कार दें, अच्छे व बुरे की पहचान का विवेक दे। … .. और बाकी बहनों से गुजारिश है कि तुम्हें बहुत मुश्किल से आजादी मिली है उसका सदुपयोग करना। प्यार-मुहब्बत से पहले आत्मनिर्भर व स्वावलंबी बनने की ओर आगे बढ़ना। तुम्हारी आत्मनिर्भरता तुम्हारा हौसला चौगुना कर देगी फिर तुम जो चाहोगी मिलेगा।
माफी के साथ एक बार फिर अलविदा … … …!


यह खत संतोष राय ने लिखा है। संतोष पेशे से पत्रकार हैं।

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