‘मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है’ से गुजरते हुए मुझे तुम्हारी कहानियों से मोहब्बत-सी हो गई

कुछ बात है कि धुंधली नहीं होती हस्ती तुम्हारी…।
तुम सचमुच अजीब हो. कविता हो, कहानी हो, आग और पानी हो या पीड़ा की ज़ुबान हो. नीत्शे की धारणा है कि पीड़ा ही मनुष्यता है. इससे बढ़कर कहना जरुरी लग रहा कि पीड़ा का पूरी संवेदनशीलता के साथ बखान भी मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है.
और तुम खड़ी हो ….अजीब लड़की !

इस बदसूरत दुनिया को अपने छेनी से कांट छांट रही हो. अपने अनुरुप गढ़ भी लेती हो. असग़र वजाहत कहते हैं न कि रचनाकार प्रतिसंसार रचता है. वो तुम रच रही हो.
तुम्हें उसके जाने से नफरत है. जाने से नफरत होना ही चाहिए. “ जाना” हिंदी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया जो है. कवि केदार नाथ सिंह कह गए हैं और तुम उसी पर क़ायम हो. जाने से नफरत ही तो प्यार का इकरारनामा है. जिस दिन किसी की जाना अच्छा लगे, वहां ग़ुलामी से मुक्ति की घोषणा हुई समझो .

अजीब-सी लड़की यानी प्रियंका ओम की ताज़ा कहानियां उसके नए संग्रह “ मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है” से गुज़रते हुए कहना चाहती हूं- मुझे तुम्हारी कहानियों से मोहब्बत-सी हो गई है. वह नयी लड़की , जिसकी कल्पना मैं करती थी, जिसे अपने चारो तरफ देखना चाहती थी, वो इसकी कहानियों में बसती हैं. कितनी सच्ची -सी लगती हैं, मुझे आश्वस्त करती हुई कि दुनिया का चेहरा हम बदल देंगे. चिंता मत करो.

हमारी जिंदगी कोई और डिक्टेट नहीं कर सकता. अपने मन का साथी हम खुद तलाश लेंगे और सम्मान रहित प्रेम को कभी स्वीकार नहीं करेंगे. संबंधों में गैरबराबरी खत्म कर देंगे … इस दुनिया को लड़कियों के जीने लायक बना देंगे. यह आश्वस्ति कम नहीं मेरे लिए. मेरी पीढी खत्म हो रही है जूझते हुए ताकि बेटियां अपनी मर्जी का जीवन चुन सकें. जैसे प्रियंका की कहानियों की नयी लडकियां चुनती हैं. उन्हें कहानियों से बाहर आकर समूचे समाज में छितरा जाना चाहिए.

कितने आराम से, बिना लाउड हुए, सबको साथ लिए हुए… पितृसत्ता की आंख में आंख डालकर उसे दरकिनार करते हुए. छोटे शहरों की ये बड़ी लडकियां आदर्श हो सकती हैं. बोझिल और अतिशय कहानियों से गुज़रने के बाद प्रियंका की कहानियां ताज़ा हवा की तरह घुसती है दिल दिमाग़ में. बहुत प्रवाह है कहानियों में , पाठक को साथ लिए चलती है… हर क़दम पर पाठक खुश … ।

कहानी की पठनीयता एकमात्र गुण नहीं, अनिवार्य गुण तो जरुर है. इन कहानियों से गुज़रते हुए मैने महसूसा . मैं किसी कहानी को बीच में छोड़ नहीं पाई. कहानियां तुम बहुत बुरी हो…. ऊंगली पकड़ाई थी, कलाई पकड़ ली.
किस- किस कहानी का ज़िक्र करुं.

प्रियंका के पहले संग्रह की कहानियां एकदम अलग-सी थीं जैसे तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से उपजी हों. गहरा रोष, बौखलाहट और तंज है उन कहानियों में. जिससे कई बार मैं असहमत हुई. मुझे लगा- यह क्रूर एप्रोच है. दूसरे संग्रह की कहानियां एक सधी हुई, ठहरी हुई कथाकार की हैं जिसने जीवन को समझ लिया और अपनी प्रतिक्रिया का रचनात्मक इस्तेमाल करना बेहतर ढंग से सीख गई है और कथानक में संतुलन आ गया है.

न जबरन का विमर्श है न एकतरफा हमला. समाज के सामने तेज रोशनी फेंक कर सबकी आंखें चौंधिया देती है. चुभती हुई रोशनी , कई बार पलक नहीं झपकने देती.
संग्रह में पांच लंबी और छोटी कहानियां हैं. जो मुझे बहुत पसंद वो है – “और मैं आगे बढ़ गई” और लास्ट कॉफ़ी !

एकदम भाप उठती हुई कैपोचीनो टाइप कहानी है दोनों. इनके कुछ पात्रों से मिलने का मन होने लगा. जैसे लास्ट कॉफ़ी के उस रहस्यमय शख़्स अडोल्फ से. वह समंदर प्रेमी है जिसे एकांत भी बहुत पसंद. जो समंदर के ग़ुस्से को और एक लड़की के रुठने को अच्छी तरह समझ लेता है. जैसे “ और मैं आगे बढ गई” कहानी का नायक निक यानी निकेतन और लड़की वनिता !

नयी लड़की का प्रतिनिधि चेहरा है वनिता जो एक संपन्न लड़के का इश्क , एक साधारण प्रेमी के लिए ठुकरा देती है. क्योंकि संपन्नता उसे ग़ुलामी का आकर्षक ऑफ़र देती है और निर्धनता उसकी मुक्ति का मार्ग तैयार करती है. संपन्नता कहती है – ईश्वर ने स्त्री को घर संभालने और मर्दों को कमाने के लिए बनाया है. स्त्री मुक्ति और अस्मिता का पैरोकार निर्धन प्रेमी कहता है- ये नियम ईश्वर ने नहीं, तुम जैसे पुरुषों ने बनाए है.ये पुरुष समाज, महिलाओं को गृहस्थी में क़ैद करके खुद भगवान बन बैठा है.

निर्धन प्रेम , लड़की को ललकारता है- “ इतना इंटेलिजेंट और स्मार्ट होने का क्या फ़ायदा , जब तुम्हारे फ़ैसले कोई और लेता हो” इसके बाद लिहाज़ी लड़की के मुँह में जुबान आ जाती है. छोटे शहर की एक लड़की कठपुतली बनने से इनकार कर देती है. शादी से पहले ड्रेस की पाबंदियाँ लगाने वाले, अपनी पसंद नापसंद थोपने वाले प्रेमी से बेहतर साधारण तबके का आज़ाद ख़याल प्रेमी होता है जो किसी स्त्री का मालिक बनने का ख़्वाब नहीं देखता.

नयी लड़की जान गई थी कि स्त्री के लिए सिर्फ प्रेम काफी नहीं, सम्मानविहीन प्रेम , नमक बिना खाना ..फीका फीका. वह आत्म सम्मान बचा लेती है और अंत में सच्चा प्रेम भी पा लेती है. यह कहानी हर लड़की की कहानी हो सकती है. मैं ऐसी कई लड़कियों को जानती हूँ जो आज भी अपने घरवालों से छुप छुप कर मॉर्डन ड्रेसेज़ पहना करती हैं. एक कॉलेज छात्रा याद आ रही जिसने कहा था- अभी पहन ले रही हूँ मैम, मेरी शादी होने वाली है, पति नहीं पहनने देगा…!

मैं बौखला गई थी सुनकर. उसको बहुत समझाया. वो सिर झुकाए सुनती रही. मैं आँख न मिला सकी. सिर सहला कर दूर हो गई. वनिता जैसी हिम्मत चाहिए लड़कियों को. अपने ऊपर भरोसा करना चाहिए और खुद को कठपुतली में बदलने से रोकना चाहिए. सच्चा प्रेम बाँधता नहीं. यह कहानी यही कहना चाहती है. अपने सपनों की मरुभूमि में रहने से इनकार करना जरुरी .
“जीनियस इनसान वहीं सांस ले सकता है जहां उस पर किसी तरह का कोई पहरा न हो.” -जॉन स्टुअर्ट मिल
गीता श्री

वरिष्ठ लेखिका गीताश्री कविता, कहानी, उपन्यास और लेख, सभी विधाओं में दक्ष हैं। 24 से ज्यादा वर्षों तक सक्रिय पत्रकारिता में रहने के बाद अब स्वतंत्रत पत्रकारिता एंव साहित्य में लीन हैं। रामनाथ गोयनका, ग्रासरूट बेस्ट फीचर अवॉर्ड से लेकर तमाम पुरुस्कारों से नवाजी जा चुकी हैं।

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