सावित्री बाई फुले: स्त्री शिक्षा और अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली शिक्षिका

आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं और आगे बढ़कर समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही हैं और यह संभव हो सका शिक्षा से। शिक्षा ने स्त्रियों को उनके अधिकार दिए और उनकी सुरक्षा के लिए बुलंद हौसले। मगर कभी सोचा कि आज जिस शिक्षा को वह अपना अधिकार मानती हैं उसका संघर्ष कब और कैसे आरंभ हुआ? और वह कौन थे जिन्होंने स्त्री शिक्षा को उनका अधिकार बनाया। आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसी ही शख्स कि जिन्होंने स्त्री शिक्षा के लिए न केवल संघर्ष किया बल्कि पहली बार उनके लिए बालिका विद्यालय की भी स्थापना की। यही वह पहली महिला थी जो बालिकाओं की शिक्षिका भी थी और उनके विद्यालय की संस्थापक भी। आज 3 जनवरी है और आज ही स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने वाली, पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन है।

यह दिन स्त्री शिक्षा के रूप में याद किया जाता है। सावित्री बाई फुले मूलतः महाराष्ट्र की थी। बंगाल के बाद महाराष्ट्र ही वह राज्य था जहाँ स्त्री शिक्षा और उसके अधिकारों की लड़ाई पुरजोर तरीके से लड़ी जाती है। सावित्रीबाई फुले एक शिक्षिका के साथ-साथ समाज सुधारक भी है और व्यक्तिगत स्तर पर कवयित्री रही। उनकी कविताओं का पहला संग्रह उनकी तेईस की उम्र में 1854 छपी थी और दूसरा संग्रह 1891में ‘बावन्नकशी सुबोधरत्नाकर के रूप में आता है। उनकी कविताओं का संकलन मराठी से हिंदी में भी अनुदित है। सावित्री बाई फुले ऐसी शख्स थी जिन्होंने समाज द्वारा लड़कियों की शिक्षा के विरोध के बावजूद उन्हें शिक्षित करने का प्रण लिया और अपने मार्ग में आने वाली तमाम रुकावटों सामाजिक अपमान से आगे बढ़कर स्त्री शिक्षा को मजबूत किया।

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उन्होंने उस समय की मौजूदा लैंगिक और जाति विभेद की मानसिकता का पुरजोर विरोध किया। वह अपनी कविता में लिखती भी हैं कि “चलों, चलें पाठशाला हमें है पढना, नहीं अब वक्त गँवाना/ ज्ञान-विद्या प्राप्त करें, चलो हम संकल्प करें/ अज्ञानता और गरीबी की गुलामीगिरी चलो, ”तोड़ डालें/ सदियों का लाचारी भरा जीवन चलो, फेंक दें।” सावित्री बाई फुले’ 1848 में वे पुणे के बुधवारा पेठ में आम के वृक्ष के नीचे पहला बालिका विद्यालय खोलती हैं। इसी तरह 1851 में रास्तापेठ, 1852 बताल पेठ में दो और बालिका विद्यालय खोलते हुए स्त्री शिक्षा को आगे बढानें का काम करती हैं। सावित्रीबाई फुले का लड़कियों के प्रति शिक्षा के संकल्प रास्ता बहुत सरल नहीं था। उन्हें अपने ही समाज के रुढ़िवादी लोगों का विरोध सहना पड़ता है।

उनका पुरजोर विरोध होता है उन्हें विद्यालय जाते समय अंडो, कीचड़, टमाटर, पत्थर से मारा जाता था ताकि वह लड़कियों को पढ़ाना बंद कर दे। परंतु ऐसा होता नहीं है समाज जितना उनका विरोध करता वह उतनी ही सशक्त होकर आगे बढ़ती जाती और उनका शिक्षा का यह संकल्प प्रौढ़ महिलाओं की शिक्षा के लिए भी पाठशाला खोलता हुआ आगे बढ़ता है। इस तरह ‘1849 में पूना में ही उस्मान शेख के घर मुस्लिम स्त्रियों व बच्चों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केंद्र खुलता है।’सावित्रीबाई फुले का शिक्षा में योगदान यहीं समाप्त नहीं होता बल्कि 1852 में बाल विवाह, विधवा, परित्यक्ता, यौन शोषण से गर्भवती हुई स्त्रियों की दशा को सुधारने के लिए ‘महिला मंडल’ का गठन करती हैं।

इसके साथ ही ज्योतिबा फुले के सहयोग से 28 जनवरी 1853 को ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की’। इस गृह का उद्देश्य विधवा स्त्रियों को सुरक्षा देना था और यौन शोषण से प्रताड़ित और गर्भधारण करने वाली स्त्रियों की सुरक्षा करना था। ताकि वह सामाजिक और मानसिक यातना में आत्महत्या या भ्रूणहत्या न कर ले। ‘इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह में सन् 1873 तक लगभग 66 विधवा महिलाओं की प्रसूति हुई’। सावित्रीबाई बाई फुले पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों की मौजूदा दशा का कारण स्त्रियों की अज्ञानता को मानती है।
जिसने उसे समाज की रुढ़िवादी सोच का विरोध करने की अपेक्षा उसका गुलाम बना दिया था। यही कारण था कि तमाम सामजिक विरोध के बावजूद उन्होंने शिक्षा को स्त्री गहना बनाने की बात कही क्योंकि उनकी दृष्टि में शिक्षा ही उन्हें समाज में अधिकार और आत्मसम्मान दे सकती थी। इसीलिए उनकी अधिकांश कविताओं में शिक्षा और जागरूकता का स्वर प्रबल रूप से सुनाई देता है।
स्वाभिमान से जीने के लिए
पढ़ाई करो पाठशाला की
इंसानों का सच्चा गहना शिक्षा है
चलो, पाठशाला जाओ
डॉ. भावना मासीवाल

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