ख्याली पुलाव- वो तुम नहीं मेरी कहानी थी

‘इश्क पहले आंखों  में उतरता है फिर दिल में बस जाता है। आंखें प्यार का कैमरा होती हैं। तभी तो कहते हैं नजरों का मिल जाना मोहब्बत हो जाना होता है। मैंने भी तुम्हें दिल में बसाने से पहले नजरों में बसाया था। तुम्हारी तस्वीर मेरे आंखों में उतर गई थी। पलकों के बंद होते ही तुम आ जाती थी चुपके से, फिर तुम्हारा बोलना और मुस्कराना बंद ही नहीं होता था। क्यों ठीक कह रहा हूं ना?’
बिल्कुल नहीं!मुझे तुम्हारी इन बातों में थोड़ा-सा भी इंटरेस्ट नहीं है।
सब ख्याली पुलाव हैं।
एकदम झूठ।

रोमांस करना भी नहीं आता तुम्हें। आंखों में बसाना तो दूर की बात है दो साल तक आंखें भी नहीं मिला पाए थे मुझसे। भूल गए। मैं जब तुम्हारे सामने होती थी कैसे तुम्हारी आंखें फड़फड़ाने लगती थी। इधर-उधर देखकर बात किया करते थे। वो तो थैंक्स बोलो मेरा जो तुम जैसे घोंचू को प्रपोज मार दिया। नहीं तो तुमसे कभी लड़की पटने वाली थी।

अब चुपचाप गाना सुनो ये वाला- ‘बोतल खोल।’

‘गाना तो अच्छा है पर सही में मेरा बिल्कुल भी इंटरेस्ट नहीं है। वो तो तुम कान में खोंस देती हो इसलिए मैं ये गाने सुन लेता हूं। पर कभी गुनगुनाता नहीं। ”तो इधर लाओ मेरा हेडफोन और चुपचाप बैठे रहे।’ रिया हेडफोन खींच लेती है और प्रशांत शांत बैठ जाता है। सूरज अस्त होने वाला है। पार्क में जगह-जगह प्रेमी जोड़े हैं। कोई हंस रहा है कहीं तीखी नोखझोंक हो रही है। कुछ ने एक-दूसरे के कंधे पर सिर टिकाए कानों में हेडफोन लगा रखा है।’
खत के साथ ही किस्से, कहानी और कविता।

मेरी आंखों में जो इश्क उतरा था काश मैं उसके दिल में उतर पाता। तुम्हें तो पता भी नहीं होगा रिया- मेरी नजरें जिसको तलाशती थी वो तुम नहीं। मेरा दिल धड़कने की जगह जोरों से जिसे देखकर गा उठता था वो तुम नहीं। मेरी आंखों में जो तस्वीर उतरी थी वो भी तुम नहीं। पलकों के बंद होने के बाद जो आज भी सपने में आती वो भी तुम नहीं।

वो मेरी कहानी थी।
जिसे मुस्कुराता देख मैं मुस्करा उठता था।
जिसकी बातों को सुनकर मेरे कान नहीं थकते थे।
जिसके पास होने पर वक्त थम जाता था मेरे भीतर।
मेरी पलकें बड़ी हो जाती थी होंठ खिल उठते थे।
मैं कभी उससे आंखें नहीं मिला पाया।
दिल के जज्बात कह नहीं पाया।
बता नहीं पाया कि तुम मेरी कहानी है।
मेरा सपना हो जो रातभर नींद में और सुबह जागकर मैं देखता हूं।
तीन साल बीत गए लेकिन तीन घड़ी उसके सामने खड़ा नहीं रह पाया।
कहां खो गए? ये पकड़ो बैग और चलो जनपथ।
मार्केट उठने वाली होगी मुझे कुछ खरीदना है।
यार तुम मेरे टाइप हो ही नहीं। पता नहीं क्यों तुम्हें झेल रही हूं। ये पकड़ो अपने हेडफोन और चलो फटा-फट। पता नहीं क्या देखकर मैंने तुम्हें प्रपोज मार दिया था। कही महीने तक पीछे पड़ी रही थी तुम्हारे। अब लगता है काश तुम्हारी जगह किसी और के साथ रिलेशनशिप में होती तो कम से कम तुम्हारे ये ख्याली पुलाव तो नहीं सुनने पड़ते।
चलो अब फटाफट। हद है ये हेडफोन हाथ में क्यो झूला रहे हो डालो इसके जेब में।
ललित फुलारा

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